आज के वैश्विकरण युग
में अयोध्या जैसे मुद्दे को प्राथमिकता नहीं दिया जा सकता जबकि भारत में यह धूम
मचाते रहा यहाँ तक की इस मुद्दा के जरिये भारत के लोकतांत्रिक सरकार को बनते और
बिगड़ते देखा गया। इसलिए इसके महत्व और भी बढ़ जाते हैं। जिस समय भारत को अपनी आज़ादी
की लड़ाई लड़नी थी, इसके लिया एकमत होने की जरूरत थी उस समय अयोध्या अपने विवाद को
समेटे हुए था। जब भारत 1947 में आजादी का साँस लेना शुरू किया और आर्थिक, समाजिक
एवं शैक्षणिक विकास करने के कदम बढ़ाने सीखने शुरू किये उस समय भी अयोध्या के लिए
लोग आपस में लड़ने-लड़ाने का काम किया। यह कितना दुर्भाग्य है कि दुनिया के देश
वैज्ञानिक ख़ोज, आर्थिक विकास व शैक्षणिक विकास के झंडे गाड़ रहें हैं वहीं भारत के
लोग, सरकार तथा न्यायलय धर्मान्धता की लड़ाई लड़ रहा है और उसके जीत का जश्न मना रहा
है। भारत भुखमरी, बेरोजगारी, शैक्षणिक पिछड़ेपन, प्रशासनिक उत्पीड़न, भ्रष्टाचार
जैसे समस्याओं से पीड़ित है। जिसके लिए भारत के लोग, भारत सरकार तथा भारतीय
न्यायालय को कठोर निर्णय लेना चाहिए और इन उभरते समस्याओं के जीत का जश्न मनाना
चाहिए, लेकिन आज के भारत धार्मिक स्थल अयोध्या को लेकर ख़ुशी का तांडव करते दिख रहा
है जिससे साफ़ हो जाता है कि भारत अब भी धार्मिक रूप से संवेदनशील देश है।
भारत के लिए अच्छी
खबर है की वर्षों से चले आ रहे अयोध्या विवाद को न्यायलय ने विराम का रास्ता
दिखाने का काम किया है और हमे इससे सीख लेनी चाहिए कि भविष्य में ऐसे विवाद से देश
को दूर रखेंगे यह संकल्प जनता और सरकार दोनों को करनी चाहिए। अब हमारे मन में कई बार सवाल खड़ा होता है कि अयोध्या मुद्दा को
धर्मान्धता के साथ जोड़ा जाना उचित होगा या अनुचित। हमारा संविधान कहता है कि जिस
समय भारत की आजादी मिली उस समय भारत में जो भी धार्मिक स्थल जिस अवस्था में थे उसे
उसी रूप में कानूनी सरंक्षण प्राप्त होगा यदि उसमें छेड़-छाड़ किये जाने पर विवाद
उत्पन्न होगा तो उसको उसी रूप से सुलझाया जायेगा जिस रूप में वह स्थल आजादी के समय
भारत को प्राप्त हुआ था। संविधान के द्वारा किया गया इस उद्घोषणा से साफ़ मालूम
पड़ता है कि भारत आजादी के समय के बाद धार्मिक विवाद में पड़ना नहीं चाहता। भारत अब
से अपने देश के आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और वैज्ञानिक विकास की ओर अपना ध्यान
केन्द्रित करना चाहता है जो शायद नहीं हुआ और भारत अयोध्या जैसे मामला को अलग
तरीके से सुलझाने के प्रयास में भारत के राजनीतिक समीकरण को धार्मिक से जोड़ दिया
गया।
दुनिया के कोई भी
धर्म अपने समर्थकों को यह इजाजत नहीं देता की दुसरें धर्म के अनुयायियों को
कत्लेआम करे, उसे अपने धर्म मानने को बाध्य करे, जमीन के लिए जान ले और जान दे।
धर्म तो सही मायने में मन-तन को शांति प्रदान करनेवाला एक मनोविज्ञानी चिकित्सक का
काम करता है। जब हम सबसे थक हार जाते हैं तब अपने धर्म के मालिक के पास जाते हैं
जहाँ हमे कुछ तो नहीं मिलता लेकिन संतुष्टि मिल हीं जाती है। जबकि अयोध्या मुद्दा
कभी शांति का स्रोत नहीं रहा, बल्कि इनके वजह से लोगों की जाने गई है हिन्दू ने
मुस्लिम को मारा और मुस्लिम ने हिन्दू को मारा। देश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है।
भारत के उतर प्रदेश राज्य के एक सरकारी अस्पताल को पैसा के कमी होने के कारण
सैकड़ों की संख्या में बच्चे मर जाते हैं, देश में नये आर्थिक संरचना निर्माण न
होने के वजह से रोजगार का अभाव हो गया है, लोग बेरोजगार हैं क्योंकि देश के पास
पैसा नहीं, लेकिन देश को राम मन्दिर एवं मस्जिद निर्माण करने के लिए पैसों की
दिक्कत नहीं है यह धर्मान्धता नहीं तो क्या है!
