लेकिन छोड़िए ! हम फ़कीर नहीं बन सकते परन्तु मुझे दो फ़कीर अन्दाज वाले व्यक्ति से पाला पड़ा है जिसकी कहानी सुनाता हूँ। अपने शब्दों में। झेल लेना, शायद कभी काम आ जाय। क्योंकि मैं फ़कीर नहीं हूँ ना !
भाइयों-बहनों ! इस शब्द से घबराइए नहीं हम हैं। आपको मालूम हो कि आजकल फ़कीर का भी टाईप होता है। एक फ़कीर वो होता है, जो लोगों को आशीर्वाद देते फिरता है यह पूर्व के भारत में हुआ करते थे अब ये विलुप्त प्राणी की श्रेणी में गिने जाते हैं । और दूसरा वो होता है, जिसको सत्ता चाहिए। आजकल ऐसे लोगों का भारत में भरमार है, इन्हें आपको खोजने की जरूरत नहीं है, ये आपके सामने स्वयं प्रकट हो जायेंगे और आपको आशीर्वाद से भर देंगें । आप आशीर्वाद से उब जाएंगें फ़िर भी आपको कूच-कूच के देंगें । ये लोग सत्ता की प्राप्ति हेतु अपना घर-बार व अपने माता-पिता को त्याग कर फ़कीर बन जाता है। अब आप हीं फैसला कीजियेगा कि मुझे किस फ़कीर से पाला पड़ा था।
ध्यान देने योग्य बातें- कहानी की शुरुआत से पहले हीं हम आपको बता देना चाहते हैं कि वेश-भूसा के आधार पर धर्म, जाती और वह किस खानदान से है का पता लगा लेते हैं । लेकिन इस कहानी में वैसा अनुमान नहीं लगाना है, क्योंकि यहाँ कोई भी हो सकता है ? इस वेश में देश का कोई नेता भी हो सकता है । यदि यह कहानी किसी धर्म, जाती और समाज से मेल खाता है तो इसे सिर्फ संयोग मान लीजियेगा । इसके जरिये किसी धर्म, जाती, समाज या किसी ऐसे व्यक्तित्व से मेल खानेवाले नेता आदि वालों को ठेस पहुँचने का मेरा मकसद नहीं है । हम इसके माध्यम से आपको सचेत करना चाहते हैं, ताकि आप और आपका देश को कोई ठग न ले ।
इस कहानी की शुरुआत ऐसे होती है, जब हम घर पर ऐसे हीं बैठे थे । मुझे क्या पता की आज मेरे साथ किसी ने साजिश किया । एक दिन हम घर पर हीं जमे रह गए। इसलिए घर की साफ-सफ़ाई करने लगे। हम अपने घर में साफ-सफ़ाई का अभियान चला रहे थे कि अचानक दो फ़कीर दरवाजा पर आ गए। एक के हाथ में डफली था और दूसरे ऐसे हीं थे। डफली वाले फ़कीर जोर-जोर से चुप-चाप डफली बजाने लगा। वह कुछ भी न बोलने का कसम खा रखे थे। डफली का सुरताल अच्छा था, इसे हम आप सुन सकते थे। पर यह फ़कीर डफली क्यों बजा रहा था? इस बात का खुलासा आगे चलकर करेंगें।
अभी! दूसरे महाशय के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। दूसरा महाशय की खासियत यह था कि वह सिर्फ़ बोलना हीं जानते थे। उनको बोलने से ऐसा लग रहा था कि इन्हें दूसरा काम आता हीं नहीं यह सिर्फ बोलना जानते हैं।
उतना तो याद नहीं है, लेकिन आपसे क्या छुपाना? हल्का-फुल्का उन दोनों फकीरों का चेहरा याद है। वो इसलिए नहीं की मैनें उन दोनों को देखा नहीं है। मैं उन दोनों को बहुत अच्छी तरह देखा हूँ। उनके नियत को भी अच्छी तरह से पढ़ा था। सच कहूँ तो मैं उनको कभी भूल नहीं सकता। परन्तु पता नहीं क्यों उनको याद करने का दिल नहीं करता है।
