बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी नेता श्रीमती राबड़ी देवी प्रखरता के साथ छात्रों के समर्थन में उतरीं।
बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी नेता श्रीमती राबड़ी देवी प्रखरता के साथ छात्रों के समर्थन में उतरीं।
बिहार में हाल ही में हुई बोर्ड परीक्षाओं के दौरान एक बेहद भावुक और तनावपूर्ण स्थिति देखने को मिली, जब कई छात्र महज कुछ मिनटों की देरी के कारण परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं पा सके। इस मुद्दे पर बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी नेता श्रीमती राबड़ी देवी प्रखरता के साथ छात्रों के समर्थन में उतरीं।
उन्होंने सरकार और प्रशासन के सख्त नियमों के कारण छात्रों के भविष्य पर मंडराते खतरे को लेकर चिंता जताई।
संवेदनशीलता की मांग: राबड़ी देवी ने तर्क दिया कि परीक्षा केंद्रों पर 'एक मिनट की देरी' पर प्रवेश न देना छात्रों के साल भर की मेहनत को बर्बाद करने जैसा है। उन्होंने प्रशासन से नियमों में थोड़ी लचीलापन (Flexibility) लाने की अपील की।
यातायात और व्यवस्था पर सवाल: उन्होंने कहा कि बिहार की सड़कों पर जाम और खराब परिवहन व्यवस्था के लिए छात्र जिम्मेदार नहीं हैं। ऐसे में उन्हें दंडित करना अनुचित है।
मानवीय आधार पर समर्थन: विपक्ष के अन्य नेताओं के साथ मिलकर उन्होंने इसे "छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़" बताया और मांग की कि जो छात्र वाजिब कारणों से देर से पहुंचे, उन्हें मौका मिलना चाहिए था।
बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) ने कदाचार मुक्त परीक्षा के लिए बेहद कड़े नियम लागू किए थे:
प्रवेश का समय: परीक्षार्थियों को परीक्षा शुरू होने से आधे घंटे पहले केंद्र में प्रवेश कर जाना अनिवार्य था।
गेट बंदी: समय सीमा समाप्त होते ही गेट बंद कर दिए गए, जिसके बाद राज्य भर से रोते-बिलखते छात्रों और उनके परिजनों की तस्वीरें सामने आईं।
विरोध प्रदर्शन: कई केंद्रों पर छात्रों ने गेट फांदने की कोशिश की और भारी हंगामा हुआ, जिसके बाद विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया।
जहां प्रशासन का मानना है कि अनुशासन और पारदर्शिता के लिए नियम जरूरी हैं, वहीं राबड़ी देवी और विपक्ष का मानना है कि नियम छात्रों की सुविधा के लिए होने चाहिए, उन्हें शिक्षा से वंचित करने के लिए नहीं।
"बच्चे हमारे राज्य का भविष्य हैं। अगर वे 2-5 मिनट की देरी से पहुंचे हैं, तो उन्हें परीक्षा से रोकना उनके करियर की हत्या करने के समान है।" — विपक्ष का सामान्य तर्क
बिहार में परीक्षा केंद्रों पर देरी से पहुंचने वाले छात्रों के मामले में सरकार और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) का पक्ष भी काफी स्पष्ट रहा है। प्रशासन का मानना है कि परीक्षा की शुचिता (Integrity) बनाए रखने के लिए नियमों का सख्ती से पालन अनिवार्य है।
सरकार और बोर्ड ने अपने कड़े रुख के पीछे निम्नलिखित तर्क दिए हैं:
प्रश्नपत्र की गोपनीयता: बोर्ड का तर्क है कि यदि छात्र परीक्षा शुरू होने के ठीक पहले या बाद में प्रवेश करेंगे, तो प्रश्नपत्र लीक होने या सोशल मीडिया पर वायरल होने की संभावना बढ़ जाती है।
अनुशासन कायम करना: प्रशासन का कहना है कि समय की पाबंदी छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करती है। बार-बार चेतावनी के बावजूद देरी से आना लापरवाही को दर्शाता है।
कदाचार मुक्त परीक्षा: "कदाचार मुक्त" (Cheating-free) परीक्षा संपन्न कराने के लिए सरकार ने 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई है, जिसके तहत गेट बंद होने का समय तय किया गया है।
आगामी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश (Guidelines)
इस विवाद के बाद, परीक्षार्थियों के लिए कुछ नियम और भी स्पष्ट कर दिए गए हैं ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति न आए।
प्रवेश का अंतिम समय: अब लगभग सभी बड़ी परीक्षाओं (मैट्रिक और इंटर) में परीक्षा शुरू होने से 30 मिनट पहले ही गेट बंद कर दिए जाते हैं।
रिपोर्टिंग टाइम: छात्रों को सलाह दी जाती है कि वे केंद्र पर कम से कम 1 घंटा पहले पहुंचें।
जूते-मोजे पर प्रतिबंध: बिहार में अक्सर ठंड के बावजूद कदाचार रोकने के लिए जूते-मोजे पहनकर आने पर रोक लगा दी जाती है (केवल चप्पल की अनुमति होती है), हालांकि कभी-कभी राहत भी दी जाती है।
पहचान पत्र: एडमिट कार्ड के साथ आधार कार्ड या कोई अन्य वैध पहचान पत्र साथ रखना अनिवार्य है।
विवाद का निष्कर्ष
विपक्ष (राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव) इसे "प्रशासनिक क्रूरता" कह रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे "सख्ती और सुधार" का नाम दे रहा है। छात्रों के लिए स्थिति यह है कि उन्हें अब राजनीति से इतर अपनी तैयारी और समय प्रबंधन (Time Management) पर अधिक ध्यान देना पड़ रहा है।
