जम के दीया निकालने
से दीवाली की होती है शुरुआत जिसमें मिट्टी के पुराने दीये से जम के दीया निकाला
जाता है और फ़िर छोटी एवं बड़ी दीवाली के दिन नये दीये जलाये जातें हैं। ऐसे तो दीवाली
की शुरुआत घर की साफसफाई से होती है। लोग अपने घर के सभी पुराने वस्तुओं को हटाते
हैं, घर को अच्छी तरह से धोते हैं फ़िर अपने घर को और घर में उपयोगी वस्तुओं को यथा
शक्ति चमकाते हैं। जो दीवाली के प्रवेश करते हीं शुरू हो जाता है। घर की अच्छी तरह
से साफसफाई करने के बाद धनतेरस के दिन यथाशक्ति घर में नये वस्तुओं की खरीददारी
करके लाते हैं और इसी दिन शाम को “जम
के दीया” निकाला जाता है। घर की मालकिन धनतेरस के शाम को परिवार के सभी
सदस्यों को खाना खिला देती हैं और सब विस्तर पर सोने के लिये चले जाते हैं, तब घर
की मुख्य जो कर्ताधर्ता होती हैं वहीं महिला पुराने दीया से जम के दीया निकालने का
रिवाज निभाती हैं। एक ऐसी भी मान्यता है जिसमें स्वयं कच्चे दीया बनाती हैं और
उससे जम के दीया निकाला जाने की रीतिरिवाज हैं। यह रिवाज कम हीं देखने को मिलता है
कुछ लोगों इसे अशुभ मानते हैं।
</
जब परिवार के बच्चे
व बुजूर्ग सभी सो जाते हैं तब घर की मालकिन पुराने दीये में रुई की बती बनाकर
डालती हैं और फ़िर इसमें तेल डालाती हैं, इस दिन के दीया में घी डालने का रिवाज
नहीं होता है। पुराने तेल से भरा दीया को प्रज्वलित करके सबसे पहले गृह देव घर को
प्रकाश दिखाती हैं। फ़िर सभी घरों को प्रकाश दिखाती हैं। जिसके बाद घर के मुख्य
दरवाजा के पास लाल मसूर का दाल भूमी पर रखकती हैं और इसी दाल पर जलते दीया को रख
देती हैं इसे हीं जम के दीया
निकालना कहा जाता है। जम के दीया निकालने के बाद महिला चुपचाप लौट आती हैं क्योंकि
उस जलते दीया को मुड़कर देखने का रिवाज नहीं है इसे मुड़कर देखना अशुभ माना जाता है।
जम के दीया निकालने
के बाद सुबह फ़िर से यथाशक्ति धोया जाता है, साफसफाई की जाती और जम के दीया को घर
के बुजूर्ग महिला चुपचाप बाहर फेंक आती हैं। इसके बाद शाम को छोटी दीवाली मनाया
जाता है तथा अगले दिन बड़ी दीवाली मनाया जाता है। बड़ी दिवाली के दिन घर के सभी
भागों को प्रकाशमय कर दिया जाता है। इस दिन शाम को लक्ष्मी ज़ी की पूजा बड़े हीं
धूमधाम से की जाती है। कुछ लोग जिनके पास गाय-भैंस दुग्ध देती हैं, उन लोग अपने घर
में बगैर चीनी-मीठा के सिर्फ दुध
और अरवा चावल का खीर बनाकर अपने कूल देवता को चढ़ाते हैं तथा अपने वंशजों
में प्रसाद के रूप में बांटने का भी प्रथा हैं। बड़ी दीवाली के दिन घी से दीया
जलाने का रिवाज है, इस दीया को घर के कूल देवता और गाँव के मन्दिर व देवता के पास
भी घी से जले दीया को जलाया जाता है। इसके बाद लोग घर के दरवाजे, खिड़की, दिवार, छत
पर दीया में तेल डालकर जलाते हैं, लेकिन अब बहुत लोग मोमबती व टिमटिमाते
इलेक्ट्रोनिक बल्ब से काम चलाना शुरू कर दिए हैं।
भारत के प्रकाश का त्यौहार दीवाली में दीया के स्थान पर इलेक्ट्रोनिक बल्ब
जलाये जाने का ट्रेंड के शुरुआत के पिछे की कहानी।