आप को कभी किसी से बहुत प्यार करने का अवसर जरुर मिला होगा। यदि नहीं मिला है तो किसी से बहुत सच्चा प्यार करके देखिये। आपको मालूम पङ जायेगा कि जब आप जिस इन्सान से बहुत प्यार करते हैं, यदि वह आपके सामने आ जाते/जाती हैं तो आप उन्हें नंगी आँखों से नहीं बल्कि मन कि आँखों से देखने लगते हैं। इस दरम्यान आपको उनका चेहरा, रंगरूप या वेशभूषा दिखाई नहीं देगा बल्कि उनका अनुभूति होगा। यदि किसी से नफ़रत करते हैं तो इसका सीधा उल्टा आपके साथ होगा। यह सच्चा/ गहरा प्यार व नफ़रत की पहचान है प्रतित है।
अब फ़कीर पर फ़िर से लौटते हैं। उस फ़क़ीर का चेहरा तो उतना ख्याल नहीं, लेकिन उनका वेशभूषा (Dress) याद है जिसका जिक्र करना अवश्य चाहेंगें। वे दोनों अपनी वेशभूषा के साथ थे। उनके ड्रेस का रंग लगभग समान हीं था। पहनावा से उनको एक दूसरों से अलग करना बड़ा मुश्किल काम लगता है, इसलिए दोनों को समानता को लेकर हीं आगे बढ़ते हैं।
हरा रंग का कुर्ता और इसी रंग का लुंगी पहने थे दोनों। कंधे पे झोला था और सर पर सफेद टोपी थी। लम्बे- चौड़े शरीर का मालिक थे। शरीर और चेहरे के रंग रूप से उनको फ़कीर कहना गलत होगा यदि ऐसा कहेंगें तो फ़कीर की परिभाषा बदलने की जरूरत आ पड़ेगा। लालिमायुक्त चेहरा के साथ विरजमान हुए थे मेरे दरवार पर। उनको फ़कीर नहीं भगवान कहूँ तो गलत नहीं होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि वह अपनेआप को फ़कीर कहकर हीं हमे अपना परिचय दिया।
शरीर से वह पहलवान काठी के थे। खातापिता घर के दिख रहे थे। वह जरुर अच्छे घर से संबंध रखते होंगें। कोई ऐसी हालात आगया होगा कि उनको फ़कीरी का काम करना पड़ गया। ऐसा भी हो सकता है कि वे मन से फ़कीरी सोच रखनेवाले पैदा हुए होंगें। जिस प्रकार महात्मा बुद्ध थे। शायद बुद्ध के समान सोच वाले हीं होंगें तथा इनके माता-पिता ये नहीं चाहते होंगें कि मेरा पुत्र फ़कीर बने, लेकिन इनका तो फ़कीर बनकर देश को उद्धार करना था। लोगों को जगाना था। समाज में क्रांति लानी थी।
सच कहूँ तो हम उन दोनों फ़कीर के शरीर को देखकर डर रहे थे कि इनसे बात बिगड़ जाय तो हमको आराम से धुलाई कर सकते हैं। वह सिने की चौड़ाई से एक मजबूत सैनिक दिख रहे थे और टोपी की सफेदी से नेता प्रतित हो रहे थे लेकिन अपनेआप को फ़कीर बताकर मुझको परिचय दिया।
कहा जाता है कि शरीर से लोग कुछ भी प्रतित होतें हैं पर जब व्यक्ति अपना मुहँ खोलता है तब सामने वाला को पता चलता है कि यह व्यक्ति कैसा है? हम पहले हीं बता चुके हैं कि एक फ़कीर जोर-जोर से डफली बजाने में लगे थे और दूसरा ऐसे हीं था। यह अपना शान्त स्वभाव से प्रभावित करने के कोशिश में था और कुछ करने को मंथन कर रहा था। वह कुछ भी नहीं रखे था लेकिन इस फ़कीर के पास क्या था वो जानने का प्रयास करते हैं।
