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आजकल नरेंद्र मोदी के रैली का काफ़िला एंबुलेंस को रास्ता देने का काम कर रहा है और सुर्खियाँ भी बटोर रहा है। भारतीय मीडिया में इसकी चर्चा हो रही है। अब इसके साथ ये भी सवाल उठाए जाने शुरु हो गए है, क्या एंबुलेंस का रास्ता देना सत्य और जायज है? इसकी सच्चाई पर सवाल इसलिए खङा हो रहा है कि पहले हिमाचल प्रदेश में और अब गुजरात में एंबुलेंस को रास्ता दिया गया। दोनों काम चुनाव के समय किये गए। जायज को लेकर सवाल इसलिए कि प्रधानमंत्री के सुरक्षा को देखते हुए ऐसा करना कितना सही !
कुछ दिन पहले हिमाचल प्रदेश के चुनावी सभा को संबोधित करने के लिए नरेंद्र मोदी काफ़िला के साथ जा रहे थे। इस दरम्यान अच्छी-खासी चौङी सङक पर एंबुलेंस का रास्ता दिए थे। सङक भीङ-भाङ के इलाका से दूर नज़र आता है। लोग भी कम दिखाई देते है। एंबुलेंस को रास्ता दिया जाता है और फिर नरेंद्र मोदी के नारे लगाए जाते है। एंबुलेंस को दूर तक का विडियोग्राफी की जाती है। जिसके बाद मोदी के काफ़िला को निकाल दिया जाता है। ये सब ऐसे सम्पन्न होता है जैसे सोच-समझकर, किसी समुदाय को बताने के लिए किया गया हो।
अभी हाल ही नरेंद्र मोदी गुजरात के चुनावी दौरा पर गए, यहाँ भी एंबुलेंस को रास्ता दिया गया। जहां एंबुलेंस का रास्ता दिए गए, यह भीङ-भाङ का इलाका था। प्रधानमंत्री का काफ़िला गुजर रहा होता है उसी दरम्यान एक एंबुलेंस को रास्ता दे दिया जाता है। हिमाचल प्रदेश और गुजरात दोनों जगह से गुजरनेवाला एंबुलेंस को साधारण नजर से देखने पर समानता प्रतित होता है। हालांकि इस पर दावा नहीं किया जा सकता। एक बात और गुजरात का एंबुलेंस को देखने से ऐसा प्रतित होता है कि इस पर हाल ही में पेन्ट किया गया हो।
नरेंद्र मोदी के गुजरात चुनावी प्रचार अभियान के समय एंबुलेंस का रास्ता दिए गए, उसी समय एक दूसरा एंबुलेंस मोदी के काफ़िला के वजह से खङा था। मरीज के परेशानी की वजह से एंबुलेंस आवाज दे रहा था, लेकिन कोई सुननेवाला नहीं था। क्या ये सोचने पर मजबूर नहीं करता कि एक एंबुलेंस को रास्ता दिए गए, वहीं दूसरा एंबुलेंस अवाज देता रहा, लेकिन मोदी जी के काफ़िला के लोग में से किसी ने सुना ही नहीं।

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