जैसे-जैसे भारत में
परिवर्तन आता गया, नये भारत का निर्माण होता गया, वैश्विकरण की ओर भारतवर्ष कदम
बढ़ाता गया, अपने पुराने दीवाली को भूलते गए और अब नया किस्म के दीवाली ने अपना पैर
जमा लिया है। हम इसके विरुद्ध नहीं हैं। समय के साथ परिवर्तन होना जायज है यदि
नहीं होगा तो फ़िर नये भारत का सपना पूरा कैसे होगा ? लेकिन, याद कीजिये वो पुराने
दीवाली जिसमें भी खुशियाँ होती अपार खुशियाँ निहित होती, बहुत लोगों को रोजगार भी
मिलता शायद अब के दिवाली में वो सब कुछ नहीं रहा। अब हमारे दीवाली के नब्बे
प्रतिशत भाग पर विदेशी का कब्जा हो गया है। अब के दीवाली से भारतियों से ज्यादा
विदेशी लोग इस बाजार को कब्जा करने के लिए तैयारी करते हैं। हमलोगों से अधिक
उत्सुक फिल्प्कार्ट वाले लोग हैं।
मिट्टी का बर्तन
बनानेवाले कुम्हार लोग इसकी तैयारी बहुत पहले से कर देते थे। इनको मिट्टी के ढेरों
दीये बनाने पड़ते थे। उस समय दीयों का इतना मांग होता कि दो-तीन महीने पूर्व से
दीया बनाने के बावजूद भी कुम्हार भाइयों से इसकी पूर्ति नहीं हो पाती थी। सभी को
दीये देने के चक्कर में उनको सभी के घरों में कुछ-कुछ कम दीये देने पड़ते। हर साल
यहीं स्थिति होता। किसी साल भी दीया का पूर्ति कुम्हार भाई से नहीं होता। दीवाली
के माहौल का यह एक हिस्सा बन चुका था। बड़े से टोकरी में दीया लेकर आते और घर-घर
जाकर दीया बाँटने का काम करते। दाम का कोई हिसाब नहीं, किसी को कुछ देने की जरूरत
नहीं, उनके घर में दीया जले या न जले लेकिन गांव वालों के घर में दिया जलना चाहिए।
दीवाली खत्म होने के बाद कुम्हार भाई दीया का दाम लेने के लिए आते, किसानों को जो
बनता वो देते और वह उतने में खुश हो जाते। अब वो बात नहीं रहा अब तो इनके पास दीये
बच जाते हैं। जिसका वजह है कि दीया के जगह इलेक्ट्रोनिक टिमटिमाते बतियाँ ने ले
लिया।
दिवाली का यह सफ़र ऐसे पूरा नहीं हुआ, इलेक्ट्रोनिक बतियों से पहले मोमबती ने
अपना पैर जमाया। जब गाँव के लोगों को दीया मिलना कम हुआ तो लोगों ने बाजार की ओर
रुख किया और बाजार इसकी ताक में बहुत पहले से इंतजार कर रहा था, जैसे बगुला अपने
शिकार को दबोचने के लिए नदी में एक टांग पर खड़ा रहता है। बाजार में दीया की तालाश
में पहुंचे लोगों को मोमबती दिखाई दिया। यह चमत्कारी चीज था। एक मुट्ठी में ढेर
सारे दीये! कुम्हार का दीया तो एक सरी का बड़ा सा सूप में भी नहीं अटता था, यहाँ
मोमबती एक मुठ्ठी में आराम से फिट हो जाता इतना हीं नहीं जलने में स्वभाव से
बिल्कुल सरल। यह चमत्कारी दीया का बाजार ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सका क्योंकि
इसमें भी एक दोष लोगों को पता चला कि मोमबती ज्यादा देर तक प्रकाश फ़ैलाने में असफल
रहा। बेचारा मोमबती का सफ़र दिवाली के साथ लम्बा दिनों तक नहीं चल सका। कुछ हीं
सालों में टिमटिमाते इलेक्ट्रोनिक बल्ब ने जगह ले लिया। सस्ता और लम्बे समयों तक
चलनेवाला साबित हुआ। आज तक इसका मार्केट पर पकड़ है, लेकिन इस टिमटिमाते बल्ब के
मार्केट का मालिक चीन है।
</
