भारत में बेरोजगारी
का आलम बड़ा व्यापक और स्वभाव से जिद्दी हो गया है हटने का नाम हीं नहीं ले रहा है।
इतना हीं नहीं रोजगार भी बेदर्द हो गया है। इनको भी देश के युवाओं का चेहरा रास
नहीं आ रहा है, फूटी कौड़ी नहीं सोहा रहा है। इतना बेदर्द तो अंग्रेज भी नहीं हुआ
करते थे जनाब! वो भी समय आने पर नरम दिल वाला बन हीं जाते थे, हाँथ जोड़कर उन्होंने
भी प्रणाम करना सीख गए, लोगों के सामने इज्जत से पेश आना भी सीख गए, अपने अन्दर
लज्जा को भी समाहित कर लिया और आर्थिक मामले में तो उन्होंने सोने की चिड़ियाँ कहे
जानेवाला देश भारत को भी पिछे छोड़ दिया। भरतीय भी इनसे शर्माने लगे थे तथा इर्ष्या
के नजरों से देखने लगे थे। अंग्रेजी शासन ने भारत में पहली बार रेलगाड़ी चलायी, सती
प्रथा को समाप्त करने का फैसला लिया, देश का एकीकरण किया और अंततः भारत को छोड़कर
चले जाने का फैसला भी ले लिया। हमारी वर्तमान सरकार बेरोजगारी व भ्रष्टाचार खत्म
करने तथा शिक्षा में सुधार करने के बजाय सामन्य वर्ग का आरक्षण देने, तीन तलाक
प्रथा को खत्म करने एवं नागरिकता संशोधन अधिनियम लाने से काम चलाने के फ़िराक में
लगी है। अब हमारी सरकार रेपो रेट को घटाने-बढ़ाने का काम शुरू किया है। शायद इससे
देश की आर्थिक स्थिति में सुधार हो और हम सब भी यहीं दुआ करते हैं कि रेपो रेट से
सब कुछ सम्भव है, देश को इसके माध्यम से आर्थिक तरक्की हो जाय।
भारत के मौद्रिक
नीति समिति (एमपीसी) ने अपने आम सहमती से फ़ैसला सुना दिया है जिससे मोदी सरकार के
बाल खड़े होने के संकेत है। समिति के अनुसार अब भारतीय रिजर्व बैंक रेपो रेट 5.15
फीसद पर स्थायी रखने का फैसला लिया है इसमें फ़िलहाल किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया
जाने का ईशारा सरकार को कर दिया है, जिससे भारत सरकार को चिन्ता बढ़ लाजमी होगा
क्योंकि सरकार रेपो रेट के माध्यम से उद्योग जगत को आर्थिक रूप से मजबूत करने का
प्रयास कर रही थी जो इस फैसले के बाद सम्भव नहीं होगा। अब दूसरे रास्ते तलासने पड़
सकते हैं। इससे सरकार के समर्थक उद्योगकर्मी नाराज भी हो सकते हैं और इनकी यह
नाराजगी राजनीतिज्ञों को भारी पडनेवाली है। आपको मालूम हो कि वर्तमान समय में रेपो
रेट के माध्यम से भारत के बड़े उद्यमियों को आर्थिक लाभ पहुँचने का काम चल रहा था।
इसपर भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने मोदी सरकार से कड़े शब्दों में
घोषणा कर दियें हैं कि हम रेपो रेट को मशीन की तरह इस्तमाल नहीं कर सकते, इसे जब
चाहे तब घटाया या बढ़ाया नहीं जा सकता है।
इस साल 2019 में पांच
से छह बार रेपो रेट घटाया जा चुका है, सिर्फ फरवरी माह में हीं पांच बार तक रेपो
रेट को घटाने का फैसला लिया गया। अब समझनेवाली बात यह है कि रेपो रेट है क्या,
इससे किनको फायदा होता है, कैसे इसके माध्यम से देश के आर्थिक स्थिति को सुधारने
का प्रयास किया जा सकता है? हम अर्थशास्त्र के भाषा में नहीं बल्कि एक आम आदमी का
साधारण समझ अर्थशास्त्र के भाषा व लक्षणों से इसकी पहचान करने का जतन करते हैं।
रेपो रेट ऐसा यंत्र है जिससे सीधे तौर पर अन्य बैंकों का फायदा हो जाता है। भारतीय
रिजर्व बैंक एक दर निश्चित करता है ताकी उस रेट से अन्य बैंकों को कर्ज मुहैया कराया जा सके और इसी
दर को रेपो रेट कहते हैं। भारत के सभी बैंकों का सरदार रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया
