एक समय भारत में आया था जिस समय में
भारत के कोना-कोना से यहीं समाचार मिल रहा था कि उन लोग ज्यादा प्रभावित हो रहें
हैं जो लोग आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं या पैसा कमाने के लिए अपने गृह राज्य को छोड़कर
दूसरे राज्य में गए थे। दिल्ली जैसे भारत के बड़े महानगर में ऐसी स्थिति आ गई थी कि
वहां से लोग पैदल हीं अपने घर लौटने को मजबूर हो गए । जिसका मूल वजह प्रबन्धन
की कमी को जाता है जो बहुत हीं ख़राब स्थिति में पहुंच चुका है। इसकी जितनी शिकायत किया जाय
उतना हीं कम होगा। यह घटना भारत सरकार के आर्थिक मदद की ढांचा का पोल खोल देता है तथा
अब इससे साफ़ हो जाता है कि भारत के गरीब जनसंख्या को यदि आर्थिक सहारा देने की
तत्काल जरूरत पड़ जाय तो मोदी जैसे भारत सरकार से मदद के नाम पर सिर्फ भरोसा, भाषण, माफ़ी तथा
एक दूसरों पर जिम्मेदारी थोप कर अपनेआप को बेगुनाह साबित करने के अलावा दूसरे कुछ
की उम्मीद नहीं की जा सकती।
शहर छोड़कर पैदल अपने
घर की ओर कूच करने का सिलसिला तब शुरू हुआ था जब भारत सरकार ने कोरोना के खिलाफ़ लड़ाई
में देश को lock-down कर दिया तथा जिसकी तैयारी करने के जगह सरकार ने लोगों से
थाली बजाने, ढोल पीटने, नगाड़े बजाने एवं नाच-नचैया करने को प्रेरित करते दिखी।
लोगों को उस समय लगा कि बीमारी से लड़ने का यहीं उपाय है चलो घर में पैक हो जाते
हैं, लेकिन इसके दूसरे पहलू जैसे देश lock-down में जायेगा तो लोगों का रोजगार
खत्म हो जायेगा घर बैठकर खाना होगा जिसके लिए पहले से अधिक खर्च चाहिए क्योंकि
बंदी में खानेपीने की वस्तुओं के दाम में इजाफ़ा होगा और ये सब जब हुआ तो लोग
छटपटाना शुरू कर दिया। भोजन के समान रोज की कमाई पर हीं टिकी थी जो lock-down के
शुरू दिन से हीं खत्म हो गया और जब लोगों के पास रहने का छत छीने जाने लगा तो लोग
अपने गृह राज्य पैदल हीं आने को ठान लिया ये सब नजारा देश के प्रधानमंत्री व भारत
सरकार के गृह शहर दिल्ली में हीं घटित हुआ है। यह घटना वाकई में दुनिया के बिरादरी के सामने
भारत को शर्मसार करता होगा। आज के भारत सरकार (दिल्ली) के पास लाख - दो लाख
जनसंख्या को एक महीना खाना व छत देने की ताकत नहीं है, जबकि भारत के आम जनता अपने
शादीब्याह में हजारों लोगों को रहने व खाना खिलाने का बंदोबस्त कर लेते हैं भारत के कुछ लोग तो एक लाख पचास हजार रूपये के कप में चाय पीते हैं ।
फ़िलहाल भारत में
कोरोना से लड़ने से ज्यादा गम्भीर समस्या lock-down ने उत्पन्न किया, जिससे लड़ने
में भारत सरकार पूरी तरह से विफल व क्रूर साबित हुई को मानने के लिए आप अपने ईमानदारी के
साथ सरकार का परिक्षण करेंगें तो इसकी सच्चाई मालुम हो जायेगा। भारत आर्थिक रूप से
इतना खोखला हो चुका है का भी पोल खूल जाता है। अब यह पूर्णरूप से साफ़ हो जाता है कि यदि
कोरोना को लेकर भारत में चीन जैसे हालात
उत्पन्न होते हैं तो भारत में लाशों का अम्बार खड़ा हो जायेगा, इसलिए सभी भारतियों
को अपना इन्तजाम करना हीं एक मात्र विकल्प है । क्योंकि भारत सरकार अन्दर से खोखला है और मोदी सरकार की नीयत ख़राब है। ये लोग हमलोग
को सिर्फ चीन को युद्ध में हरा देंगें के नाम पर तालियां बजवा सकते हैं, लेकिन इसके
समान चिकित्सा, शिक्षा और आर्थिक व्यवस्था को मजबूत नहीं कर सकते। जनता के
खून-पसीने की कमाई के पैसे से दूसरे देश से लड़ाकू विमान खरीदकर अपने पड़ोसियों पर
धौंस जमा सकते हैं, बड़े-बड़े मूर्तियाँ व मन्दिर का देश में निर्माण कर सकते हैं
लेकिन देश के गरीब जनता के लिए मदद के उपाय नहीं कर सकते।
हमारी सरकार ने
अप्रैल के पहली तारीख से लोगों के खातें में पांच सौ रुपए एक महीना में देने की
घोषणा किया था जो मनमोहनसिंह सरकार का मनरेगा स्कीम के तीन दिन का वेतन मात्र है।
सवाल यह उठता है कि क्या इतने रकम से एक परिवार का एक महीना का खर्च चल जायेगा ?
यदि इतने पैसा में एक भारतीय परिवार अपने आप को survive कर लेता है तो यह स्पष्ट
हो गया कि भारत के लोग बहुत ज्यादा गरीब हैं। भारत के लोग इतना गरीब हैं कि इनके
लिए भारत सरकार व मोदी सरकार पांच सौ रुपया के रोजगार भत्ता देने की घोषणा करती है।

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