शादी को एक जन्म-जन्म का बंधन
माना जाता है। ऐसे तो यह कल्चर पूरे भारत में प्रचलित है और सारे भारतवसियों शादी
को लेकर बहुत सचेत रहते हैं। यहाँ के समाज में एक कहावत खूब प्रचलित है कि “ पानी
पियो छान के बेटी ब्याहों जान के”। मतलब साफ है जिस प्रकार जल को बहुत अच्छी तरह
से छान कर पीना चाहिए जिससे स्वाथ्य ठीक रहता है उसी प्रकार अपने बेटी को जिस लड़के
के साथ ब्याहने जा रहें हैं उसको बारे में अच्छी तरह से ठोक-बजकर परख लेना चाहिए
ताकी बाद में दिक्कत का सामना करना न पड़े। इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि इस
क्षेत्र में शादी ब्याह का कितना महत्व है। इसके बावजूद भी आजकल शादी से जुड़े
समस्या को देखा सुना जा रहा है।
अब तो शादी का मामला कोर्ट तक पहुंचने लगा है जो विवाद का नया समस्या बनते जा रहा है। शादी से जुड़े दूसरी और अहम बात यह देखा जा रहा है जो दुल्हन और दूल्हा के उम्र के बारे में बयां करता है। शादी किस उम्र में होनी चाहिए को लेकर सभी वर्ग, जाति और कानून में मतभेद है। सब का अपना–अपना तर्क है जो अपने स्थान पर सही है और गलत भी हो सकता है। यहाँ के शादी सबसे रोड़ा बनकर खड़ा है वो है शादी में होनेवाला खर्च को लेकर। इससे सभी लोग परेशान दिखते हैं, लेकिन इसको बदलने को लेकर किसी की ओर (दूल्हा या दुल्हन के परिवारवालों) से कारगर पहल नहीं किया जा रहा है। जबकि हमारी सरकार इसको लेकर कई ठोस तथा अहम कदम उठा चुकी है पर इसका कोई खास असर जमीनी स्तर पर देखा नहीं जाता।
अब तो शादी का मामला कोर्ट तक पहुंचने लगा है जो विवाद का नया समस्या बनते जा रहा है। शादी से जुड़े दूसरी और अहम बात यह देखा जा रहा है जो दुल्हन और दूल्हा के उम्र के बारे में बयां करता है। शादी किस उम्र में होनी चाहिए को लेकर सभी वर्ग, जाति और कानून में मतभेद है। सब का अपना–अपना तर्क है जो अपने स्थान पर सही है और गलत भी हो सकता है। यहाँ के शादी सबसे रोड़ा बनकर खड़ा है वो है शादी में होनेवाला खर्च को लेकर। इससे सभी लोग परेशान दिखते हैं, लेकिन इसको बदलने को लेकर किसी की ओर (दूल्हा या दुल्हन के परिवारवालों) से कारगर पहल नहीं किया जा रहा है। जबकि हमारी सरकार इसको लेकर कई ठोस तथा अहम कदम उठा चुकी है पर इसका कोई खास असर जमीनी स्तर पर देखा नहीं जाता।
इसमें खास बात यह है कि
सरकार के इन फैसलों पर लोग सरकार का साथ देते नजर भी नहीं आते। सब लोग अपने क्षमता
तथा स्थिति के अनुसार शादी में फैसला लेना पसंद करते हैं। कानून का सहारा तब लेते
हैं जब शादी में विवाद उत्पन्न होता है और जहाँ इन परिवारवालों को कानून से कोई
खास राहत नहीं मिलता उल्टे थाना कोर्ट करते- करते घर का आटा गिला हो जाता है, उपर
से समाज में शर्मसार भी होना पड़ता है।
शादी में उम्र को
लेकर कानून साफ़ सुथरी दिखती है एक रास्ते पर खड़ी है परन्तु समाज के अपने – अपने उम्र
हैं यूं कहें समाज विभिन्न रंग में रंगे नजर आता है। कानून के नजरिये से दुल्हन का
