अमरुद का नाम लेते हीं बचपन की बहुत सारे यादें अंगडाईयां लेने शुरू कर देती है। जैसे, बिहार राज्य के नालंदा जिला के जिस गांव में बचपन गुजरा वहां के लोग अपने घरों में अमरुद का पेड़ लगाने के रिवाज से ओत-प्रोत थे। घर के दरवाजे के पास भी कुछ लोग अमरुद का पेड़ लगाया करते, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या न के बराबर थी, यूं कहें था हीं नहीं। गांव में जीतने अमरुद के पेड़ थे वो सभी एक चाहरदीवारी के अन्दर कैद थे और इसके साथ इसपर कठोर पहरा देने की प्रथा थी। पहरा ऐसा होता जैसे आज के नेता चुनाव के समय अपने मतदाताओं पर देते हैं। आज भी यहाँ अमरुद की गाछ दरवाजे के पास ही देखने को मिलता हैं, हलांकि घर के आंगन में लगाना लोग छोड़ चुके हैं, क्योंकि अब के घर पहले जैसा मिट्टी के दिवार से या बीस इंच मोटी ईंट से बने नहीं हैं बल्कि दस इंच के पक्की ईंट और सीमेंट से मिलकर बनी है। समय के अनुसार सब कुछ बदल जाता है और बदलने में हीं समझदारी है लेकिन एक बात जो आज भी यहाँ के लोगों में कूट-कूट कर भरा पड़ा है वो है अमरुद से लादे पेड़ के प्रति प्रेम और इसपर पहरा देने का रिवाज आज भी यह प्रथा वैसे हीं मौजूद है जैसे नब्बे के दशक में ...