(आरबीआई) अपने रेपो रेट घटाती है तो देश के अन्य बैंक को कम ब्याज दर पर कर्ज
आरबीआई से मिलता है और फ़िर यह बैंक ब्याज दर में कटौती करके मतलब कम ब्याज दर पर अपने
ग्राहक को कर्ज / लोन देने का काम करता है। इससे सीधे और तुरन्त बैंक के ग्राहक को
आर्थिक फायदा मिल जाता है। यहीं वजह रहा कि आरबीआई ने इस साल कई बार रेपो रेट घटा
दिया फ़िर भी इससे देश के आर्थिक स्थिति में बड़ा भूचाल नहीं आया। रोजगार के नए अवसर
पैदा नहीं हो सका परिणामस्वरूप बेरोजगारी का आलम व्यापक स्तर पर बना हीं रहा। आरबीआई
किस उद्देश्य से रेपो रेट में बारम्बार घटाने का फैसला लिया यह समझना जनता के लिए
कोई मायने नहीं रखता लेकिन इससे देश में किस प्रकार के आर्थिक परिवर्तन आते हैं यह
जनता और देश दोनों के लिए बहुत मायने रखता है। जनता को मूलरूप से रोजगार और उनके
क्रय शक्ति में इजाफ़ा चाहिए। यह जनता के लिए हीं नहीं देश के आर्थिक स्थिति में
सुधार करनी है तो देश के लिए भी जरूरत है। यह काम कैसे होगा जनता को सोचना नहीं है
बल्कि सरकार तथा भारत के आर्थिक संस्था को सोचने का काम है। रेपो रेट को घटाने से
इसपर कोई खास असर देखने को पुष्ठी नहीं हुई है, परन्तु आरबीआई का मानना है कि इसका
असर अभी नहीं कुछ समयों के बाद देखने को मिलेगा जो सकारात्मक परिणाम होंगें।
फ़िलहाल देश के आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा सुधार का अनुमान की उम्मीद नहीं है। मोटे
तौर पर देखा जाय तो देश के आर्थिक हालात आस्थाई रूप से दौड़ लगा रहा है, जिसके बारे
में कुछ भी निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता लेकिन रेपो रेट के घटाये जाने से
फायदा की उम्मीद की जानी चाहिए। भले हीं यह कोई बड़ा बदलाव लाने में सक्षम न हो
जिसका देश का जरूरत है उस हिसाब से फायदा न हो लेकिन कुछ तो जरुर असर पड़ेगा। एक
बार देश के आर्थिक हालात पर नजर दौड़ाने का प्रयास करते हैं- आरबीआई ने देश के
महंगाई दर 3.5 से 3.7 फीसद रहने का अनुमान लगाया था, लेकिन अक्टूबर माह में महंगाई
दर 4.6 फीसद के आंकड़े देश के सामने आया। देश के आर्थिक विकास दर का अनुमान भी
अनिश्चितता से भरा रहा है। रिजर्व बैंक पहले देश का आर्थिक विकास दर वर्ष
(2019-20) के लिए 6.1 फीसद का अनुमान लगाया था जिसे स्वयं रिजर्व बैंक ने हीं पांच
फीसद कर दिया। यह कारनामा रिजर्व बैंक ने कई बार कर चुका है। मतलब साफ है देश के
आर्थिक स्थिति पर पकड़ भारत के बड़े आर्थिक संस्था आरबीआई के हाँथ से बाहर निकल चुका
है और मोदी सरकार पहले हीं हाथ खड़े कर चुकी है। केन्द्र सरकार/ मोदी सरकार की ओर
से देश के चालू वित वर्ष की दूसरी तिमाही ( जुलाई – सितम्बर, 2019) के लिए जारी
आंकड़े में बताया गया है कि इस समय भारत का आर्थिक विकास दर 4.5 फीसद रहा है जो
भारत के बड़ी आर्थिक संस्था आरबीआई के अनुमान से मेल नहीं खाता है। रेपो रेट का प्रत्यक्ष
लाभ भारत के उद्योग घरानों को होता है या जो बैंक से लोन लेता है उन्हें होता है।
इनकी संख्या बहुत हीं कम है और ये लोग बेरोजगार या क्रय शक्ति के अभाव से ग्रसित न
के बराबर हैं। अभी देश में कुछ ऐसा करने की जरूरत है जिससे सीधे तौर पर लोगों को
रोजगार मिले जैसे- यूपीए सरकार का मनरेगा स्कीम था। ऐसे हीं कुछ बड़ा करने की जरूरत
है तब देश के आर्थिक विकास दर में सुधार होने की उम्मीद रखा जा सकता है वरना!