उम्र कम से कम अठारह वर्ष तथा दूल्हा का उम्र इक्कीस वर्ष होना जरूरी बताया गया है।
ये अलग बात है कि अधिकतम उम्र अर्थात कोई महिला या पुरुष कितने उम्र तक शादी कर
सकता को लेकर कानून का स्पष्टीकरण नहीं है। अठारह वर्ष से कम उम्र में लड़की की
शादी करना को किसी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। कानून को छोड़िए मेडिकल
विज्ञान भी इसे गलत करार दे दिया है।
मेडिकल विज्ञान का मानना है कि कम उम्र में लड़की की शादी करने से जच्चा - बच्चा दोनों को खतरा होता है। जगह – जगह पर इसको रोकने के लिए सरकार प्रचार-प्रसार कर रही सभी सरकारी अस्पताल में इसका बैनर देखा जा सकता है। इस मामले में हमारी सरकार को काफी सफलता भी मिला है। शनैः - शनैः समाज के सभी वर्ग के लोग इस बात को मानने लग गए हैं कि अपनी बिटिया की शादी अठारह वर्ष से पहले नहीं बल्कि इसके बाद हीं करनी है। इसमें पहले के अपेक्षा बहुत परिवर्तन देखा जा सकता है। अधिकांश लोग चाहते हैं कि हमारी बिटिया की शादी अठारह वर्ष के बाद हीं हो। इसमें खास परिवर्तन यह देखा जा रहा है कि स्वयं बिटिया बोलते दिख रहीं हैं की हम अभी अठारह के नहीं हुए हैं इसलिए हमारी अभी शादी नहीं यदि जबरदस्ती शादी की गई तो हमे मजबूरन कानून के पास जाना पड़ेगा।
मेडिकल विज्ञान का मानना है कि कम उम्र में लड़की की शादी करने से जच्चा - बच्चा दोनों को खतरा होता है। जगह – जगह पर इसको रोकने के लिए सरकार प्रचार-प्रसार कर रही सभी सरकारी अस्पताल में इसका बैनर देखा जा सकता है। इस मामले में हमारी सरकार को काफी सफलता भी मिला है। शनैः - शनैः समाज के सभी वर्ग के लोग इस बात को मानने लग गए हैं कि अपनी बिटिया की शादी अठारह वर्ष से पहले नहीं बल्कि इसके बाद हीं करनी है। इसमें पहले के अपेक्षा बहुत परिवर्तन देखा जा सकता है। अधिकांश लोग चाहते हैं कि हमारी बिटिया की शादी अठारह वर्ष के बाद हीं हो। इसमें खास परिवर्तन यह देखा जा रहा है कि स्वयं बिटिया बोलते दिख रहीं हैं की हम अभी अठारह के नहीं हुए हैं इसलिए हमारी अभी शादी नहीं यदि जबरदस्ती शादी की गई तो हमे मजबूरन कानून के पास जाना पड़ेगा।
वर्तमान समय में समाज का कोई ऐसा
वर्ग नहीं बचा है जो कहता हो बिटिया बड़ी हो गई अब उसके हाथ पीले कर देना चाहिए अब
लोग यह कहते हैं कि बिटिया पढ़ने लायक है पढ़ेगी और अपने समाज तथा गांव का नाम
उज्ज्वल करेगी। इतने परिवर्तन आने के बावजूद भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता
कि कुछ लोग समाज में मौजूद अवसाद के डर से अपनी बिटिया को मैट्रिक पास होने के
पहले हीं उसके हाँथ पीले कर देने के प्रयास में जूट जाते हैं जो सरासर गलत बात है।
इसकी वजह से कई लडकियाँ मैट्रिक बोर्ड के परिक्षा में शामिल होने से दूर हो जाती
है। ऐसी लडकियाँ पढ़ती तो हैं लेकिन मैट्रिक पास न होने के वजह से पढ़ाई के क्षेत्र
में उनका आगे का कैरियर बिल्कुल हीं ठप्प पड़ जाता है। उनकी शादी हो जाती है उसके
