मणिपुर जाने से राहुल गांधी को मोदी सिपाहियों द्वारा रोके जाने पर कांग्रेस
के तेवर आजादी जैसे।कई पार्टियों के नेता मणिपुर के मुद्दे पर पीएम मोदी से मिलना चाह रहे हैं, लेकिन पीएम के पास समय नहीं है
सरकार की लाख कोशिशों और अवरोधों के बावजूद, कांग्रेस नेता राहुल गांधी मणिपुर के हिंसा
पीड़ितों के बीच पहुंच ही गए। मणिपुर के लोगों के बीच पहुंचकर राहुल जी ने उन्हें
विश्वास दिलाया कि वो उनके साथ हैं और हमेशा साथ रहेंगे।
उनके कंधों पर हाथ रख ये भरोसा दिलाया कि एक रोज सब ठीक हो जाएगा,
नफरत की आग बुझेगी और मोहब्बत का गुलिस्तां राज्य में जरूर खिलेगा।
ज़ुल्मी सत्ता के गलियारों से ज़ुल्म करने से बाज नहीं आया गांधी को
रोकने का हर पैंतरा अपनाया, लेकिन सामने खड़े राहुल गांधी थे, जिन्होंने ठान लिया था कि मणिपुर को उसके हाल
पर नहीं छोड़ेंगे लोगों से
मिलेंगे और उन्हें मोहब्बत का पैग़ाम देंगे।
बस फिर क्या था! राहुल पहुँच गये अपनों के बीच और लोगों का हाल जाना- उन्हें विश्वास दिलाया कि वो हर क़ीमत पर आपके साथ हैं, और आगे भी रहेंगे।
मणिपुर के हालत ये हो गई है कि लोग अपना घर छोड़ कर कैम्प में रहने
को मजबूर हैं। यह एक त्रासदी नहीं तो क्या है! इनके आंसुओं को देख कर मन क्षुब्ध
हो जाता है। क्या मतलब है, इस सत्ता और शक्ति का जब लोगों का यह हाल है।
मणिपुर दो महीने से हिंसा की आग में झुलस रहा है। न सरकार नाम की कोई
चीज़ बची है और न ही क़ानून का शासन। हज़ारों लोग राहत कैम्प
में ज़िंदगी के जोखिमों से जूझने को मजबूर हैं। लाचारी और बेबसी इस कदर है कि
शांति के सूरज की कोई किरण नज़र नहीं आती।
मोदी जी “मौन” हैं, गृह
मंत्री ने अपनी विफलताओं से पल्ला झाड़ लिया है। लगता है कि भाजपा सरकार के लिए
जैसे मणिपुर देश के नक़्शे में है ही नहीं।
ऐसे में जब “राहत के सिपाही” बन श्री राहुल गाँधी घावों पर मरहम लगाने मणिपुर पहुँचे, तो मोदी सरकार
के सिपाहियों ने उन्हें शरणार्थियों के कैम्प तक जाने से भी रोक दिया।
मोदी जी, मणिपुर में चुनाव का इंतजार कर रहे हैं, वहाँ के नागरिकों
को ज्ञात होना चाहिए कि मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं बल्कि भाजपा के चुनाव प्रचार
मंत्री है और देश के विदेश मंत्री है जो विश्व भ्रमण पर जाते रहते है।

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