“श्रम
विभाजन और जाति प्रथा-डाक्टर भीमराव अंबेदकर”
भारतीय लोकतंत्र के भावी नागरिकों के लिए
यह आलेख अत्यंत शिक्षाप्रद है। यह आलेख बिहार स्टेट टेक्सबुक के दसवीं कक्षा के
हिन्दी पाठ्यपुस्तक से लिया गया है, जिसका एकमात्र उद्देश्य
इस बात को लोगा तक पहुँचाना है जो बाबा साहेब के विख्यात भाषण ‘एनीहिलेशन आॅफ
कास्ट’ के अंश है, जिसे ललई सिंह यादव के द्वारा हिन्दी
रूपान्तर किया गया है। इस भाषण को लाहौर के एक वार्षिक सम्मेलन (सन् 1936) में
बोलना था,
लेकिन
नहीं पढ़ा जा सका और फिर इस भाषण को एक किताब के रूप में प्रकाशित किया गया।
यह विडंबना की ही बात है कि इस युग में भी
‘जातिवाद’ के पोषकों की कमी नहीं है। इसके पोषक कई आधार पर इसका सर्मथन करते हैं।
सर्मथन का एक आधार यह कहा जाता है कि आधुनिक सभ्य समाज ‘कार्य कुशलता’ के लिए श्रम
विभाजन का ही दूसरा रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है। इस तर्क के संबंध में
पहली बात तो यही आपतिजनक है कि जाति प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन
का रूप लिए हुए है। श्रम विभाजन, निश्चय ही सभ्य समाज की आवश्यकता है, परंतु
किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन कि व्यवस्था श्रमिकों के विभिन्न वर्गों में
अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती बल्कि विभाजित वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच
भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं
पाया जाता।
जाति प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान लिया
जाए तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की
रूचि पर आधारित नहीं है। कुशल व्यक्ति या सक्षम श्रमिक समाज का निर्माण करने के
लिए यह आवश्यक है कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें, जिससे
वह अपने पेशा या कार्य का चुनाव स्वंय कर सके। इस सिद्धांत के विपरीत जति प्रथा का
दूषित सिद्धांत यह है कि इससे मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार
किए बिना,
दूसरे
ही दृष्टिकोण, जैसे माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार, पहले
से ही अर्थात गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर जाता है।
जाति प्रथा पेशे का दोषपूर्ण
पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवनभर के लिए एक पेशे में बांध भी
देती है। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए।
आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है, क्योंकि उद्योग-धंधों की
प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अक्समात परिर्वतन की अनुमति न देकर
जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रम विभाजन की
दृष्टि से भी जाति प्रथा गंभीर दोषों से युक्त है। जाति प्रथा का श्रम विभाजन
मनुष्य को स्वच्छा पर निर्भर नहीं रहता। मनुष्य कि व्यक्तिगत भावना तथा व्यक्तिगत
रूचि का इसमें कोई स्थान अथवा महत्व नहीं रहता। इस आधार पर हमें यह स्वीकार करना
पड़ेगा कि आज के उद्योग में गरीबी और उत्पीड़न इतनी बड़ी समस्या नहीं जितनी यह कि
बहुत से लोग ‘निर्धारित’ कार्य को ‘अरूचि’ के साथ केवल विवशतावश करते हैं। ऐसी
स्थिति स्वभावतः मनुष्य को दुर्भावना से ग्रस्त रहकर टालू काम करने और कम काम करने
के लिए प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में जहाँ काम करने वालों का न दिल लगता हो न
दिमाग,
कोई
कुशलता कैसे प्राप्त कि जा सकती है। अतः निर्विवाद रूप से सिद्ध हो जाता है कि
आर्थिक पहलू से भी जाति प्रथा हानिकारक प्रथा है। क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक
प्रेरणारूचि व आत्म-शक्ति को दबा कर उन्हें अस्वाभाविक नियमों में जकड़ कर
निष्क्रिय बना देती है।
अब मैं समस्या के रचनात्मक पहलू को लेता
हूँ। मेरे द्वारा जाति प्रथा की आलोचना सुनकर आप लोग मुझसे यह प्रश्न पूछना चाहेंगे
कि यदि मैं जातियों के विरुद्ध हूँ, तो फिर मेरी दृष्टि में
आर्दश समाज क्या है? मेरा उतर होगा कि मेरा आर्दश समाज
स्वतंत्रता, समता, भ्रातृत्व पर आधारित
होगा। क्या यह ठीक नहीं है, भ्रातृत्व अर्थात भाईचारे में किसी को
क्या आपति हो सकती है? किसी भी आर्दश समाज में इतनी गतिशीलता
होनी चाहिए जिसमें कोई भी वांछित परिर्वतन समाज के एक छोर से दूसरे छोर तक संचारित
हो सके। ऐसे समाज के बहुविध हितों में सबका भाग होना चाहिए तथा सबको उनकी रक्षा के
प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध
रहने चाहिए। तात्पर्य यह कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक
रूप है,
और
इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं
है,
लोकतंत्र
मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान
का नाम है। इसमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव
हो।

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