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हर घर नल का जल योजना बनाम यूपीए के मनरेगा योजना ।।


पर्यावरण का संरक्षण करते हुए विकास के राह पर चलना भारत का इतिहास रहा है, यहाँ के पुराने व्यवस्था को समझेगें तो इस बात की पुष्ठी हो जाएगी। वर्तमान भारत के सारे योजनाएं इसी के इर्द-गिर्द घुमती नजर आती है। यहीं वजह रहा कि भारत प्राकृतिक रूप से सम्पन्न होने के बावजूद भी अन्य देश के भांति विकास नहीं कर सका। पड़ोसी देश भूटान के विकास योजना प्राकृतिक से प्रेम करने का दावा करती है। आख़िर प्राकृतिक सम्पदा को बचाते हुए विकास करने में हर्ज हीं क्या है?

बिहार के इंजीनियर नीतीश सरकार ने राज्य को विकास के लिए सात निश्चय किया है, जिसमें एक ‘हर घर नल का जल’ है। इसको पूरा करने के लिए पहले सबमर्सिबल धंसाया जाता है और फ़िर प्रत्येक घर को नल से जोड़ा जाता है तब जाकर घर को नल का जल पैठ होता है। मोटे तौर पर देखा जाय तो नालंदा में छोटे-बड़े तीन गांव पर एक बड़ा सबमर्सिबल धंसाया जा रहा है और एक बड़ा टैंक का निर्माण कराया जाता है इसका खर्च अनुमानत: करोड़ तो पहुंच हीं जाता होगा। कहीं-कहीं एक गांव में एक सबमर्सिबल धंसाया जाता है जिसपर जनता का लाखोँ रुपया सरकार खर्च कर देती हीं होगी। नीतीश सरकार को  ‘हर घर नल का जल’ पहल को यूनिसेफ से सराहना मिल चुका है।

इससे पूर्व बिहार के नालंदा व अन्य जिलों में हंथिया चापाकल (ग्रामीण नामकरण) धंसाया जाता था जो सबमर्सिबल के आने से एकदम से बंद हो चला है। सरकार इसको भुलाने के मूड में है। लेकिन बिजली जाने तथा मोटर ख़राब होने की स्थिति में गरीब जनता को यहीं चापाकल जिन्दा रहने का सहारा बनता है। चापाकल का एक खासियत यह भी है कि पर्यावरण का हितैषी होता है। परन्तु सबमर्सिबल के आने से चापाकल का जलस्तर सूखने के कगार पर है और कुछ हीं सालों में बिहार में चापाकल इतिहास के पन्नों में हीं रह जायेगाचापाकल से कम खर्च में उत्तम पानी का प्रबंधन हो रहा था। इस दृष्टिकोण से चापाकल की प्राथमिकता को एकदम से दरकिनार नहीं किया जा सकता।
कुशासन और घोटाला के विरुद्ध आवाज उठाकर सत्ता में आनेवाली नीतीश सरकार हर घर नल का जल योजना में भी फिसलती नजर आती है। इस योजना से एक तो बिहार पर आर्थिक दबाव बढ़ा है साथ में यह योजना घूसखोरी, कमिशन और सबमर्सिबल बैठ जाने के बाद भी कई महीनों तक जनता के नल से पानी नहीं निकलने की बात सामने आयी है। कैमूर और जमुई जिला इसके उदाहरन बन चुका है। नालंदा के एकंगर सराय प्रखण्ड के भगवान बिगहा ग्राम में लोक सभा चुनाव के पहले सबमर्सिबल धंसाया गया जिसका काम अब शुरू कर दिया गया है नल बिछाने का काम शुरू किया गया है ।

नीतीश सरकार का ‘हर घर नल का जल’ योजना जल सरंक्षण के खिलाफ़ हो चला , इससे लाखो गैलन रोजाना एक सबमर्सिबल से बिना मतलब के जल बरबाद हो रहा है। जिसका मुख्य वजह है नल का खुला होना। यदि सिलसिला चलता रहा तो चापाकल इतिहास बनने से भला कौन रोक सकता है और 400 फूट का मीठा भौमजल  भी समाप्त हो जायेगा। इसपर अंकुश लगाना बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे जैसी हालात है। अब सवाल यह खड़ा होता है कि भारत का राष्ट्रीय जल मिशन के उद्देश्य का क्या होगा इसको भूला देने का समय आ चुका यह मन लिया जाना चाहिए ? राष्ट्रीय जल मिशन का संकल्प है कि जल संसाधन के एकीकृत प्रबंधन और जल के उपयोग में 20 प्रतिशत तक की कटौती को बढ़ावा देना हैं, जबकि बिहार के नीतीश सरकार हर घर नल का जल के माध्यम से राष्ट्रीय जल मिशन को अन्जाने में हीं सही नुकसान तो पहुंचा हीं दिया है।


