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सरल स्वभाव की प्यारी किट्टी - भाग एक

बहुत हीं शान्त स्वभाव की किट्टी को किसी से भी इससे प्यार हो जाय! इसकी सादगी और मिलनसार प्रवृति से हम प्रभावित हुए। वह अपनी ओर हमे आकर्षित करने में सफल रही। ऐसे तो यह एक जानवर है जो हमेशा घूम-घूम के जीवन व्यतीत करती है। दूसरे तरह से कहे मतलब इसका कोई निश्चित ठिकाना या बसेरा देखने को नहीं मिला। और इसमें एक ख़ास गुण देखने को यह मिला कि इसे किसी से बैर करते भी नहीं देखा। इतने नरम दिल वाली शायद हीं कोई हो। इसके इस स्वभाव से हम भी जलसी हो जाते। अपने बच्चों को इससे दूर रहने की हिदायत हमेशा देते। 

लेकिन, इसके करीब जाने से हम अपने आप को रोकने में उससे पराजित हो गए। वो एक जानवर और हम मानव, उसमें भी पढ़ा-लिखा मानव, फ़िर भी उस जानवर ने अपने सरल स्वभाव के मामले में और लोगों के साथ रहने के मामले में हमे पराजित कर दिया। मैं उससे हार स्वीकार करता हूँ। शायद इसलिए हमारे बच्चे भी इसके पास चले जाते और इसे खाना खिला हीं देते। लाख मना करने पर भी बच्चे नहीं मानते।

गांव के बच्चे तो इसे 'कुतिया' कहकर बुलाते। हलांकि इस क्षेत्रवासियों के लिए कुतिया शब्द एक बोलचाल की भाषा है। यूं कहें इस जानवर के लिए यह एक कॉमन नाम है। यह बताना बड़ा मुश्किल है कि जब भी लोग इसे इस नाम से पुकारते हमें बहुत दुःख होता। ऐसा लगता की किसी ने मुझे इस नाम से पुकार रहा हो! इसलिए हम सब ने इसे प्यार से "किट्टी" कहकर बुलाना शुरू कर दिया। यह नाम इस पर उपयुक्त बैठता और इसे इस नाम से पुकारने में हमे भी अच्छा और प्यारा लगता। 

इसके साथ मुलाकात कैसे हुई कि कहानी भी अजब-गजब है। हम दोनों की पहली मुलाकात उस समय हुई जब हम अपने दरवाजे पर यूं हीं खड़े थे। बगैर काम के किसी स्थान पर यूं हीं खड़ा रहना कितना अटपटा लगता है? अपने दरवाजे पर भी खड़ा रहना शर्म की बात है। ऐसे तो ये काम वहीँ कर सकता है जो पूर्ण रूप से बेरोजगार हो। लेकिन इस जमाने में बेरोजगार रहना उतना हीं मुश्किल काम है जितना पैसा कमाना। इस प्रकार के दौर में मेरी लाइफ़ सौ की स्पीड से दौड़ लगा रही थी। जहाँ जाते और जिसके पास जाते काम तो मिलता लेकिन पैसे की बात आती काम का 'द इंड' हो जाता।  

किट्टी और हम दोनों में इस बात की समानता था कि हम भी पेट के लिए भटक रहे थे और वो (बेचारी किट्टी) भी अपने पेट के लिए इधर-उधर घुमते रहती। इस बात की समानता ने हीं हम दोनों को एक साथ मिला दिया। ईश्वर ने हम दोनों को एक दूसरे को समझने का अवसर दिया, वह मेरे पास आकर खड़ी हो गई और अपनी दूम हिलाने लगी। बगैर जान-पहचान के इसका ऐसे आना और दूम हिलाना मुझे अटपटा व बहुत हीं भद्दा मजाक लगा। जिससे हम अपने घर के अन्दर को चले गए। 

कुछ देर बाद, जब हम फ़िर अपने घर से बाहर वैसे हीं काम के सिलसिले से दरवाजे से बाहर निकले तो वह मेरे दरवाजे के पास बैठी थी। वह मुझे अपने पास आता देख वह झट से खड़ी हो गई, मुस्कराते हुए हमें स्वागत की और दूम हिलाते हुए हमे जाने का रास्ता दे दी। यहीं काम उसका महीनों तक चलता रहा। सारा दिन मेरे दरवाजे पर बैठी रहती रात को भी घूम-फिरकर मेरे दरवाजे पर हीं चली आती। उसे हम खाना भी नहीं देते, फ़िर भी वह मेरे दरवाजे की रखवाली करते हमेशा दिखाई दे हीं जाती। 

