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त्यौहार मनाना और मेला लगाना नहीं भूले, लेकिन देशी बाजार को भूल गए।।

भारत एक पंथनिरपेक्ष देश है, इसलिए यहाँ धर्मों की बहुलता है। लगभग दुनिया के अधिकतर धर्मों को भारत में देखा जा सकता है। भारत की खासियत है कि विभिन्न धर्म के लोग एक छत के नीचे रहते हैं, इतना हीं नहीं सभी धर्म के त्यौहार को लोग साथ में मिलकर मनाने की प्रथा शुरू कर चुके हैं। इस देश की ख़ासियत यह बन चुका है कि धर्म अनेक उनके त्यौहार अनेक लेकिन इसको मनानेवाले त्यौहार के समय एक हो जाते हैं। यहाँ सभी दूसरे धर्म के त्यौहार को प्यार और सम्मान से देखता है, आज हिन्दू धर्म के लोग गुड फ्राइडे, ईद और मुस्लिम भाई दशहरा, दिवाली और छठ जैसे हिन्दू के महान पर्व के खुशियों में शरीक होने से अपने आप को रोक नहीं पाते हैं, लेकिन त्यौहार को मनानेवाले भारतीय अपने दायित्व को भूलते जा रहे हैं।
आज भारत के त्यौहार का स्वरूप हीं बदल चुका है, इसमें प्रयोग होनेवाला संसाधन में भारी उलट-फेर हो गया है को सरलता के साथ देखा व महसूस किया जा सकता है। किसी धर्म का त्यौहार को ले लीजिये उसमें इस्तमाल किये जानेवाले वस्तुओं की निर्भरता बाजारू वस्तुओं पर चला गया है ( सभी के त्यौहार बाजार पर ज्यादा निर्भर हो गया है ) और भारत के बाजार उनसे भरा पड़ा है जो भारत के नहीं हैं और न स्थानीय रोजगार के लिए हितैषी है। भारत का त्यौहार विदेशी व घटिया उत्पादों से सना पड़ा है जबकि पूर्व के समयों में त्यौहार या त्यौहार पर लगनेवाला मेला के समानों की आपूर्ति आस-पास मौजूद वस्तुओं से हीं हो जाया करती थी।

सबसे ज्यादा असर त्यौहार के समय प्रयोग किये जानेवाला वस्त्र-परिधान पर देखा जा सकता है, आज के पर्व-त्यौहार मनाने में एक साधारण आमदनी ( दस हजार महीना कमानेवाले ) वाला परिवार का वस्त्र पर हजारों रुपया यूं हीं खर्च हो जाता है। यहीं वजह है की आज के पर्व पहले के अपेक्षा बहुत हीं खर्चीला हो गया है तथा ये ऐसे वस्त्र होते हैं जो स्पेशल पर्व के लिए हीं तैयार किये जाते हैं जो चमकीला, भड़कीला के साथ-साथ परिधान को खरीदने से सीधे तौर पर घर के आस-पास खोले गए टेलर के रोजगारों को प्रभावित करता है।


मुंशी प्रेमचन्द द्वारा लिखित “ईदगाह” कहानी को याद कीजिये यदि नहीं पढ़ें है तो इसे पढ़ने की कृपा की जाने का समय आ गया है। कहानी का मुख्य कैरेक्टर हामिद पास के लगे मेले से एक चिमटा खरीद कर लाता है, जबकि उसके सभी दोस्त खेलने के लिए खिलौना लेकर आते हैं। सब दोस्त हामिद पर हँसते हैं यहाँ तक हामिद के अम्मा भी नाराजगी व्यक्त करते हुए गुस्सा करती हैं। हामिद कहता है “अम्मा आप रोटी बनाती हैं तो आपका हांथ जल जाता है अब इस चिमटा से रोटी बनाना, आपका हांथ नहीं जलेगा”। बेटे का यह सोच समझते हीं अम्मा की आँखों आँसू से भर जाता है। आज के त्यौहार पर लगे मेला से हामिद का चिमटा पूरी तरह से खत्म हो चुका है।

बचपन से देखते आ रहा हूँ कि नालंदा के छोटे-मोटे तालाब पर भी छठ पर्व मनाया जाता रहा है और यहाँ मेला लगता है। इस मेला में आस-पास के लोग हीं अपना-अपना समान बेचने के लिए मेला में शरीक होते हैं। यहीं हाल लगभग बिहार के सभी जिलों की है। यह मेला मुख्य रूप से एक साल में दो बार लगता है। मेला बहुत धमाकेदार होता है, इससे लोगों की कमाई अच्छी खासी हो जाती है। पहले के मेला में हामिद का चिमटा मिलता था, लेकिन इस साल चिमटा बाजार से गायब रहा तथा आस-पास के कारीगरों द्वारा निर्मित वस्तुओं के स्टाल एकाध हीं देखने को मिला। सारे-के-सारे स्टाल कम्पनियों द्वारा निर्मित वस्तुओं से सज़ा रहा। आज के मेला ने घरेलू कारीगरों के दरवाजे बन्द कर दिए हैं। बांस के बने बांसुरी, डुगडुगी, भोंपू आदि बच्चों का खिलौनों का दुकान लगना बंद हो गया है एवं इसके जगह प्लास्टिक के बने खिलौने ने स्थान ले लिया है जो बच्चों के हेल्थ और देश के वेल्थ के लिए खतरे की घंटी है।
गांव के तालाब के पास लगनेवाले छठ मेला के धार्मिक नियमों में बहुत कुछ बदलाव देखने को नहीं मिला। श्रद्धालुओं आज भी सूर्य भगवान को अरग देते हैं उस समय भी दिया करते थे। डूबते सूर्य से अरग की शुरुआत तथा उगते सूर्य से अरग की समाप्ति होती थी और हो रही है। हम सब बचपन में छठी मैया का दौरा पैदल ले जाते देखते थे जो आज भी वैसा हीं है। बहंगी बांस की बनी होती थी आज के छठी मैया की बहंगी बांस की हीं बनी है। लेकिन छठी मैया के अवसर पर लगनेवाले मेला में बिकने वाले वस्तुओं, खिलौनों, किसान के समान में भारी बदलाव आ चुका है, इसके जगह कम्पनियों द्वारा प्लास्टिक निर्मित का भरमार हो चुका है।

बिहार का प्रसिद्ध औंगारी छठ धाम जो नालंदा में स्थित है। यहाँ घरेलू कारीगरों के हांथों से निर्मित वस्तुओं के सिर्फ़ दो से तीन दुकान देखने को मिला और एक से दो बांस के बने बांसुरी घुम-घुम कर बेचता मिला। बाकी औंगारी धाम पर लगनेवाला मेला के सारे स्टाल कम्पनियों द्वारा निर्मित प्लास्टिक वस्तुओं के स्टाल थे। इनकी बिक्री भी जोरों पर थी। अपने हांथों से लकड़ी के वस्तुओं को बनानेवाले कारीगर के दुकान खाली-खाली हीं घर को लौट गया। ना हामिद मेला घुमने पहुंच सका और ना हीं हामिद का चिमटा की बिक्री हुई। आज के हम सब भारतीय त्यौहार मनाना नहीं भूले हैं लेकिन उस अवसर पर प्रयोग किये जानेवाले वस्तुओं कहाँ से लाना है, किससे खरीदना है और क्या खरीदना है इस दायित्व को भूलते जा रहे हैं

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