भारतीय महिलाओं का इतिहास और वर्तमान तथा उनके सहनशीलता और समाज का मूकदर्शक बनने की कहानी। सहनशीलता की रानी
कहे जानेवाली भारतीय महिलाएं बारम्बार कूप्रथा का शिकार होती रहीं हैं और विडम्बना देखिये भारत के पुरुष समाज
चुप्पी साधे रहा। भारत एक लम्बा इतिहास
वाला देश रहा है, जहाँ एक उत्कृष्ट मानव सभ्यता फला-फुला। किसी भी सभ्यता का महिला
प्रमुख खम्भा होता है, इसके बगैर सभ्य समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। महिलाओं के
स्थिति और उनके अधिकार के आधार पर देश के राजनीतिक व सामरिक चरित्र कैसा रहा का
सटीक अनुमान लगाया जा सकता है।
भारत अपने लम्बा इतिहास में कई उतार-चढ़ाव से गुजरा
है, जिसका सीधा असर महिलाओं के स्थिति पर पड़ा । हम जानने का प्रयास करते हैं कि सहनशीलता
की रानी कहे जाने वाली भारतीय महिलाओं को कब-कब अच्छे और ख़राब दौर का सामना करना
पड़ा है।
ऐसे तो भारतीय
महिलाओं का इतिहास की शुरुआत गौरवशाली रहा है। यहाँ के समाज के धर्म और कर्म में
महिलाओं का स्थान पूजनीय है जो दुनिया के दूसरे समाज में नहीं के बराबर मिलता है,
लेकिन भारतीय समाज का दुर्भाग्य यह भी रहा है कि यहाँ के महिलाओं को बहुत हीं बुरे
दौर का सामना करना पड़ा है जो कम-बेस हमेशा दिखता है।
भारतीय इतिहास की ओर देखने पर: लगभग 2500 इश्वी पूर्व भारत का सभ्य समाज सिन्धु घटी सभ्यता के रूप में अस्तित्व में आता है। और इस समय भारतीय समाज मातृत्वसतात्म्क या मातृप्रधान था। उस समय से आज तक अनवरत भारत में महिलाओं की पूजा होती चली आ रही है लेकिन जिसके बावजूद भी भारतीय महिलाओं की स्थिति अधिकारहीन होती दिखती है। यह अपने आप में पहेली बनकर भारत को सती प्रथा व वेश्यावृति के रूप में एक डंस की तरह चुभता है जो भारतीय समाज को खोखला करने का हीं काम किया है।
भारत के वैदिक काल में महिलाओं कि स्थिति: सिन्धु घाटी सभ्यता के
बाद भारतीय समाज महिलाओं के मामले में उत्कृष्ट हो जाता है। जिसके लिए हम भारतीय आज तक ललायित है। यह भारत का वैदिक काल है। इस समय महिलाओं का सुनहरा काल कहें या महिला काल कहें तो गलत नहीं होगा। इस समय के
समाज में स्त्रियां बेहतर स्थिति में थी। ‘पत्नी हीं गृह है’ कहकर महिलाओं को
संबोधित किया जाता था। महिलाएँ पुरुष के सभी कामों में भागीदार बनती थी तथा पर्दा
प्रथा व सती प्रथा जैसे घातक बीमारी से भारतीय समाज मुक्त था।
वैदिक काल के बाद महिलाओं की स्थिति: वैदिक के बाद भारत
राजनीतिक और सामरिक रूप से काफी मजबूत हो जाता है जो मौर्य सम्राज्य के नाम से
जाना जाता है। इस समय महिलाओं की स्थिति में बदलाव दिखने शुरू हो जाता है। वेश्यावृति का
प्रवेश होता है। हलांकि इस समाजिक चेहरा का प्रशासनिक व राजकीय सहारा मिलता है।
सम्भ्रान्त परिवारों के महिलाएँ घर के चाहरदीवारी में कैद हो जाती हैं। विधवा का
विवाह को समाज स्वीकार करता है।
गुप्त काल में स्त्रियों को सम्पति का अधिकार प्राप्त हो गया था लेकिन: गुप्त काल में स्त्रियों को सम्पति का अधिकार
प्राप्त था लेकिन इस समय वैदिक के कन्याओं का होनेवाला उपनयन संस्कार बन्द हो जाता है। अल्पायु में विवाह, पर्दा प्रथा तथा सती प्रथा का प्रचलन था। इतना हीं नहीं
देवदासी प्रथा का भी चलन के संकेत मिलता है। समाज में गणिकाओं, वैश्याओं और
देवदासियों का एक वर्ग पूर्णरूप से विकसित हो गया था। इसके समानांतर काल में
दक्षिण भारत के महिलाओं को प्रशासनिक अधिकार प्राप्त थे परन्तु देवदासी प्रथा उफ़ान
पर कायम था। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इस समय के भारत के महिलाओं की स्थिति
बद्दतर हो चली थी।
