कांग्रेस के लोग सरकार तो बनाए लेकिन कपास उद्योग के लिए कुछ नहीं किया- मध्य प्रदेश मुख्य मंत्री डॉक्टर मोहन यादव। ।
कांग्रेस के लोग सरकार तो बनाए लेकिन कपास उद्योग के लिए कुछ नहीं किया- मध्य प्रदेश मुख्य मंत्री डॉक्टर मोहन यादव। ।
मध्य प्रदेश मुख्य मंत्री डॉक्टर मोहन यादव ने कहा 1947 के पहले मध्य प्रदेश में कपास उद्योग का भरमार था, लेकिन बाद में कांग्रेस के लोग सरकार तो बनाए लेकिन कपास उद्योग के लिए कुछ नहीं किया। वह सदन में बोले हैं।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अक्सर अपने भाषणों में प्रदेश के औद्योगिक इतिहास और विशेष रूप से मालवा क्षेत्र के कपास (Cotton) व कपड़ा उद्योग का जिक्र करते हैं।आखिर क्यों करते हैं? चलिए उस इतिहास के तथ्यों को कुरेदते हैं।
1947 से पहले, विशेषकर इंदौर, उज्जैन और बुरहानपुर जैसे क्षेत्र ‘कपड़ा हब’ माने जाते थे। इंदौर को तो इसकी कपड़ा मिलों के कारण ‘मिनी मुंबई’ कहा जाता था। जो आजादी के बाद के दशकों में कांग्रेस सरकार की गलत नीतियों, मिलों के आधुनिकीकरण में कमी श्रम विवादों और सरकारी भ्रष्टाचार के कारण ये मिलें धीरे-धीरे बंद हो गईं।
लेकिन अब पीएम मित्र पार्क (PM MITRA Park) और नई औद्योगिक नीतियों के माध्यम से इस खोए हुए गौरव को भाजपा की सरकार विशेषकर मोदी के नेतृत्व वाली सरकार इसे वापस लाने की कोशिश कर रही है।
स्वतंत्रता पूर्व का जिसे स्वर्ण युग कहा जाता है होलकर और सिंधिया रियासतों के समय इंदौर और उज्जैन में हुकुमचंद मिल, स्वदेशी मिल और विनोद मिल जैसी विशाल इकाइयां थीं। तब कपास की खेती और बुनाई अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी।
आजादी से पहले, मध्य प्रदेश (विशेषकर मालवा) कपड़ा उत्पादन में भारत का पावरहाउस था।
हुकुमचंद मिल (इंदौर), यह मध्य भारत की सबसे बड़ी मिलों में से एक थी।
विनोद और विमल मिल (उज्जैन): डॉ. मोहन यादव के अपने शहर उज्जैन में इन मिलों का दबदबा था।
स्वदेशी और राजकुमार मिल: ये मिलें हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया थीं।
बुरहानपुर: इसे ‘ताप्ती मिल’ के कारण कपड़ा व्यापार का प्रमुख केंद्र माना जाता था।
1970 और 80 के दशक में जब दुनिया नई मशीनों पर जा रही थी, तब ये मिलें पुरानी तकनीक और सरकारी भ्रष्टाचार पर ही चलती रहीं।
कुप्रबंधन और हड़तालें: मिलों में लंबे समय तक चलने वाली तालाबंदी और श्रमिक विवादों ने उत्पादन ठप कर दिया।
बिजली की भारी किल्लत: उस दौर में मध्य प्रदेश में बिजली का संकट गहरा था, जिससे मिलों की लागत बढ़ गई।
तत्कालीन सरकारों ने निजी मिलों का राष्ट्रीयकरण तो किया (NTC के माध्यम से), लेकिन उन्हें चलाने के लिए जरूरी फंड और विजन नहीं दिया और भ्रष्टाचार के हवाले कर दिया।
इतिहासकारों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आजादी के बाद की सरकारी नीतियों ने कपड़ा उद्योग को बहुत हद तक विनाश का कारण बना।
नेहरू काल ने बड़ी मिलों पर कड़े प्रतिबंध और टैक्स लगाए। इससे बड़ी मिलों का विस्तार रुक गया। नेहरू का टेक्सटाइल पॉलिसी (1950-60), ने मिलों को नई आधुनिक मशीनें लगाने से रोका। इसका नतीजा यह हुआ कि भारत की मिलें पुरानी तकनीक पर अटकी रहीं, जबकि चीन और वियतनाम जैसे देश आधुनिक मशीनों से सस्ते कपड़े बनाने लगे।
जब मिलें घाटे में जाने लगीं, तो सरकार ने उन्हें बंद होने से बचाने के लिए यूं कहें चुनावी फंड जमा करने के लिए ‘नेशनल टेक्सटाइल कॉर्पोरेशन’ (NTC) के तहत अपने हाथ में ले लिया। और इसका पूरा नियंत्रण सरकार अपने करीबी (Bureaucracy) को सौंप दिया और ये भ्रष्टाचार Bureaucracy सरकार को आमदनी देने लगे जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी अंग्रेज दिया करते थे बिल्कुल वैसे।
परिणाम ये हुआ कि ट्रेड यूनियनों का बोलबाला बढ़ा। इंदौर और उज्जैन की मिलों में लंबी हड़तालें हुईं।
उस दौर में नई मशीनरी लगाने या मिल का विस्तार करने के लिए दिल्ली से परमिट लेना पड़ता था। और दिल्ली में तबतक - नेहरू के लोग अपना पैर जमा लिया था। इस सिस्टम ने भ्रष्टाचार का नंगा नाच नचाया और ये खुब फले-फूले। हालात इस्ट इंडिया कंपनी की तरह हो गयी जिसने निजी उद्यमियों का उत्साह खत्म कर दिया।परिणाम ये हुआ कि ये मिलें ‘सफेद हाथी’ बन गईं और अंततः बंद हो गईं।
निष्कर्ष: यह कहना बिल्कुल सटीक है कि ये परिणाम प्रशासनिक विफलता, राजनीतिक विफलता, चुनावी चंदा का ही दूसरा स्वरूप है। नेहरू और तत्कालीन सरकारों की आर्थिक नीतियों ने मध्य प्रदेश के एक फलते-फूलते कपास साम्राज्य को कागजी कार्रवाई और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया।नेहरू काल ने जिस ‘कंट्रोल इकोनॉमी’ (नियंत्रित अर्थव्यवस्था) का ढांचा खड़ा किया गया, उसने सरकारी बाबुओं को असीमित शक्तियां दीं, चुनावी फंडिंग के स्रोत बने, जो ईस्ट इंडिया कंपनी बनकर किसानों, उद्यमियों और व्यापारियों को नोच खाया।



