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अमरुद- अमरुद का नाम लेते हीं बचपन की बहुत सारे यादें अंगडाईयां लेने शुरू कर देती है जैसे!




अमरुद का नाम लेते हीं बचपन की बहुत सारे यादें अंगडाईयां लेने शुरू कर देती है। जैसे, बिहार राज्य के नालंदा जिला के जिस गांव में बचपन गुजरा वहां के लोग अपने घरों में अमरुद का पेड़ लगाने के रिवाज से ओत-प्रोत थे। घर के दरवाजे के पास भी कुछ लोग अमरुद का पेड़ लगाया करते, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या न के बराबर थी, यूं कहें था हीं नहीं। गांव में जीतने अमरुद के पेड़ थे वो सभी एक चाहरदीवारी के अन्दर कैद थे और इसके साथ इसपर कठोर पहरा देने की प्रथा थी। पहरा ऐसा होता जैसे आज के नेता चुनाव के समय अपने मतदाताओं पर देते हैं।

आज भी यहाँ अमरुद की गाछ दरवाजे के पास ही देखने को मिलता हैं, हलांकि घर के आंगन में लगाना लोग छोड़ चुके हैं, क्योंकि अब के घर पहले जैसा मिट्टी के दिवार से या बीस इंच मोटी ईंट से बने नहीं हैं बल्कि दस इंच के पक्की ईंट और सीमेंट से मिलकर बनी है। समय के अनुसार सब कुछ बदल जाता है और बदलने में हीं समझदारी है लेकिन एक बात जो आज भी यहाँ के लोगों में कूट-कूट कर भरा पड़ा है वो है अमरुद से लादे पेड़ के प्रति प्रेम और इसपर पहरा देने का रिवाज आज भी यह प्रथा वैसे हीं मौजूद है जैसे नब्बे के दशक में था।

हरे पत्तो से सज़ा अमरुद का पेड़ पर जब फल लगता तो छोटे-छोटे पतली डालियाँ नीचे की ओर झुकने की तैयारी में जूट जाती। एक पतली डाली में तीन से चार फल तक होते हीं। लेकिन इतना होने से पहले डाली में फूल लगता, उसपर भौरें मंडराते और फ़िर छोटे-छोटे, नन्हें–नन्हें फल लगना शुरू होता के समय का दृश्य हीं कुछ अलग होता। कोई भी जब इस नन्हे फल को देख लें तो ऐसा लगता जैसे इसे देखते रहें। फूल और साथ में नन्हें फल को जब निहारने के लिए पेड़ के पास खड़ा होता तो आँखें और दिल आनंद से उछल पड़ता। इस समय तो कोई भी इस पेड़ पहरा देनेवाला भी नहीं होता। लोग अपने घरों में निश्चिन्त भाव से अपना काम कर रहे होते।

इस समय जब अमरुद की डालियों में हवा का प्रवेश होता तो सारे नन्हें फल खिलखिलाते हुए झुमने लगते जबकि डाली में लगे पत्ते उस नन्हे से जान को ढंकने का प्रयास करती लेकिन ये मानते नहीं और लोगों को देखने लग जाते, दुनिया को देखने में मशगुल हो जाते। इस समय इनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं होता, क्योंकि इस समय इसके दुश्मन कोई नहीं होता। इसके मालिक भी इस समय इसे तोड़ नहीं सकता था और न हीं किसी द्वारा तोड़ने का डर और न हीं जोर हवा से टूटकर गिरने का भय से बिल्कुल हीं नन्हें अमरुद इस धरती पर जन्म लेने का जश्न मनाते रहते और किसी को देखते हीं खुश हो जाते।

इस समय इन नन्हें बालकों के बारे में यह बताना बड़ा मुश्किल काम था कि वे बड़ा होकर किस आकार के होंगें उनका भविष्य क्या होगा ? सभी के सभी नन्हें से फ़रिश्ते जैसे दिखते, जिसको बचाने का प्रयास में सभी लोग प्रयास करते रहते। जिसके बावजूद भी कुछ दरिन्दे मनुष्य इन नन्हें फलों से लदे डाली को तोड़कर अपनी दांत की काय को साफ करते। मनुष्य पहले एक ऊँगली इतनी मोटी डाली को बेरहमी से तोड़ता फ़िर उसमें से छोटे-छोटे डाली को तोड़कर ऐसे फेंकते जैसे कोई दुग्ध में गिरी मक्खी को ग्लास से निकालकर फेंकता हो। फेंके हुए डाली में अमरुद के नन्हें फल चुपचाप अलग हो जाते। जिसके बाद से इनका किस्मत बदल जाता। इन्हें गांव के लोग अपने पैरों से रौंदते रहते। गली से गुजरनेवाले जानवर यदि खा लेते तो ठीक, नहीं तो वे लोगों और जानवरों के द्वारा कूचल दिए जाते और फ़िर इनका धरती पर से अस्तित्व समाप्त हो जाता। यदि ये आकार में बड़े या गोलाकार होते तो सूखने के बाद गांव के बच्चे इसे नया जीवन देने का एक प्रयास करते और इसे लट्टू बनाकर नचाते और फ़िर अपने घर में किताबों के साथ बड़े प्यार व आदर के साथ रखते इतना हीं नहीं इसे पूरा पैंट के जेभी में लेकर घूमते रहते।

फलों से लदे डाली को तोड़ने का काम सबसे ज्यादा उन लोग करते जो ईश्वर के उपासना करते और जो अमरुद के पेड़ का मालिक होते। उपासना में दिन भर भूखे रहते और फ़िर जब मुंह धोकर फल खाने का समय आता तो अमरुद के छोटी डाली जिसमें फल लगा न हो देखकर उसे तोड़ लेते फ़िर भी कुछ नन्हें फल तो होते हीं लेकिन कुछ लोग तो बिना उपासना किये हीं तोड़ देते इनका क्या ? फल से लदे डाली को तोड़ने का सिलसिला फल का पूर्ण आकार लेने तथा इसे खाने लायक होने तक चलता रहता ऐसे तो फल को खाने लायक होने के समय पेड़ के मालिक का पहरा तेज हो जाता इस समय पेड़ के मालिक और इसके सगे सम्बन्धी हीं डाली को तोड़ सकते थे अन्जान को तोड़ने के बात से इनकार तो नहीं कर सकते लेकिन यह बड़ा मुश्किल काम था।

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