बाहरी आक्रमण ने भारत के महिला समाज की संरचना के तस्वीर हीं बदल दिया: बाहरी आक्रमण से भारतीय महिला समाज की संरचना काफी प्रभावित हुआ। महिलाएं 'जौहर' करने को मजबूर हो गईं जैसे सबसे घिनौना प्रथा का जन्म हुआ। यह इसलिए हुआ की आक्रमणकारी भारत के सम्पति को लूटता हीं था और साथ में भारत के महिलाओं के इज्जत के साथ भी खेलना शुरू कर दिया। ऐसे कृत्य को भारतीय संस्कार सभ्यता इजाजत नहीं देता था। यह भारतीय महिला के अस्मिता पर सीधा प्रहार था, जिसे महिलाओं ने 'जौहर' के सहारे बचाने का प्रयास की।
महिलाओं के ख़राब स्थिति को चुनौती देने की साहस भारतीय समाज में नहीं रहा था: बालावस्था में विवाह, सती प्रथा पूर्व से हीं चलता आ रहा था जो इस काल में विकराल रूप धारण कर
लिया। जौहर प्रथा में एक साथ कई महिलाएँ अग्नि में कूद पड़ती थी जो पूर्णरूप से
भारत से सटे पश्चिम देश का आक्रमण की हीं देन है। अब महिलाएं शैक्षणिक रूप से भी काफी पिछड़ गई। निम्न वर्ग के महिलाएं तो सिर्फ दास बनकर रह गईं थी। स्थिति यहाँ तक पहुंच गयी की महिलाओं
के साथ जुड़े विकृत प्रथा के खिलाफ़ भारतीय समाज को आवाज उठाने की ताकत नहीं रहा।
बदायूँनी के अनुसार पूरे देश में महिलाओं के घूंघट को संस्कार माना गया तथा किसी
ने इसे चुनौती देने का साहस नहीं किया।
भारत में अंग्रेजों के आने से भारतीय महिलाओं के स्थिति पर संघर्ष की शुरुआत हो गई: भारत में अंग्रेजों
के आने से भारतीय महिलाओं के स्थिति पर आलोचना शुरूआत हो गई। यहीं वजह रहा कि
राजाराम मोहन राय ने सती प्रथा जैसे खोखला भारतीय संस्कार को चुनौती दी और लार्ड
विलियम बैंटिक के मदद से सती प्रथा के खिलाफ़ कानून बना दिया। उस समय से आज तक भारत
में समय-समय पर महिलाओं के सुरक्षा को लेकर कानून बन रहें हैं और लागू किया जा रहा
है। यह नव भारत की शुरुआत है जो पहले से अच्छा है। आज का भारत के महिलाओं को
लोकतान्त्रिक अधिकार बढ़ाने के लिए सोनिया गाँधी ने संसदीय सिट में कुछ प्रतिशत
सिर्फ महिलाओं के लिए सुरक्षित करवाने के लिए संघर्ष की तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी ने तीन तलाक के खिलाफ़ आवाज बुलंद किया जो मुस्लिम समुदाय के महिलाओं को
अधिकार प्रदान करता है।
वर्तमान समय में भारतीय महिलाओं की स्थिति: वर्तमान समय में महिलायों के साथ अभद्र व्यवहार करने के वारदात भारत में जोरों पर है। जिसको दमन करने के
लिए भारत सरकार कानून पे कानून बना रही है, लेकिन ये अभी तक नियन्त्रण से बाहर हीं
है। इसपर भारत सरकार को जल्द से जल्द काबू पाना चाहिए जो फ़िलहाल दिल्ली दूर प्रतित होता है। आज
के महिलाओं पर उपद्रव करनेवाले उपद्रवियों को कानून का डर नहीं रहा, इसलिए ये बेखौप अपराध कर रहें हैं। क्योंकि
भारतीय समाज इस समय भी चुप्पी साधे तमाशा देख रही है। भारतीय समाज यहाँ भी मूकदर्शक बनकर देखने के अलावा कुछ नहीं कर रही है। अब इसके डर से ग्रामीण स्कूली लडकियाँ अपने चेहरे को ढंक कर स्कूल जाना शुरू कर दिया है या फ़िर घर के चाहरदीवारी में कैद होकर रहना शुरू कर दिया है या उपद्रवियों के साथ दो-दो हाथ करने को तैयार होकर स्कूल जाती है। जो भी हो यह भारत के महिलाओं के लिए शुभ संकेत नहीं है, यह भविष्य में पर्दा प्रथा का जन्मदाता बन सकता।
भारत के बनारस विश्वविद्यालय की घटना: भारत के प्रतिष्टित विश्वविद्यालय बनारस विश्वविद्यालय के लड़कियों के साथ कुछ लोगों ने अभद्र व्यवहार किया था। इस घटना को बनारस विश्वविद्यालय की लड़कियां भारत के तत्कालिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शेयर करना चाहती थीं। इस घटना को मोदी को बताना चाहती थी। क्योंकि नरेंद्र मोदी उस समय बनारस के सांसद भी थे। और संयोग से इस घटना घटित होने के तत्काल हीं प्रधानमंत्री विश्वविद्यालय के पास से गुजरनेवाले थे। लेकिन, मोदी के सुरक्षाकर्मियों ने इन लड़कियों को अपनी बात मोदी को सुनाने का मौका नहीं दिया। इतना हीं नहीं सुरक्षाकर्मियों ने विश्वविद्यालय की लड़कियों पर लाठी चलाया, इन्हें पीटकर सड़क से भगा दिया।
