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“उज्ज्वला योजना” से ग्रामीण महिलाओं के बढ़े हैं कदम।।


भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री का महत्वकांक्षी योजना “उज्ज्वला” देश के ग्रामीण महिलाओं के लिए वरदान साबित हुआ है। इसमें दो राय नहीं है तथा इसपर कोई सवाल खड़ा नहीं कर सकता। इसके जरिये हीं आज भारत के उन महिलाओं ने गैस चूल्हा से खाना बनाना शुरू किया जिनके लिए फ़िलहाल असम्भव था इससे वे कोसों दूर थीं। 

हलांकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता की आज के तारीख में ग्रामीण समुदाय के अधिकांश कनेक्शन का सिलेण्डर घर के कोने में धरा पड़ा है, लेकिन लोग साल में एकाध बार तो भरा हीं लेते हैं जैसे बरसात के समय व ठंड के समय इसमें बढ़ोत्तरी होती है बाकी गर्मी के मौसम में लोग सिलेण्डर नहीं भराते हैं क्योंकि इस समय गाय - भैंस के उपला बनाकर इससे खाना बना लेते हैं। 

उज्ज्वला को मौसमी गैस कनेक्शन कहा जाय तो इसे गलत नहीं माना जाना चाहिए बल्कि गर्व महसूस करना चाहिए। सरकार के द्वारा इतने हीं मदद से ग्रामीण महिलाओं को बड़ी राहत मिला है इसलिए इनके घरों में ख़ुशी का मौसम है जिसका श्रेय सीधे – सीधे उज्ज्वला के जनक भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है। इनके इस योगदान को भारत के ग्रामीण महिलाएँ हमेशा याद करेंगें और शायद मोदी को दोबारा सत्ता में आने का एक यहीं वजह रहा होगा।
  
उज्ज्वला सुविधा के दृष्टिकोण से बधाई का पात्र तो हैं हीं साथ में इसके जरिये देश में एक समानता का भाव भी पैदा हुआ है जो पहले शायद इसकी कमी लोगों को खल रही थी लेकिन जुबान पर नहीं आ रहा था। आज जब ग्रामीण महिलाएं अपना गैस सिलेण्डर भरवाने के लिए गैस एजेंसी के पास जाती हैं तो बहुत हीं उत्सुकता के साथ जाती है और महिला मंडली में गर्व के साथ चर्चा करती हैं कि हम भी गैस से खाना बनाते हैं। जो महिलाएं गोबर के उपला से खाना बनाती थी वह आज गैस से खाना बना रहीं हैं यह सम्भव हो चुका है। इस बात को लेकर ग्रामीण महिलाओं में बहुत ख़ुशी है। 

एक बात जरुर है कि इससे घर के खर्च पर वजन अधिक हुआ है, लेकिन सुविधा को देखते हुए इन खर्चों की चिंता घर के सरदारनी नहीं करती हैं बल्कि गर्व महसूस करती हैं। बच्चों को स्कूल भेजना हो या घर में आये मेहमान का मेजबानी करना हो में गृहणी को काफी सुविधा हुआ है। यह दोनों काम घर के गृहणी के लिए गैस के बगैर करना सम्भव नहीं था लेकिन अब सब सम्भव हो गया है घर में आये मेहमान का चाय मिलना हो या अपने बच्चों के लिए नास्ता बनाकर देना हो या फ़िर मध्यम ग्रामीण परिवार के कमासुत पुरुष को काम पर भेजना हो सब साधारण सी बात हो गई है जो इससे पहले बड़ी बात थी लोगों को भूखे जाना पड़ता था जो खत्म हो चुका है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि “उज्ज्वला” से देश पर आर्थिक दबाव बढ़ा होगा, लेकिन यह भी सच है कि ग्रामीण का बहुत बड़ा वर्ग जो गोबर के उपला से सना रहता था और देश के विकास से दूर था अब वे लोग भी देश के उद्द्योग धंधों में अपना हिस्सेदारी का हाँथ बढ़ा दिया है।    

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