इसके इस रवैये से हम तो परेशान होने लगे, सोचने पर मजबूर हो गए कि इस जमाना में पैसा लेकर भी लोग काम नहीं कर रहें हैं, हमे धोखा दे जाते हैं, पैसा ठग कर निकल जाते हैं और यह बिना खाये - पिये हमारे दरवाजे की रखवाली करती रहती है। वो भी सिद्दत के साथ! यह कैसे सम्भव है? फ़िर याद आया कि हमारी जिन्दगी भी इसके जिन्दगी से कम थोड़े है! हम काम कर रहे हैं, रोज काम पर जाते हैं और जब अपने बॉस से पैसा मांगते हैं तो बॉस हमे समझाते हुए बड़े प्यार से कहते हैं कि "बेटा मीडिया का काम में पैसा अभी भूल जाओ! हम मीडिया में लगातार चार साल फ्री में काम किये वो भी पटना जैसे शहर में, तब आज इस मुकाम पर हूँ"।

खैर छोड़िए हमारी बात! हम किट्टी के बारे में और अधिक जानकारी लेना शुरू कर दिया। अपने घरवालों से, अपने घर के आसपास के लोगों से, गांव के बच्चों से और गांव के महिलाओं से पुछा तो पाया कि वह सभी घर घूमते रहती है। एक महिला ने इसके बारे में बहुत कुछ बता दिया। इतना कि शायद वह भी अपने बारे में नहीं जानती होगी। उन्होंने कहा कि इस कुतिया को हमेशा देखती हूँ कि वह मेरे दरवाजे पर हीं तो बैठी रहती है। खाना नहीं भी देती हूँ फ़िर भी बैठी रहती है। जहाँ कुछ भी खाना मिलता है, उसे खाकर अपना पेट भर लेती है और वहीँ सो जाती है। रोजाना का इसका यहीं काम है।

जब हमने पुछा कि आख़िर यह कितने घर जाती होगी और इसे कौन-कौन खाना देता है? इस बात पर जवाब तलब करते हुए उन्होंने हमे बताया कि यह आस-पास के सभी घरों के दरवाजे पर जाती है, लेकिन किसी के घर से इसे खाना नहीं मिलता, क्योंकि वह जिन-जिन घरों के पास जाती है इन सभी के घरों में भैंस या गाय को पालने का काम होता है और इन घरों का रिवाज यह है कि ये लोग अपने घर का जूठा गाय-भैंस को खिला देते हैं। घर के लोग अपना जूठा भोजन अपने जानवरों को दे देतें हैं, मुझे नहीं लगता कि कोई इसे खाना देता होगा!  

वह आगे कहती हैं कि यह कुतिया रोज लगभग सभी के दरवाजे का चक्कर काट लेती और कोई तरस खाकर भी इसे इतना खाना नहीं देता है, जिससे वह अपना पेट पूजा कर ले। यह कई दिनों तक गांव के गलियों में हमारे घरों के आस-पास भूखे भी घूमते रह जाती है। और वह हमारे आसपास घूमते-घूमते कहीं भी, भूखे हीं सो जाती है। ये लावारिस है! कोई भी इसे पाल नहीं रहा है, आप इसे खाना दे सकते हैं और इसे पाल सकते हैं। लेकिन, इसको तो घूमने की आदत है। यह आपके दरवाजे की रखवाली नहीं करेगी। यह आपका अनाज खायेगा और किसी दूसरे के दरवाजे की रखवाली करेगी। देख लेना! इसके बारे में मैं पक्का कह रही हूँ।  

आजाद ख्यालात की किट्टी, कई दरवाजे पर जाती लेकिन किसी के दरवाजे पर खाना के लिए इन्तजार नहीं करती। वह चाहे तो बच्चों के हाथों से खाना छिनकर आराम से अपना पेट भर सकती थी, लेकिन वह किसी बच्चों को नजर उठाकर देखती तक नहीं। फ़िर, इन बच्चों से 'खाना छिनकर खा लेना' किट्टी के लिए बहुत दूर की बात। अपने सर को झुकाये हीं गांव के गलियों में दिन भर घुमती रहती और जहाँ थक जाती वहीँ बैठकर अपनी आँखे बंद कर लेती। फ़िर शारीर को आराम मिल जाता या कोई बच्चा छड़ी से मार देता तो वह झट से जाग जाती और चलने लगती। फ़िर मन आता तो दरवाजे पर बैठ जाती नहीं तो गांव के गलियों में घुमने के लिए निकल पड़ती! 

जब वह सोती रहती और गांव के बच्चे उसे डरा कर भगा देते तो वह सरल स्वभाव से सर झुकाये वहां से भाग खड़ी होती। वहां से रूठ कर ऐसे भागती जैसे इसे किसी ने इसके अपने घर से निकाल दिया हो। और वह उस बच्चा के दरवाजे से ऐसे नाराज होकर भागती जैसे अब इस दरवाजा के पास कभी लौटकर आनेवाली नहीं है। उस बच्चा का कभी सकल तक नहीं देखेगी। लेकिन, इसका ये रूठना घंटो दो घंटो के लिए हीं होता। गांव के गलियों में घुम-फिरकर कुछ हीं घंटों में शाम तक वापस उसी दरवाजे पर लौट हीं आती। 