अयोध्या विवाद की
नींव मुगलों के समय रख दिया गया था जिसे हम सब भारतीय आज तक ढोते आ रहे थे। इतिहास
बताता है कि 1528 ईस्वी में मुगल बादशाह बाबर के कमाण्डर मीर बाकी ने अयोध्या में
जहाँ हिन्दू धर्म के ईश्वर राम का जन्मभूमी था उस जगह पर या उसे तोड़कर बाबरी
मस्जिद का निर्माण कराया था। उस समय मुस्लिम तथा हिन्दू धर्म के लोगों के मध्य
विवाद नहीं था। दोनों धर्म समुदाय के लोग इस स्थान पर अपना धर्म का पालन करते।
हिन्दू और मुस्लिम दोनों साथ-साथ अपने-अपने धर्म का अनुपालन करते आ रहे थे, इसमें
दोनों धर्म में से किसी को दिक्कत नहीं होती और यह सिलसिला 1855 ईस्वी तक हिन्दू
और मुस्लिम समुदाय के लोगों कि आस्था साथ-साथ कायम रहा। लेकिन 1856-57 ईस्वी में
बाबरी मस्जिद के आसपास के इलाकों में हिन्दू और मुसलमानों के बीच दंगे होने शुरू
हो गये तथा इस समय भारत पर ब्रिटिश हुकूमत शासन कर रही थी। ब्रिटिश सरकार ने कानून
व्यवस्था बनाये रखने के लिए स्थल को परिसर के भीतरी और बाहरी बरामदे में विभाजित
कर दिया। इसके लिए छह से सात फुट उंची ग्रिल-ईंट की दीवार खड़ी की गई तथा भीतरी बरामदे
का इस्तेमाल मुसलमान नमाज पढ़ने के लिए और बाहरी बरामदे का इस्तेमाल हिन्दू पूजा के
लिए करने शुरू कर दिए।
भारत को ब्रिटश
हुकूमत से आजादी मिलने के दो साल बाद 22 से 23 दिसम्बर 1949 ईस्वी की चोरी-छूपे रात
में लगभग 50-60 हिंदू मस्जिद में घुसकर वहां रामलला की प्रतिमा की स्थापना कर दिया
जो प्रतिमा नहीं था देश को धर्मान्ध विवाद
में धकेलने की साजिश रची गई थी। उस समय भारत के तत्कालिन प्रधानमंत्री पंडित
जवाहरलाल नेहरु ने प्रतिमा को हटाने के निर्देश दिये। प्रधानमंत्री के इस निर्णय
को राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिरीक्षक ने समर्थन करते हुए प्रतिमा को
हटवाने का प्रयास किया, लेकिन अदालत ने इसपर रोक लगा दिया। आगे चलकर यह विवाद भारत
के राजनीतिक मुद्दा बन गया और 1991 ईस्वी में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने
अयोध्या विवाद (राम मन्दिर) को अपने घोषणापत्र में शामिल कर लिया। अयोध्या में राम
मन्दिर का विवाद तथा भारत के कोने-कोने में हिन्दू- मुस्लिम विवाद की शुरुआत हुई,
जिसका 9 नवंबर, 2019 ईस्वी को भारत के उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले से अंत माना जा
सकता है।
