राहुल गांधी ने 'एल्फिंस्टन' (Elphinstone) फाइल का जिक्र करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी को घेरा। सदन में भारी हंगामा।।
राहुल गांधी ने 'एल्फिंस्टन' (Elphinstone) फाइल का जिक्र करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी को घेरा। सदन में भारी हंगामा।।
राहुल गांधी ने संसद में जिस 'एल्फिंस्टन' (Elphinstone) फाइल या संदर्भ का जिक्र किया, वह सीधा हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार की कार्यशैली पर था। गांधी ने सदन में एक पुरानी फाइल या रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह तर्क देने की कोशिश की कि सरकार कुछ खास उद्योगपतियों (अडानी-अंबानी) को फायदा पहुँचाने के लिए नियमों में बदलाव करती है। उन्होंने 'एल्फिंस्टन' नाम का जिक्र उन ऐतिहासिक नियमों या व्यवस्थाओं के संदर्भ में किया जो मुंबई के बंदरगाहों या रेलवे के बुनियादी ढांचे से जुड़ी थीं।
राहुल गांधी ने पीएम मोदी को घेरते हुए निम्नलिखित बातें कहीं:
नियमों में बदलाव: उनका आरोप था कि सरकार ने पुराने नियमों (जिनका उन्होंने एल्फिंस्टन संदर्भ से जोड़ा) को दरकिनार कर दिया ताकि एयरपोर्ट्स और पोर्ट्स का नियंत्रण कुछ विशेष व्यापारिक समूहों को दिया जा सके।
अडाणी समूह का जिक्र: उन्होंने दावा किया कि पहले नियम था कि जिसे एयरपोर्ट संचालन का अनुभव नहीं है, उसे टेंडर नहीं मिलेगा, लेकिन मोदी सरकार ने इस "एल्फिंस्टन युग" के नियमों या स्थापित मानकों को बदलकर अडाणी समूह को रास्ता दिया।
सरकार की ओर से किरेन रिजिजू और अन्य मंत्रियों ने बहुत ही आक्रामक तरीके से पलटवार किया। सरकार ने इन आरोपों को खारिज करने के लिए निम्नलिखित तर्क और दस्तावेज पेश किए:
1. "नियम हमने नहीं, आपने बदले"
सरकार ने पलटवार करते हुए रिकॉर्ड पेश किए कि एयरपोर्ट्स के निजीकरण की नीति सबसे पहले यूपीए (UPA) सरकार के समय शुरू हुई थी। सरकार का तर्क था कि:
दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट का निजीकरण कांग्रेस के समय हुआ था।
उस समय जो नियम बनाए गए थे, उनमें 'अनुभव' (Experience) की शर्त को लेकर जो दावे राहुल गांधी कर रहे हैं, वे वर्तमान नियमों में भी निष्पक्षता से लागू किए गए हैं।
2. नीति आयोग (NITI Aayog) और वित्त मंत्रालय के दस्तावेज
सरकार ने स्पष्ट किया कि एयरपोर्ट टेंडरिंग की प्रक्रिया में नीति आयोग और वित्त मंत्रालय के सुझावों का पालन किया गया है।
सरकार का दावा है कि राहुल गांधी जिस 'फाइल' का जिक्र कर रहे हैं, उसमें दी गई आपत्तियों को एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सुलझा लिया गया था।
रिजिजू ने कहा कि किसी अधिकारी की 'नोटिंग' (टिप्पणी) को अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता; अंतिम निर्णय कैबिनेट और उच्चाधिकार प्राप्त समिति लेती है।
3. 'ऑथेंटिकेशन' (प्रमाणीकरण) की चुनौती
किरेन रिजिजू ने सदन में राहुल गांधी को चुनौती दी कि वे जिस फाइल या कागज का जिक्र कर रहे हैं, उसे सदन के पटल पर 'ऑथेंटिकेट' (हस्ताक्षरित) करके रखें।
नियम यह है: यदि कोई सांसद किसी दस्तावेज का हवाला देकर आरोप लगाता है, तो उसे उस कागज की जिम्मेदारी लेनी पड़ती है। अगर वह कागज बाद में गलत निकलता है, तो सांसद की सदस्यता पर भी खतरा आ सकता है।
4. जीएमआर (GMR) और अन्य समूहों का उदाहरण
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि अगर नियम केवल एक व्यक्ति के लिए बदले गए होते, तो अन्य कंपनियों (जैसे अडाणी के अलावा अन्य समूह) को प्रोजेक्ट्स कैसे मिलते? उन्होंने डेटा पेश किया कि बोली (Bidding) पूरी तरह से डिजिटल और पारदर्शी थी, जिसमें सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को प्रोजेक्ट दिया गया।
अब आगे क्या होगा?
किरेन रिजिजू ने साफ कर दिया है कि वे इस मामले को विशेषाधिकार समिति के पास ले जा रहे हैं क्योंकि:
राहुल गांधी ने पीएम पर व्यक्तिगत आरोप लगाए।
उन्होंने 'एल्फिंस्टन' और अन्य फाइलों का हवाला देकर भ्रम फैलाया।
उन्होंने आरोपों के समर्थन में कोई पुख्ता दस्तावेज सदन में जमा नहीं किए।
निष्कर्ष: किरेन रिजिजू का मुख्य विरोध इसी बात पर है कि राहुल गांधी ने "फाइल" और "नियमों" का नाम तो लिया, लेकिन उनके पास इसका कोई प्रमाणिक आधार (Authentic Basis) नहीं था। संसदीय नियमों के अनुसार, आप बिना सबूत के किसी पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा सकते।