बाद वह अपने ससुराल चली जाती हैं और वहां उन्हें घर में रहना होता है फ़िर बच्चे
होते हैं उसके बाद पढ़ाई का काम खत्म हो जाता है।
कई गांव के बीच स्थित सरकारी हाई स्कूल के नौंवी वर्ग की एक छात्रा इस बार के मैट्रिक परिक्षा में शामिल नहीं होने जा रही है क्योंकि उनके माता – पिता ने उस बच्ची की शादी कर दी जब वह नौंवी क्लास में पढ़ रहीं थी। अब वह एक बच्चे की माँ भी बन चुकी हैं और ससुराल में अपने बच्चे तथा पति के साथ जीवन यापन कर रहीं हैं। वह घर के सारे जिम्मेदारी निभा रहीं हैं लेकिन पढ़ाई को निभाने में चूक गई।
इस बेटी के माता-पिता का भी अपना तर्क है। उनका मानना है कि समय हम जैसे गरीबों का नहीं है। हम अपनी इज्जत का बचाव नहीं कर सकते क्योंकि हमारे पास रहने का घर तो हैं हीं नहीं। जब कोई लड़का हमारे बेटी को छेड़ेगा तब इस बात को लेकर जहाँ भी हम जएंगें वहां से हमको हीं गलत साबित कर दिया जायेगा। उनका कहना है कि हम अपनी बेटी की शादी तब तक नहीं करते जबतक उसको कोई लड़का पिछा नहीं करता और जैसे हीं कोई लड़का मेरी बेटी को पिछा करना शुरू कर देता है हम उसको शादी करना हीं बेहतर उपाय समझते हैं।
यह उस हाई स्कूल की कहानी हैं जहाँ ऐसे वर्ग की बिटिया पढ़ती हैं जिस वर्ग के लोग अपने बेटी को कम उम्र में शादी करने की प्रथा को पुराने समय से मानते आ रहे थे लेकिन अब बेटी को पढ़ाने शुरू कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब ऐसे समाज के बीच स्थित स्कूल की बिटिया का हाल यह है तो दूर-दराज का क्या हालात होंगें।
कई गांव के बीच स्थित सरकारी हाई स्कूल के नौंवी वर्ग की एक छात्रा इस बार के मैट्रिक परिक्षा में शामिल नहीं होने जा रही है क्योंकि उनके माता – पिता ने उस बच्ची की शादी कर दी जब वह नौंवी क्लास में पढ़ रहीं थी। अब वह एक बच्चे की माँ भी बन चुकी हैं और ससुराल में अपने बच्चे तथा पति के साथ जीवन यापन कर रहीं हैं। वह घर के सारे जिम्मेदारी निभा रहीं हैं लेकिन पढ़ाई को निभाने में चूक गई।
इस बेटी के माता-पिता का भी अपना तर्क है। उनका मानना है कि समय हम जैसे गरीबों का नहीं है। हम अपनी इज्जत का बचाव नहीं कर सकते क्योंकि हमारे पास रहने का घर तो हैं हीं नहीं। जब कोई लड़का हमारे बेटी को छेड़ेगा तब इस बात को लेकर जहाँ भी हम जएंगें वहां से हमको हीं गलत साबित कर दिया जायेगा। उनका कहना है कि हम अपनी बेटी की शादी तब तक नहीं करते जबतक उसको कोई लड़का पिछा नहीं करता और जैसे हीं कोई लड़का मेरी बेटी को पिछा करना शुरू कर देता है हम उसको शादी करना हीं बेहतर उपाय समझते हैं।
यह उस हाई स्कूल की कहानी हैं जहाँ ऐसे वर्ग की बिटिया पढ़ती हैं जिस वर्ग के लोग अपने बेटी को कम उम्र में शादी करने की प्रथा को पुराने समय से मानते आ रहे थे लेकिन अब बेटी को पढ़ाने शुरू कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब ऐसे समाज के बीच स्थित स्कूल की बिटिया का हाल यह है तो दूर-दराज का क्या हालात होंगें।
