विजय (Thalapathy Vijay) का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय।AIADMK (47 सीटें) ने दिया संकेत।।
छापेमारी कर एक ट्रक और भारी मात्रा में सरकारी स्कूल की किताबें बरामद।।
उत्तर
प्रदेश में पुलिस और शिक्षा विभाग की टीम ने छापेमारी कर एक ट्रक और भारी मात्रा
में सरकारी स्कूल की किताबें बरामद कीं, जिन्हें कबाड़ के गोदाम में बेचा जा रहा
था।
बताया
जा रहा है कि इन किताबों की कीमत करोड़ों में है। ये किताबें बच्चों को मुफ्त
बाँटने के लिए थीं, लेकिन इन्हें रद्दी (Scrap) के
भाव बेचने की तैयारी थी।
फरवरी
2026 को सूचना मिलने पर पुलिस ने ट्रक जब्त किया और जांच शुरू की। स्टॉक
वेरिफिकेशन में 15,595 किताबें गायब पाई गईं, जिसके बाद 2 कर्मचारियों को सस्पेंड,
3 को बर्खास्त और 3 को नोटिस जारी किया गया। चार आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं,
जिनमें बीएसए दफ्तर का कर्मचारी आलोक मिश्रा को इस मामले में मुख्य आरोपी बनाए
जाने की ख़बर है।
सबसे
चौंकाने वाली बात यह है कि ये किताबें इसी चालू शैक्षणिक सत्र की थीं, यानी वो
किताबें जो अभी बच्चों के हाथों में होनी चाहिए थीं, वे कबाड़खाने पहुँच गईं।
अब
तक की कार्रवाई
पुलिस
की रेड: मेरठ के परतापुर थाना क्षेत्र के एक गोदाम में पुलिस ने रेड मारकर इन
किताबों को जब्त किया।
जांच
कमेटी: शिक्षा विभाग ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तरीय जांच के
आदेश दिए हैं। यह पता लगाया जा रहा है कि ये किताबें सीधे गोदाम से आईं या किसी
स्कूल/ब्लॉक स्तर के अधिकारी की मिलीभगत से यहाँ पहुँचीं।
राजनीतिक
तूल: इस खबर के वायरल होने के बाद विपक्ष ने भी सरकार पर निशाना साधा है कि एक तरफ
बच्चे किताबों का इंतज़ार कर रहे हैं और दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के कारण इन्हें बेचा
जा रहा है।
उत्तर
प्रदेश में इस तरह के बड़े खुलासे पिछले कुछ समय में (विशेषकर 2023 और 2024 के
दौरान) कई बार हुए हैं। यह ताज़ा घटना सिस्टम में मौजूद खामियों को फिर से उजागर
करती है।
उत्तर
प्रदेश के कई जिलों में 2023 और 2024 के दौरान भी ऐसी चौंकाने वाली घटनाएं सामने
आई थीं, जिन्होंने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
यहाँ
पिछले कुछ सालों के प्रमुख मामलों का विवरण है:
1. अमरोहा (फरवरी 2023)ः फरवरी 2023 में अमरोहा जिले के हसनपुर तहसील क्षेत्र में एक बड़ा खुलासा हुआ था।यहाँ लगभग 7,000 सरकारी किताबें एक कबाड़ी के यहाँ से बरामद की गई थीं।
कार्रवाई:
इस मामले में खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) की तहरीर
पर सप्लायर और फर्म संचालक के खिलाफ FIR दर्ज की गई
थी। ये किताबें बच्चों को बाँटने के लिए आई थीं, लेकिन वितरण के बजाय इन्हें रद्दी
में बेचने की कोशिश की गई।
2. बहराइच (फरवरी 2024 और हालिया 2026 की रिपोर्ट)
2024
की घटना: यहाँ भी भारी मात्रा में सर्व शिक्षा अभियान की किताबें कबाड़ में मिली
थीं।
ताज़ा
मामला (फरवरी 2026): अभी हाल ही में (फरवरी 2026) बहराइच में 13,000 से ज्यादा
किताबें एक कबाड़ी को मात्र 4 रुपये किलो के भाव बेच दी गईं।
एक्शन:
पुलिस ने लखीमपुर खीरी की सीमा से उस ट्रक को पकड़ा जो किताबों को उत्तराखंड ले जा
रहा था। इस मामले में विभाग के 4 कर्मचारियों को निलंबित/बर्खास्त किया गया और FIR
दर्ज
हुई।
3. अन्य
जिलों की स्थिति (2023-24)
मेरठ
और अमरोहा के अलावा, हापुड़ और मुरादाबाद बेल्ट में भी समय-समय पर ऐसी खबरें आती
रही हैं जहाँ पुरानी और कभी-कभी नई सत्र की किताबें कबाड़ के गोदामों में डंप
मिलीं।
ये
किताबें कबाड़ तक कैसे पहुँचती हैं? ये इस मामला से जुङे बङा और जरूरी सवाल बनता
है। जिसके जवाब में हीं छिपे हैं इस मामला का समाधान।
जांच
रिपोर्टों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इसके पीछे कुछ मुख्य कारण सामने आए हैं:
अति-मुद्रण
(Over-printing): कभी-कभी आवश्यकता से अधिक किताबें
छप जाती हैं और स्टॉक में बची रह जाती हैं।
भ्रष्टाचार:
विभाग के निचले स्तर के कर्मचारी और सप्लायर मिलकर स्टॉक बुक में किताबों को
‘वितरित’ दिखा देते हैं और असली किताबों को कबाड़ी को बेचकर पैसे आपस में बाँट
लेते हैं।
देरी
से वितरण: जब किताबें सत्र खत्म होने के बाद पहुँचती हैं, तो उन्हें बाँटने के
बजाय रद्दी में बेचना आसान रास्ता माना जाता है।
विशेष
तथ्य: इन घटनाओं में सबसे दुखद पहलू यह है कि एक तरफ गरीब बच्चे किताबों के अभाव
में पुराने नोटों से पढ़ाई करते हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकारी खजाने का पैसा कबाड़
में तब्दील हो जाता है।