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कोरोना लॉक-डाउन से बरबाद होता बिहार के गरीबों के रोजगार धंधे और निश्चिन्त होकर ट्विट करते मंत्री ज़ी।


हमारे यहाँ एक बहुत हीं प्रचलित कहावत है “शरीर के पिछवाड़े पर लात से मार लो भाई लेकिन हमारे पेट पर लात मत मारो”। इसका मतलब यह होता है कि हमारे शरीर के किसी अंग पर लात से मार लो पर हमारे धन्धे पर लात मत मारो! दूसरे शब्दों में कहे तो हमारे धन्धे/रोजगार को मत बरबाद करो जिससे मेरा और मेरे बीवी बच्चों का पेट चलता हो और इनका गुजर-बसर होता हो। बिहार सरकार ने इस बार के कोरोना लॉक-डाउन में भी वहीँ किया जो पिछली बार के लॉक-डाउन में की थी। गरीब लोगों के रोजगार को बरबाद करने की।https://youtu.be/9i3MXyfSoUA

इस बार जिस प्रकार से सरकार ने लॉक-डाउन की घोषणा की है उससे साफ मालूम पड़ता है कि बिहार सरकार ने इस बार भी आनन-फानन में राज्य में लॉक-डाउन लागू रहेंगें की जानकारी लोगों को ट्विटर के माध्यम से दे दी है। अब बिहार प्रशासन/पुलिस लोगों से पैसा वसूल करके और लोगों को डरा-धमका के इसके रोजगार को पहले समाप्त करेगी और फ़िर लॉक-डाउन के नियमों का पाठ पढ़ाएगी, लेकिन इस बार जनता समझदार हो चुकी है लोग बिहार की राजधानी पटना से अपना बोरिया बिस्तर समेटने को तैयार हो चुकी है, कुछ लोग हीं पुलिस को पैसा देने के मूड में हैं।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लॉक-डाउन से कोरोना वायरस को फैलने से रोका जा सकता है इसलिए हम सब लॉक-डाउन की वकालत करते हैं। परन्तु इसके साथ यह भी बात सच है कि इससे गरीबों का रोजगार ठप्प पड़ जाता है, इनका रोजगार बरबाद हो जाता है। इनके रोजगार को बचाने की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए? क्या बिहार सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं है ? इस सरकार को सिर्फ इस महामारी में लोगों के रोजगार को बरबाद करने हीं हैं। क्या रोजगार को बचाते हुए लॉक-डाउन लागू नहीं किया जा सकता ? मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा लागू किया गया भारत में रोजगार गारन्टी कानून को भी ख्याल नहीं रखा गया और उपर से बिहार के पुलिस को जनता से पैसा वसूलने को कहा गया है। क्या यहीं लोकतंत्र है? हम इसे लोकतंत्र नहीं कह सकते।

बिहार सरकार ने पिछली बार भी ऐसे हीं लॉक-डाउन की घोषणा कर दी थी और इस साल भी वैसे हीं हुआ है। बिहार के मुख्यमंत्री ने अपने ट्विटर एकाउंट से लॉक-डाउन की घोषणा करते हैं जैसे अपने दोस्तों को संदेश भेजना हो। क्या मुख्यमंत्री को यह संदेश जनता तक पहुँचाना मात्र हीं काम है और इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहिए इनको? क्या लोगों के बरबाद होते रोजगार पर इन्हें चर्चा नहीं करने की जरूरत है? 

यदि बिहार के मुख्यमंत्री बरबाद होते रोजगार पर चर्चा करना जरुरी नहीं समझते अपने ट्विटर पोस्ट में इसको शामिल करना नहीं चाहते हैं तो फ़िर इन्हें लॉक-डाउन की घोषणा भी नहीं करनी चाहिए और यह काम किसी प्रशासनिक अधिकारी को करना चाहिए क्योंकि इसे लागू करना तो पुलिसवालों का हीं काम है। किसी लोकतान्त्रिक नेता यह नहीं कर सकता कि वह सिर्फ लॉक-डाउन की घोषणा करे क्योंकि यह अब सभी को मालूम हो गया है कि इससे रोजगार भी बरबाद होते हैं इसलिए एक स्वच्छ लोकतान्त्रिक राज्य के नेता जनता का परवाह करते हुए इनके बरबाद होते रोजगार पर भी एक ट्विट तो अवश्य करेगा जो नीतीश कुमार ने नहीं किया है! 

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