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रामधारी सिंह दिनकर के द्वारा लिखी गई कविता "जनतंत्र का जन्म" याद आ गई तो...

भारत के किसान लगभग चार महीनों से दिल्ली के पास आंदोलन कर रहें हैं। दिल्ली के कड़ाके की ठण्ड से शुरुआत हुआ आंदोलन आज उतरी भारत के तपती जून और बॉडी को झुलस कर रख देनेवाली गर्मी तक आ पहुंचा है। इतना होने के बाद भी भारत सरकार को किसानों के हालात समझ में नहीं आ रही है। किसानों के मांग को आज तक सुना नहीं गया। मनमोहनसिंह जब भारत के प्रधानमंत्री तब देश के लोगों के लिए उपवास रखकर आंदोलन करनेवाले अन्ना हजारे भी किसानों को धोखा दे गए। ये जनाब बोले थे कि यदि मोदी सरकार जनवरी तक किसानों की बात नहीं मानती है तो हम किसानों के समर्थन में अपने जीवन का आखरी भूख हडताल पर बैठेंगें। लेकिन, जैसे हीं जनवरी और फरवरी भी आया तो अन्ना हजारे मोदी के बड़े नेता के साथ बैठकर पत्रकारों को बताये कि अब हम किसानों के समर्थन में भूख हड़ताल पर नहीं बैठेंगें! https://youtu.be/cQzLXWh9MDI

आप सोच रहे होंगें कि इस घटना पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा लिखित कविता का कविता पाठ करने का मतलब क्या है ? मैं भी इन्सान हूँ जनाब और देशभक्त भी। इतना हीं नहीं, भारतमाता के नारे रोज सुबह-सुबह लगाता हूँ इसलिए अपने दर्द को बताना हीं बेहतर समझा। तो लीजिये प्रस्तुत है!

पहला और आखरी तर्क है - भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के सेवक रह चुके नरेंद्र मोदी जब से भारत के प्रधानमंत्री बने तब से भारत के लोग झटके पे झटका का मज़ा ले रहें हैं । सेवक ने सर्वप्रथम  भारत के लोगों को नोटबंदी के रूप में झटका दिया। पचास दिनों का कहकर लोगों को ऐसा ठोका की आज तक भारत के लोग नोटबंदी के दर्द से कराह रहें हैं और आगे भी कराहने की उम्मीद की जा रही है क्योंकि खतरा अभी टला नहीं है। जनता पैसा के मारे तड़पते रही और सेवक अपनी माँ के साथ सेल्फी को भारतीय मीडिया में पोस्ट करते रहा। सेवक ने लोगों को कहा कि हम नोटबंदी भ्रष्टाचार और कालेधन को समाप्ति के लिए किये हैं। भ्रष्टाचारियों को एक हजार के नोट को छुपाने में दिक्कत होती है इसलिए दो हजार का नोट लेकर आ रहें हैं। 

एक हजार जैसे बड़े नोट को बंद करने के लिए सेवक ने दो हजार के नोट को चालू कर दिया। जनता के साथ इतना बड़ा धोखा होने के बावजूद भी भारत के लोग कुछ भी नहीं बोला। मनमोहनसिंह के समय बात बात पर भूख हड़ताल पर बैठ जानेवाला अन्ना हजारे देश में इतने होने के बाद भी आंदोलन पर नहीं बैठा। आज ये भी भारत के लोगों को भी धोखा दे गये! इतना होने के बाद जाकर लोगों को मालूम पड़ा कि अन्ना हजारे भी आरएसएस के सेवक रह चुके हैं और मोदी ज़ी का तो राजनीतिक में जन्म हीं सेवक पद पर रहने के बदौलत हुआ है। इस हिसाब से तो दोनों भाई हुए। फ़िर कोई भाई अपने भाई के विरुद्ध में आंदोलन थोड़े करता है। इस प्रकार से नोटबंदी पास हो गया, यूं काहे सफल हो गया।

नोटबंदी समाप्त होने के बाद भारत में कोरोना का आगमन हुआ जो आज तक चल रहा है। अब तो भारत के लोगों को  कोरोना के साथ जीने की आदत भी पड़ गई है। भारत में कोरोना के हालात को देखते हुए भारत के गरीब लोगों को मदद करने के लिए भारत के प्रधानमंत्री और आरएसएस के सेवक रह चुके नरेंद्र मोदी ने गरीब व जरूरतमंद लोगों को मदद करने के लिए एक "फण्ड" शुरू किया। जिसमें लोग पैसा जमा किये और ये पैसे देश के जरुरतमंद लोगों को मदद करने पर खर्च किया जायेगा की बात कहकर मोदी ने इस फण्ड की शुरुआत किया। देखते हीं देखते भारत के अमीर लोगों ने इसमें इतना पैसा जमा कर दिया कि इस पैसा से करीब एक साल तक भारत के लोगों का खर्च उठाया जा हीं सकता था। लेकिन, सेवक ने प्रधानमंत्री के इस फण्ड को मनमोहनसिंह द्वारा लाये गए "सूचना का अधिकार" के दायरे से बाहर कर दिया।  

भारत के लोगों को अब मालूम हुआ कि मनमोहन सिंह "सूचना के अधिकार" को इसलिए लाये थे कि सेवक जैसे धन को छूपानेवाले पर कारवाई स्वयं जनता करे। अब जाकर भारत के लोगों को कोरोना काल में मालूम हुआ कि मनमोहनसिंह ने कालाधन जमा करनेवाले को पकड़ने के लिए जनता को अधिकार दे दिए थे, जिसका उन्होंने "सूचना का अधिकार" नाम दिये थे। लेकिन भारत के लोगों को इस्तमाल करना नहीं आ रहा था तो लोग कहने लगे मनमोहनसिंह गलत है - मनमोहनसिंह गलत है। चले न आवे तो अंगना टेढ़ !  

इतना होने के बावजूद भी अन्ना हजारे देश के किसानों का साथ न देकर अपना सेवक भाई को साथ देना फायदेमंद का सौदा समझा। इसमें गलत है हीं क्या? अब आज के किसान सेवक मोदी लाठी द्वारा पिटे जा रहे हैं तो राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के द्वारा लिखा गया कविता "लोकतंत्र का जन्म" याद आ गया। हम किसानों के लिए कर हीं क्या सकते हैं भला! हम आरएसएस के सेवक थोड़े हैं, जो आंदोलन करने लगेंगें तो मेरा साथ देने पूरा देश खड़ा हो जायेगा। नहीं ना!  हम झूठ नहीं बोलेंगें वो भी देश के लोगों के साथ। ना !


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