भारत जैसे विकाशील देश के लिए ऐसे स्कीम की है जरूरत जिसमें सुविधा तथा रोजगार के साथ-साथ पर्यावरण का भी खयाल रखा जाना चाहिए।
भारत में रोजगार का विस्तार करने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में निवास कर रहे लोगों के जीवन स्तर को सुधरने के लिए एवं क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए और दूसरे राज्यों में रोजगार के खातिर पलायान करनेवाले को रोकने के लिए मनमोहन सिंह (यूपीए) सरकार ने नरेगा (नेशनल रोजगार गारंटी कानून) स्कीम  लायी। जिसको तत्कालिन राजद सांसद व केन्द्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद ने संसद में पेश किया और इसमें मौजूद नियमों को जनता को बताने का काम किया था। यह स्कीम आगे चलकर मनरेगा में तब्दील हो गया जो लोगों को रोजगार दिया, रोजगार के लिए पलायन को रोका और साथ में पर्यावरण के लिए वरदान साबित हुआ। इस स्कीम ने देश में ताल-तलैया, नदी-नहर का पुनरुत्थान किया है और साथ में नदी किनारे पेड़-पौधे का काफी बढ़ोतरी हुई है हालांकि हमारे पास इसका लिखित हिसाब-किताब उपलब्ध तो नहीं है की कितने ताल-तलैया व नदी और इसके किनारे कितने पेड़ लगाए गए फ़िर भी दावा के साथ कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में हमारा देश भारत पहले से काफी विकास किया है।
हमने भारत के बिहार राज्य के नालंदा जिला के एकंगर सराय प्रखण्ड के ओप पंचायत का अवलोकन किया। यहाँ के क्षेत्रों को देखा तथा लोगों से बातचीत करने पर पता चला है कि पेड़-पौधों के मामले में पूर्व के समयों से काफी बेहतर हुआ है। इस बात की पुष्टि यहाँ आकर किया जा सकता है। आज के समय में तालाब तथा नदी किनारे बहुत सारे पेड़ लगें है जो बिल्कुल जबान हो चुका है, जिसे देख कर हम-आप कह सकते हैं कि पर्यावरण के मामले में यह पंचायत काफी अच्छा हो चुका है। ओप पंचायत में एक तालाब है और एक नदी गुजरती है, जिसके किनारे पहले के समयों में सिर्फ घास होता था जो जून के माह में जलकर शमसान में तब्दील हो जाया करता था। अब ऐसा नहीं है, यह क्षेत्र हरा-भरा हो गया है, यहाँ पेड़-पौधा दिखते हैं जो सालों भर हरियाली बनाये रखता है। ये पेड़ पौधे इतने बड़े हो चुके हैं कि तथा यहाँ के लोगों में इन पेड़ों के प्रति इतना लगाव है कि इसका जनता मानवीय विनाश असम्भव प्रतित होता है। सरकारी योजनाओं व फैसलों से हीं इन पेड़ों को खत्म होने का डर व्याप्त है, क्योंकि जनता को इससे लगाव है इसके फायदे से अवगत हो चुकी है, जनता ने इसके लिए पसीना बहाया है जबकि यहाँ के सरकरी रवैया यह है कि योजना को पास कराने के फ़िराक में पेड़-पोधों को काटने में जरा सा भी देर नहीं किया जाता है। जिन लोगों ने इन पेड़ों को रोपने में मेहनत किया, पसीना बहाया, उनका कहना है कि पहले मनरेगा के अन्तर्गत हीं नदी व तालाब के किनारे कुछ-कुछ दुरी पर चापाकल लगाया गया और फ़िर पेड़ लगाने का काम शुरू हुआ। हमसब लगभग दो साल तक इस पेड़ को पटाते तथा जानवरों एवं आदमियों से बचाते रहने का काम किया, जिसके लिए मनरेगा से हमें वेतन मिलता था। आज ये पेड़ जबान हो गया है, देखकर बहुत अच्छा लगता है। यह योजना सिर्फ ओप पंचायत के लिए नहीं था बल्कि पुरे भारत में लागू हुआ था इस तर्क से हम उम्मीद कर सकते हैं कि कम-बेस यहीं दृश्य देश के कोने-कोने में होगा।

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