बोलने वाला फ़कीर साहब ने अपना मुहँ खोलने की कृपा की। दरबार हमेशा भरा रहेगा, कोई तुम्हे बूरा नहीं कर सकता, बहुत तरक्की करोगे, नौकरी लग जाएगी, यदि नौकरी है तो ऊँचे पद को पाओगे, सम्पति से घर हमेशा भरा रहेगा, तेरी आय दूगनी हो जाएगी इस फ़कीर का वादा है। हम जल्दी किसी के दरवाजा पे नहीं जाते हैं क्योंकि हम फ़कीर हैं। मेरा क्या है हम झोला लेकर चलते हैं और जहाँ ईश्वर की इच्छा होती है वहीं रुक जाते हैं। वहां जो मिलता है उसे खाकर सो जाते हैं। तू बहुत भाग्यशाली है कि इस फ़कीर का चरण तेरे दरवाजा पर पड़ा है।
ईश्वर की नियति है कि हम तेरे दरवाजे पर आएं हैं। मेरा क्या है, हम तुम जैसे लोगों के दर्द को खत्म करने के लिए हीं तो चलते हैं। मुझे तुम अपने बारे में कुछ मत बताओ! हम तुम्हारे बारे में सब कुछ जानते हैं। तेरे एक-एक दर्द से हम वाकिफ़ हैं। तुम किस समस्या से जूझ रहा है वो सब जानते हैं। आज से तेरा सब समस्या खत्म होगा। ये इस फ़कीर का वादा है। आज से तेरा जीवन में अच्छे दिन की शुरुआत होगी। यदि तेरे जीवन में अच्छे दिन नहीं आये तो इस फ़कीर को जूता मारना। तुम जहाँ कहोगे वहां हम जूता खाने के लिए चलें आयेंगे। इस फ़कीर का काम है तुम जैसे दुखिये का दुःख खत्म करना बदले में इस फ़कीर को कुछ नहीं चाहिए।
ले! ये ताबीज धर और जा अपने तिजोरी के पास। वहाँ से सबसे बड़ा नोट लेकर आ जा। उसको पढ़ कर तुम्हे देंगें। फ़िर तुम नोट और ताबीज को लाल कपड़े में बांध कर तिजोरी में रख देना।
हम दौड़े-दौड़े अपने पर्स के पास गये। और हमने अपना पर्स में देखा तो उसमें दो हजार, पांच सौ और दस के नोट थे। पता न क्यों, हमने फ़कीर से छल कर दिया। दस का नोट लेकर मुट्ठी को बांधे हुए उसके पास चला गया।
फ़कीर का चेहरा ख़ुशी से खिल उठा था। वह मेरा बंद मुट्ठी पर अपना हाथ रखकर बुदबुदाना शुरू किया। डफली वाला ज़ोर-ज़ोर से डफली बजाने लगा। डफली के जोर की आवाज से मेरा दिमाग काम करना बंद कर दिया था। हम कुछ सोचने लायक नहीं रह गए। फ़कीर जो कहता वो करने को आतुर हो चले थे। ऐसा लग रहा था कि कोई फरिश्ता आता और डफली को बजाने से रोक लेता। हमें इस चंगुल से आजाद करा देता। वहां सभी थे, लेकिन किसी का भी दिमाग काम नहीं कर रहा था। सब के सब डफली के शोर और फ़कीर के वादे ने मती भांग खाकर निष्क्रिय हो चुका था।
कुछ देर बाद मेरा बंद मुट्ठी में ताबीज और पैसा को अपने कब्ज़े में लेते हीं अचानक चिल्ला कर बोला! मेरे साथ धोखा किया तुमने! फ़कीर तिलमिला सा गया। फ़िर दस रुपया और ताबीज दोनों को लेकर मेरा दरवाज़ा से झट भाग खड़ा हुआ। हम बहुत देर तक वहीं चट्टान की तरह खड़े रहे, आज मुझे किसी ने दिन-दहाड़े. ताल ठोककर ठग जो लिया था।

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