भारत के सबसे पुरानी
पार्टी कांग्रेस को अपनेआप को अवलोकन करने का समय आ गया है, समय रहते यह काम नहीं
किया तो कांग्रेस स्वयं को नुकसान करेगी हीं देश को भी बहुत बड़ा झटका लगने से कोई
नहीं बचा सकता। आज के कांग्रेस पार्टी पुराने कांग्रेस से बिल्कुल हीं अलग-थलग है,
इसकी अलग पहचान है, इसकी तुलना पुराने कांग्रेस के साथ नहीं किया जा सकता और न हीं
पुराने के आधार पर जनता को वोट करना चाहिए।
कांग्रेस देश की पुरानी पार्टी के साथ-साथ एक प्रतिष्टित व बड़ी पार्टी है,
जिसको अध्ययन करने की लिए निम्न को आधार मानकर पार्टी को समझा जा सकता है।
प्रथम- कांग्रेस का
जन्म हुआ जिसमें स्वतंत्रता सेनानी शामिल थे उस समय पार्टी के अध्यक्ष पद का चुनाव
योग्यता और सामर्थ्य व लोकप्रियता के आधार पर होता था। इसके आधार पर इसे एक
स्वतंत्रता पार्टी कहना उचित होगा। दूसरा- भारत के आजादी के बाद का कांग्रेस इसमें
भी अध्यक्ष पद का चुनाव में पारदर्शिता का बोलबाला से इनकार नहीं किया जा सकता।
तीसरा- भारत आजादी के बाद अपने पैर पर खड़ा हुआ, विकास के मार्ग पर चलना शुरू किया,
मतदान को समझने लगा के समय के कांग्रेस में अध्यक्ष पद के चुनाव विभिन्न लोगों ने
भाग लिया। चौथा- इस समय भारत की राजनीति परिपक्वता की ओर कदम बढ़ा दिया, लोग मतदान
की ताकत को समझने लगें जबकि वहीं कांग्रेस के लोग इस बात को भूलते नजर आये।
भारत का लोकतंत्र पहले की अपेक्षा ज्यादा परिपक्व व जागरूक हो गया है इस हिसाब
से देश के सभी राजनीतिक पार्टियों अपनी-अपनी राजनीति रोटियां सेकने में जुटी हैं।
कांग्रेस भी इस गणित
को समझने में देर नहीं किया और न हीं अपनेआप को इससे अलग रखने की कोशिश किया। जब
से कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी बैठे हैं तब से इस बात देखने को मिलता है कि इस पार्टी ने अपने लोकसभा
चुनाव में प्रधानमंत्री पद को लेकर किसी उम्मीदवार का नाम की घोषणा चुनाव पूर्व
नहीं किया। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रधानमन्त्री को ढूंढने की कवायद
शुरू किया गया। यह राजनीति किस उद्देश्य से देश में शुरू किया गया कांग्रेस पार्टी
के लोग हीं बता सकते हैं, लेकिन एक लोकतान्त्रिक देश के लिए किसी भी एंगल से इस
नीति को सही नहीं ठहराया जा सकता। चुनाव से पूर्व इस बात की पुष्ठी हो जानी चाहिए
की चुनाव जीतने के बाद अमुक आदमी हमारे देश के प्रधानमंत्री होंगें।
कांग्रेस
पार्टी ने अध्यक्ष के चहरे से चुनाव लड़ा और फ़िर मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री बना
दिया, जबकि चुनाव से पूर्व मनमोहनसिंह का नाम प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप
में था हीं नहीं। हलांकि मनमोहनसिंह भारत के लिए एक अच्छे प्रधानमंत्री साबित जरुर
हुए, लेकिन इस राजनीतिक चाल को लोकतंत्र के लिए अच्छा कैसे माना जाना चाहिए ? किसी
भी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी को लोकसभा चुनाव के पहले अपने प्रधानमंत्री का घोषणा
कर देना यह उनकी लोकतान्त्रिक नैतिक जिम्मेदारी होती है। कांग्रेस इस नीति को
बार-बार दोहराते रही है, इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी
वहीं किया जो पहले से चला आ रहा था। उन्होंने प्रधानमंत्री के नाम का घोषणा किये
बगैर लोकसभा चुनाव लड़ लिया, लेकिन भारत के आवाम ने इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस
को अच्छी पाठ पढ़ा दिया। एक स्वस्थ्य लोकतंत्र के निर्माण के लिए कांग्रेस का यह
राजनीति को बिल्कुल गलत ठहराया जाना चाहिए, जिसपर भारत के जनता ने भी अपना मतदान
का ठप्पा लगा दिया है।
आज के कांग्रेस पार्टी के लोग पिछले गाँधी परिवार के योग्यता को संयोग से मिलन
होता देख भूलवश उसे राजनीति का हिस्सा मान लेना बहुत बड़ी गलती।
एक लोकतंत्र देश के
लिए अच्छा है या गलत कहना बड़ा मुश्किल है, क्योंकि आवाम के चुनाव को गलत कैसे
ठहराया जा सकता है। लोकतंत्र में आवाम हीं राजा होता है और एक राजा के निर्णय को
भला कौन गलत ठहरा सकता है ? जनता देश को चला रही है, जनता मतदान करती है और अपने
नेता को चुनती है और वह नेता जनता के हिसाब से देश के सारे निर्णय लेता है। फ़िर
जनता के द्वारा चुने हुए नेता को कैसे गलत ठहराया जा सकता है ?
इसे संयोग तथा
योग्यता दोनों मान जाय फ़िर भी भारत के एक हीं परिवार से कई प्रधानमंत्री चुने जा
चुके है और वे सभी प्रधानमंत्री अपने कामों से भारत में प्रसिद्ध हुए। इंद्रा
गाँधी और राजीव गाँधी ऐसे हीं दो नाम है जो कांग्रेस के प्रधानमंत्री बने और वो भी
एक हीं परिवार से संबंध रखते हैं। भारत में शायद हीं कोई ऐसा परिवार है जो इतने
प्रधानमंत्री देश के लिए दिया है। दोनों प्रधानमंत्री देश में अपने निर्णयों व
कामों, योग्यता के आधार पर याद किये जाते हैं। इनकी अपनी पहचान है जिसे भारत के आवाम
ने पहचान दिया है। भारत के ये दोनों प्रधानमंत्री संयोग से नहीं बने हैं बल्कि पहले कांग्रेस
का अध्यक्ष/उपाध्यक्ष पद पर बैठे फ़िर कांग्रेस पार्टी ने चुनाव जीता और वे बाद में
सांसद की सदस्यता लेकर भारत के प्रधानमंत्री बन गए।
इसी संयोग को आज के कांग्रेस
पार्टी के लोग परम्परा का रूप दे दिया। यहीं वजह रहा कि कांग्रेस ने पहले राहुल
गाँधी को अध्यक्ष/उपाध्यक्ष बनाया और फ़िर लोकसभा चुनाव में बिना प्रधानमंत्री के
नाम का घोषणा किये हीं चुनावी मैदान में उतर आये, लेकिन जनता ने राहुल गाँधी को
उनके पारिवारिक संसदीय सिट से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया। इससे साफ हो जाता है
कि भारत की जनता अपने नेता को चुनना चाहती है, अपने प्रधानमंत्री को चुनना चाहती
है, यदि कोई धोखा देकर प्रधानमंत्री बन भी जाता है तो उसे जनता भूलती नहीं याद
रखती है और समय आने पर उसे सबक सिखाने का काम करती है।