किट्टी को रूठने और मानने में ज्यादा देर का अन्तर नहीं होता, इस बात को अब हम अच्छी तरह से समझ चुके थे। रूठ जाना और फ़िर मान जाना इनके लिए बड़ी बात नहीं होती। किट्टी के लिए आम बात हो चुका था। यह इसका अपना घरेलु मामला हो गया था, इस मामले किसी दूसरे की दखलंदाजी किट्टी को पसंद नहीं थी और वह इस बात से दुखिद भी नहीं होती। इन नन्हे-नन्हे बच्चों के हाथों पीटकर शुकून महसूस करती थी, क्योंकि यदि इसके पेट में खाना होता उस समय यदि कोई बच्चा इसे पिटता तो उसके साथ खेलने लगती। गांव के बच्चों से एक पल में रूठना और पल में हीं मान जाना अब इनका फ़ितरत बन गया था। इस गांव के लोग इन्हें कोई नहीं चाहता पर कोई इन्हें डांटकर इनसे इनकार नहीं कर सकता। वह गांव वालों के सामने अपनी ऐसी छबी बना ली थी।

'किट्टी' शरीर से इतनी दुबली-पतली थी कि इन्हें जोर से भौंकने भी कहे तो भौंक नहीं सकती थी। इसके शारीर के हालात को देखने बाद मेरे लिए ये अन्दाजा लगाना बिल्कुल आसान हो गया कि इसे खाना नहीं मिलता है। बेचारी किट्टी! इस गांव में जैसे - तैसे अपना जीवन गुजारा कर हीं रही थी। इसके बारे में लोगों भी यहीं कहते कि यह जहाँ - तहां से चटकर जिन्दा है। इसकी माँ कौन थी और कहाँ से इस गांव में आयी है के बारे में ज्यादा किसी को पता नहीं, लेकिन इतना सब को पता है कि यह लगभग छह-सात साल की हो चुकी है और वह कई बार माँ भी बन चुकी है।

किट्टी की माँ बनने की कहानी भी बहुत हीं अजब-गजब से भरा है। लोग कहते हैं कि यह आज तक सीजन के अनुसार अपने बच्चों को जन्म नहीं दी है। इसने ईश्वर के नियमों को भी चुनौती देने का हिमाकत कर ली। प्राकृतिक के अनुसार इस क्षेत्र में इन जानवरों को ठंड (दिसम्बर) के महीना में अपने बच्चों को जन्म देना चाहिए। इस समय को प्राकृतिक के अनुसार उपयुक्त माना जाता है पर इसके साथ अभी तक ऐसा नहीं हुआ। यह इस मामले में प्राकृतिक के विरुद्ध हीं चली गई। ऐसा कैसा हुआ इस बात को बेजुबान किट्टी लोगों को बता नहीं सकती, लेकिन लोग इसके इस रवैये से अचम्भित हैं और यह गांव के गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। यह एक उदाह्र्ण बनकर लोगों के बिच में रहती है। लोग इसके लेकर इसे खूब खिल्ली भी उड़ाते हैं। परन्तु, इस बात को लेकर किट्टी को गांव के किसी से शिकायत नहीं है कि लोग इसके बारे में ऐसा क्यों सोचते हैं? किट्टी के आँखों में साफ दिखाई देता है कि इसे दुःख इस बात को लेकर अवश्य है कि इनका एक भी बच्चा अभी तक जिन्दा नहीं रहा, जो इसके खनदान को आगे बढ़ा सके या इसके वजूद को आगे बनाये रखे।

जब गांव के लोगों के घरों में मुर्गा, मांस, मछली के दावत होती उस शाम को उसके दरवाजे से पल भर के लिए न हटनेवाली किट्टी का किस्मत ने करवट उस समय हीं ले लिया था जब वह मुझसे टकराई थी। अब उसका जिन्दगी पहले जैसा लावारिस वाला नहीं रहा। अब उसे समय पर खाना मिल जाया करता। किट्टी आराम से आती और खाना खाकर घूमने चली जाती वो भी गांव के गलियों में नहीं बल्कि अपने दोस्तों के साथ गांव के बाहर। 

अब किट्टी के उसके सेहत में भी काफी सुधार हुआ। इस बार तो वह सही समय पर माँ भी बनी गई और नवम्बर-दिसम्बर में अपने चार बच्चों को जन्म दी। बच्चे एक महीना का हो चुके हैं और हेल्दी भी हैं। किट्टी के साथ जुड़ा ये ताना "जब ये किसी के दरवाजे पर बैठी रहती तो लोग यह कहकर इसे दुत्कार देते कि इस महंगाई में अपना पेट पालना तो मुश्किल हो रहा है और उपर से तुम बैठी रहती हो, तुम्हे जूठन भी दे देते फ़िर गाय- भैंस को क्या देंगें जो हमे दूध देती है, मेरे बच्चों का पालन करती है" जैसे ताने सुनने को नहीं मिलता। अब इसे एक दरवाजा मिल चुका है जहाँ समय पर सिर्फ इसके लिया खाना रहता है। यहाँ खाना किट्टी का इंतजार करता है।

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