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श्री कृष्णा (श्रीमद्भागवत गीता) कहते हैं कि अहंकार की लगाम को कसकर पकड़े रहना चाहिए ।

आप अहंकार शब्द से परिचित तो होंगें! यह देखने में तो चार अक्षर का शब्द प्रतित होता है, लेकिन जिस व्यक्ति पर यह चढ़ता है, उस मानव का रंग-रूप के अलावा सबकुछ बदल जाता है। ऐसे तो  इसे कभी अपनेआप पर हावी होने की छूट नहीं देना चाहिए। इस अहंकार रूपी घोड़े के लगाम को कसकर पकड़े हुए रखना चाहिए। इसे बहकने मत दीजियेगा। यदि यह एक बार बहक गया तो फ़िर आप पर सवार हो जायेगा और आपको घोड़ा बनाकर अपने मनचाहे ढंग से नचाएगा फ़िर एक दिन आपको ले डूबेगा। यह मनुष्य पर अक्सर सफलता से पहले सवार होता है, जिसे पहचान करने के पूर्व हीं मनुष्य को अपने वश में कर लेता है और सफलता के उचित मार्ग से दूर लेकर चला जाता है। एक वाक्य से तो परिचित अवश्य होंगें “अहंकारी रावण”।

श्री कृष्ण महाभारत होने से पहले अपने पाँचों पांडवों में व्याप्त अहंकार को समाप्त करके हीं युद्ध में कदम रखे थे। कृष्ण को यह अनुमान जब पक्का हो गया था कि कुरुक्षेत्र में धर्म और अधर्म को लेकर युद्ध होना निश्चित है तथा इस युद्ध का केन्द्र बिन्दु पाण्डव के अर्जुन को होना है तो कृष्ण ने सबसे पहले अर्जुन को हनुमान के जरिये उनके अन्दर छुपे अहंकार को खत्म करने का प्रयास किया जिसमें उनकों सफलता भी मिला।

गाण्डीवधारी अर्जुन के अन्दर इस बात को लेकर अहंकार हो गया था कि वह दुनिया के आजतक के  सर्वश्रेष्ठ धनुरधारी पुरुष हैं। अपने अहंकार वश अर्जुन ने हनुमान को यहाँ तक कह दिया कि मैं राम से बड़ा धनुधारी हूँ। यदि मैं राम के समय होता तो समुद्र पार करने के लिए समुद्र से विनती नहीं करता और न हीं पत्थर का सेतु बनता मैं तो अपने वाणों का सेतु बना देता। 

इसपर हनुमान बड़ी नम्रता के साथ अर्जुन को जवाब देते हैं कि हे! गाण्डीवधारी पुरुष आप सर्वश्रेष्ठ धनुधर हो सकते हैं, लेकिन श्री राम भी कम नहीं थे। उनके सेना में इतने बलशाली योद्धा थे कि वे लोग वाणों के सेतु पर चलते तो सेतु भर-भरा कर ढह जाता, इसलिए राम ने पत्थर का सेतु बनाया और मेरे श्री राम के अन्दर अहंकार नहीं था, इसलिए वे समुद्र से रास्ता मांगने का विनती भी किये। मैं उस सेना में शामिल था, इसलिए तुम्हे बता रहा हूँ। यदि तुमको यकीन नहीं आता है तो तुम अपने वाणों से सेतु का निर्माण करों और मैं उसपर चलता हूँ। तुम्हारा वाणों का सेतु टूट जायेगा, बिखर जायेगा।
इतना कहे जाने के बाद भी अर्जुन पर कोई असर नहीं हुआ। अर्जुन अहंकार से पागल हनुमान से आगे कहते हैं कि ‘हे अन्जान पुरुष, तुम कह रहे हो कि तुम उस सेना में शामिल थे। और उसमें ऐसे–ऐसे बलशाली सैनिक थे जिसका भार सेतु सहन नहीं करता। मैं अपने वाणों से एक सेतु का निर्माण करता हूँ, जिसपर तुम दौड़ते हुए पार कर जाना और इसे कुछ भी नहीं होगा! अर्जुन ने सेतु का निर्माण कर दिया जिसपर हनुमान का पैर रखते हीं अर्जुन के द्वारा बनाया गया वाणों के सेतु भरभरा कर टूट गया। इतना देखते हीं अर्जुन को एहसास हुआ कि हम कुछ नहीं हैं। उनके अन्दर अहंकार का मौत हो गया था। अर्जुन को पक्का मालूम हो गया कि हम तो कुछ भी नहीं है। एक साधारण मानव का भार मेरा सेतु सहन नहीं कर सका। वह अपना पराजय स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन, इस पराजय का सहन करने की ताकत भी उनमें शेष नहीं बचता और फ़िर अर्जुन अपने आप को खत्म करने को ठान लेते हैं।

इसपर श्री कृष्ण अपने सरल स्वभाव में अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि “तुम्हारे अन्दर का अहंकार नष्ट हो गया है, इसलिए तुम अपनेआप को आत्मस्वाहा करना चाहते हो, इसका अर्थ यह हुआ कि तुम अहंकार के बिना जीना नहीं चाहते”। अहंकार का नष्ट होना तो अच्छी बात है। अहंकार मनुष्य को वो बना देता है जो वास्तविकता में नहीं होता है। अहंकार का मारा योद्धा अपनी क्षमता और योग्यता का गलत अनुमान लगाता है, इसलिए वो युद्ध में मात खा जाता है। क्या तुम आगे के जीवन में अपने प्रतिद्वंदियों से हार कर जीने की इच्छा रखते हो ? समझो! जब तुम्हारे अन्दर मौजूद अहंकार का पराजय को तुम सहन नहीं कर सकते तो फ़िर किसी मानव से वास्तविक पराजय को कैसे पचा पाओगे? उस समय तुम्हारे लिए जीना असम्भव हो जायेगा। इसलिए तुम अपने अन्दर के अहंकार का मौत होने दो और इसके बगैर जीने की आदत डाल लो आगे के समयों में विजयी रहोगे।

हनुमान अहंकार के बारे में अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि जो योद्धा अपने अन्दर के अहंकार को पराजय कर देता है, वह अपने सारे शत्रुओं को पराजय कर सकता है। किसी भी योद्धा का अहंकार से बड़ा कोई शत्रु नहीं हो सकता। जिसने अहंकार को जीता समझो उसने संसार को जीत लिया हो।

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