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जनरल नरवणे की 'किताब' से सियासत में भूचाल, क्या चीन के सामने 'लाचार' थी मोदी सरकार?


जनरल नरवणे की 'किताब' से सियासत में भूचाल, क्या चीन के सामने 'लाचार' थी मोदी सरकार?
भारत-चीन सीमा विवाद एक बार फिर देश के राजनीतिक गलियारों में गूँज रहा है। लेकिन, इस बार वजह कोई ताज़ा झड़प नहीं, बल्कि पूर्व सेना प्रमुखजनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब 'Four Stars of Destiny' को लेकर मचा सियासी घमासान इस समय देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद में एक ऐसी किताब का मुद्दा उठाया है जो अभी तक बाज़ार में आई ही नहीं है। 

इसको हवाले राहुल गांधी ने सरकार पर आरोप लगाते है कि जब 2020 में चीनी टैंक भारत की सीमा की ओर बढ़ रहे थे, तब प्रधानमंत्री मोदी ने फैसला लेने के बजाय सारा ज़िम्मा सेना प्रमुख पर छोड़ दिया था। आज की इस विशेष रिपोर्ट में हम विश्लेषण करेंगे कि आखिर उस 'जो उचित समझो, वो करो' वाले संदेश का असली सच क्या है?

जनरल नरवणे की आत्मकथा 'Four Stars of Destiny' को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब कुछ अंतरराष्ट्रीय और भारतीय मीडिया संस्थानों ने इसके अंश प्रकाशित किए। किताब में 31 अगस्त 2020 की उस रात का ज़िक्र है, जब पूर्वी लद्दाख के रेचिन ला में भारतीय और चीनी टैंक आमने-सामने थे। राहुल गांधी का दावा है कि जब सेना प्रमुख ने रक्षा मंत्री, NSA और सरकार से स्पष्ट निर्देश मांगे, तो उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। अंत में प्रधानमंत्री का संदेश आया— "जो उचित समझो, वो करो।"

नेता-प्रतिपक्ष राहुल गांधी का हमलाः

संसद के बजट सत्र (फरवरी 2026) के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस किताब की एक प्रति सदन में लहराते हुए सरकार को चुनौती दी। राहुल गांधी ने कहा, "प्रधानमंत्री सेना प्रमुख को अकेला छोड़ देते हैं और कहते हैं कि आप खुद देख लो। यह नेतृत्व की विफलता है।" कांग्रेस का दावा है कि सरकार इसीलिए इस किताब के प्रकाशन पर रोक लगा रही है क्योंकि इसमें चीन की घुसपैठ और 'अग्निपथ' योजना पर सरकार की पोल खोली गई है।

“कांग्रेस नेता व नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इसे सरकार की 'कायरता' और 'जवाबदेही से भागना' बता रहे है। राहुल गांधी का तर्क है कि प्रधानमंत्री ने मुश्किल वक्त में सेना को अकेले छोड़ दिया।” 

सरकार ने दिया करारा जवाबः

वहीं, सरकार और रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री का यह संदेश दरअसल सेना को 'पूरी स्वायत्तता (Full Autonomy)' देने का प्रमाण है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में साफ कहा कि ऐसी संवेदनशील जानकारी वाली किताब को बिना रक्षा मंत्रालय की मंजूरी के सार्वजनिक करना राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है।

सरकार बताती है कि युद्ध के मैदान में जब स्थिति पल-पल बदल रही हो, तो दिल्ली में बैठे राजनेता ज़मीनी हालात का अंदाज़ा नहीं लगा सकते। सैन्य जानकारों के मुताबिक, "जो उचित लगे वो करो" का मतलब सेना को वह अधिकार देना है जो किसी भी मज़बूत लोकतंत्र में एक सेना प्रमुख को मिलना चाहिए। नरवणे ने भी किताब में ज़िक्र किया है कि उस रात भारतीय सेना ने जो सामरिक बढ़त (Strategic Advantage) बनाई, उसने चीन को बातचीत की मेज़ पर आने के लिए मजबूर कर दिया।

विवाद तब और गहरा गया जब इस किताब की एक PDF फाइल सोशल मीडिया पर लीक हो गई। दिल्ली पुलिस ने इस पर FIR दर्ज की है, और प्रकाशक 'पेंग्विन' ने साफ किया है कि उन्होंने किताब अभी तक छापी ही नहीं है। सवाल यह है कि अगर किताब छपी ही नहीं, तो राहुल गांधी के हाथ में वो कॉपी कहाँ से आई? और क्या सरकार वास्तव में कुछ छिपाना चाह रही है, इसीलिए किताब की मंजूरी रुकी हुई है?

निष्पक्ष बात राजनीतिक जानकारों व रक्षा विशेषज्ञों का दो टूक जवाबः 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद केवल एक किताब तक सीमित नहीं है। यह 2020 के गलवान संघर्ष और उसके बाद की स्थिति पर सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है। यदि जनरल नरवणे ने वास्तव में यह लिखा है कि वे उस रात 'अकेला' महसूस कर रहे थे, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के निर्णय लेने की प्रक्रिया (Decision Making Process) पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का एक तबका यह भी मानता है कि युद्ध जैसे हालात में ज़मीनी कमांडर को स्वतंत्र छोड़ना ही सबसे सटीक रणनीति होती है, जिसे विपक्ष गलत तरीके से पेश कर रहा है।

निष्कर्ष: जनरल नरवणे की किताब सत्य का दस्तावेज़ है या विपक्ष का चुनावी हथियार, यह तो इसके आधिकारिक विमोचन के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन फिलहाल, इस मुद्दे ने देश की सुरक्षा और राजनीति के बीच की लकीर को और धुंधला कर दिया है। सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के फैसलों को चुनावी राजनीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए? जनरल नरवणे की किताब में सेना की बहादुरी की गाथा है या सरकार की लाचारी का दस्तावेज़, यह तो पूरी किताब आने के बाद ही साफ होगा। लेकिन फिलहाल, 'नालंदा5' का मानना है कि सेना के मनोबल और सरहद की सुरक्षा पर राजनीति देश के हित में नहीं है।

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