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महात्मा बुद्ध अपशब्द बोलनेवाले को ऐसे ज्ञान दिए थे ।

इस भागम-भाग की जिन्दगी में कौन क्या कर रहा है भला इस पर कौन ध्यान देता है? फ़िर भी कुछ लोग अपने भड़ास निकालने के लिए अपने से ऊँचे ओहदे या नीचे ओहदे वालों से दुखी हो जाते हैं तो उनको अपशब्द तक बक देते हैं। इससे किसी का फ़ायदा नहीं होता न कहनेवाला को और न हीं जिसको अपशब्द कहा गया था उसको कुछ नुकसान होता है। फ़िर अपशब्द कहने से क्या फायदा। इसलिए उससे अच्छा तो यह होगा कि हम मौन हीं रहें ।

ऐसे तो आज का समय यह है की कोई किसी को निंदा नहीं करना चाहता और न हीं गाली-गलौज जैसे व्यवहार करता है, क्योंकि लगभग सब लोग जान चुके हैं कि ये दोनों व्यवहार गलत है। ऐसा बरताव करनेवाले से भला कौन संबंध रखना चाहेगा। उल्टे अपशब्द बोलनेवाले अपने आस-पास के लोगों से अलग-थलग हो जाते हैं। ऐसे आदमी को लोग यहीं कहते हैं कि यह व्यक्ति ठीक नहीं है, इसके पास बैठना पाप है तथा इससे दोस्ती रखने का मतलब है बिरादरी में बदनाम हो जाना। व्यक्ति पढ़ा-लिखा हो या फ़िर अनपढ़ हीं क्यों न हो सबको मालूम है कि निंदा तथा गाली जैसे व्यवहार करना अच्छे मनुष्य का शोभा नहीं देता है।

इतना सबकुछ जानने के बावजूद भी निंदा और गाली से हमसब अछूता नहीं है, हमें ऐसे व्यक्तियों से कभी न कभी पाला पड़ हीं जाता है या अपशब्द बोलने के चक्कर में पड़ हीं जाते हैं। हम जाने-अन्जाने में किसी के साथ ऐसा व्यवहार कर देते हैं कि उस मानव को निंदा या गाली देने के अलावा कोई रास्ता हीं नहीं बचता है। वह मनुष्य जो आपके व्यवहार से दुखिद है, आपके द्वारा दिए गए पीड़ा को सहने में असमर्थ है, उस अवस्था में वह अपनेआप को तसल्ली देने के लिए इसका सहारा ले लेता है। जैसे गम भुलाने के लिए कुछ लोग शराब का सहारा लेते हैं जो बिल्कुल गलत है। इससे बचना हीं हमारे और हमारे परिवार एवं समाज की भलाई है।
पहले तो हमे यह सिखने की जरूरत है कि चाहे जो, हो किसी को निंदा नहीं करनी चाहिए और न हीं किसी को गाली देनी चाहिए और न हीं सुनने पर विचलित होना चाहिए। इसके बगैर भी हम संतुष्टि के साथ रह सकते हैं बस थोड़ा धैर्य रखना होगा और प्रयास करना होगा सब सम्भव है। कुछ लोग बिना शराब के प्रयोग किये हीं अपना सारा गम भुला देते हैं। जिस दिन, कितनों बड़ा कारण क्यों न हो दुसरों को निंदा करना या गाली देना जैसी बात आपके दिमाग में नहीं आया तथा दुसरों के द्वारा निंदा और गाली सुनाये जाने पर आप विचलित नहीं हुए मतलब आप विशिष्ट पुरुष की श्रेणी में शामिल हो गए। आपके अन्दर  पुरुषार्थ का जन्म हो चुका है। आप बहुत बड़े इन्सान बन चुके हो। इसलिए पुरुष बनिये, इसके लिए जरूरत है कि अपने अन्दर के पुरुषार्थ को जिन्दा करना होगा। इस अवस्था में आने के बाद आप अपने विरोधियों का सामना चातुर्य और प्रत्युत्पन्न मति से करने लगेंगे।

एक बार की बात है महात्मा बुद्ध पेड़ के नीचे बैठे थे। उस समय कठोरता के साथ एक व्यक्ति ने उनको गालियाँ देने लगा। वह अज्ञानी व्यक्ति बुद्ध को गालियाँ देता रहा और निंदा करता रहा। लेकिन बुद्ध चुपचाप सुनते रहे। उस व्यक्ति का गालियाँ देना व निंदा करना बन्द हुआ। तो बुद्ध ने पुछा; ‘वत्स’, यदि कोई दान को स्वीकार नहीं करे तो उस दान का क्या होगा? व्यक्ति ने उतर दिया: वह देनेवाले के पास ही रह जाएगा। तब बुद्ध ने कहा, ‘वत्स मैं तुम्हारी गालियाँ लेना स्वीकार नहीं करता’। बुद्ध को अपशब्द कहनेवाला व्यक्ति बहुत शर्मिंदा हुआ और फ़िर इस बात को लेकर बुद्ध से माफ़ी मंगा। 

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