ममता बनर्जी ज़ी ने पश्चिम बंगाल में झाँसी की रानी की तरह हीं संघर्ष की इनके अलावा और भी हैं जिन्हें इस श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए।।
बुन्दलेहरवालों के
मुहं हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह
तो झाँसी वाली रानी थी।
सुभद्राकुमारी चौहान
द्वारा रचित कविता “झाँसी की रानी” की पंक्ति की प्रासंगिकता आज याद आ गई, उस समय
भी लोगों ने याद किये थे, उस समय भारत में अंग्रजी शासन का दौर था लेकिन आज आजाद
भारत का दौर है फ़िर भी इस पंक्ति को याद करने पड़ गया। बहुत दुःख होता है कि इस
पंक्ति की जरूरत आज फ़िर से पड़ गया। स्थिति सब वहीँ है सिर्फ उस समय कोई विदेशी था
लेकिन आज सब देशी है। आज के भारत में अंग्रेजी शासन जैसे व्यवहार करने वाले शासन
कर रहें हैं और इनको मदद करनेवाले राज्यों में मौजूद है।
पश्चिम बंगाल के इस
चुनावी संग्राम को देखते हैं तो झाँसी की रानी ने जो अंग्रेजों और अंग्रेजी शासन
को मदद करनेवाले भारतीय मददगारों के विरोध में जंग छेड़ी थी वो याद आ गई। ममता
बनर्जी के इस चुनावी संग्राम और झाँसी की
रानी के द्वारा अधिकार की लड़ाई दोनों में काफी समानता प्रतित होता है यदि अन्तर
कुछ है तो वह है कि इस युद्ध में सिर्फ अंग्रेज शामिल नहीं हुए बाकी अंग्रेजी शासन
जैसे शासन करनेवाले तो शामिल थे हीं। दूसरे शब्दों में कहें तो झाँसी की रानी के
समय के वैसे भारतीय जो अंग्रेजी शासन को मदद कर रहे थे और देश के आजादी के आखरी
समय तक अंग्रेजों को मदद करते रहे के लिए शासन करनेवाले लोग बंगाल की इस रानी के
सामने थे।
पश्चिम बंगाल की रानी
ममता बनर्जी को वर्तमान भारत के “मोदी हूकूमत” (अंग्रेजी शासन जैसे शासन करनेवाले)
ने बंगाल पर शासन करने के लिए वहीँ चाल चली जो अंग्रेजी हूकूमत पुराने भारत के समय
चला करते थे। मोदी हूकूमत ने चुनाव से पहले हीं ‘तोड़ने की नीति’ का अनुसरण करते
हुए ममता बनर्जी के खेमे में शामिल प्रमुख नेताओं को अलग कर दिया और इन नेताओं को
अपने खेमे में शामिल कर लिए।
इसे ‘भेद डालो और
शासन करो की नीति’ के नाम से जाना जाता है, जिस नीति को अंग्रेज़ी शासन ने सम्पूर्ण
भारत पर हूकूमत करने के लिए अन्तिम समयों तक करता रहा। मोदी हूकूमत के द्वारा ममता
ज़ी पर लागू किया गया Devide and Rules सफल रहा। इस नीति से मोदी हूकूमत ने ममता ज़ी
के बहुत सारे विधायकों को अपनी खेमे में शामिल करने में सफल रहा। बंगाल के स्टार
नेता जिसके बदौलत ममता ज़ी चुनाव जीत रहीं थी और वो ममता ज़ी के हार का कारण बना को
भी मोदी हूकूमत ने अपने खेमे में शामिल कर लिया। इसके बाद ममता ज़ी हमले भी हुए
जिनमें इनका पैर में फ्रेक्चर हुआ इसके बावजूद भी वह चुनाव में डंटी रहीं।
पश्चिम बंगाल की रानी
को चुनाव में मोदी हूकूमत ने हरा तो दिया, लेकिन लोकतंत्र की सरकार बनाने में असफल रहा। वो इसलिए कि ममता ज़ी ने मोदी के हूक्मरानो को धूल चटा दिया। वह स्वयं
चुनाव हार गईं, लेकिन अपने लोकतंत्र के सिपाहियों को जीता दी। बंगाल की यह रानी अपने
राज्य में एक तानाशाह हूकूमत को आने से बचा लिया। दूसरे शब्दों में कहें तो पश्चिम
बंगाल की जनता ने उस नेता को चुना जो लोकतंत्र की सिपाही हैं मोदी हूकूमत के
हूक्मरान नहीं हैं।
वर्तमान ‘मोदी हूकूमत’ के शासन वाले भारत के कई ऐसे किस्से हैं, जो झाँसी की रानी की कहानी से समानता रखते हैं। उनमें से एक है बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की छात्राओं द्वारा किया गया संघर्ष और हाल फिलहाल में बिहार के पूर्व सांसद रंजीता रंजन (जन अधिकार पार्टी के अध्यक्ष पप्पू यादव की पत्नी) के द्वारा मोदी हूकूमत के विरोध में शुरू किया गया संघर्ष।

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