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अपने पड़ोसी देश से भी पिछे रह गया भारत ।।


वैश्विक भुखमरी सूचकांक (जीएचआई) का ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व बिरादरी के सामने कमज़ोर पड़ गया है, भारतीय नेताओं को जीएचआई का रिपोर्ट जानने के बाद जो अमेरिका, जापान, ब्रिटेन चीन आदि जैसे देशों की बराबरी का सपना जनता को दिखलाने के नाम पर वोट मांगते फिरते हैं, छोड़ देना चाहिए। यह भारतीय जनता के साथ धोखा है इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। चन्द्रमा और मंगल ग्रह पर जाने तथा बड़े-बड़े अत्याधुनिक हथियार खरीद लेने से भारत को मजबूत देशों के श्रृंखला में खड़ा करने से पहले भारत में व्याप्त भुखमरी जैसे समस्या के समाधान पर ध्यान देना अच्छा फैसला साबित होगा। अभी भारत राजनीतिकलोबिया से ग्रसित है। भारत राजनीतिक से उपर उठकर देश हीत का बात करना भूलता जा रहा है और इसे गलत भी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि एक लोकतान्त्रिक देश के लिए राजनीति हीं खम्भा होता है जिसके बारे में सभी को अवगत होना तथा बहस करना लाजमी हो जाता है।


लेकिन चिंता की बात यह है की हम सब भारतीय देश के आर्थिक और सामजिक विकास एवं समानता की राजनीति से कोसों दूर जा चुके हैं। हैरान करनेवाली बात है कि लोग विकास व समानता की राजनीति करना हीं नहीं चाहते है। गरीबों को बहस का मुद्दा तो बना देते हैं, उसपर बड़ी-बड़ी बातें बोल जाते हैं, लेकिन सरकार चुनने के समय इसे भूल जाते हैं। ऐसी मानसिकता का हीं परिणाम है की आरक्षण को खत्म करने के लिए देश में आन्दोलन चलाया गया, भारत को बंद कर दिया गया और इसमें ऐसे लोगों को सफलता भी मिला। एक भारतीय होने के नाते आपको मालूम होना चाहिए कि वैश्विक भुखमरी सूचकांक (जीएचआइ) 2019 का रिपोर्ट आ चुका इसमें भारत को 117 देशों की श्रृंखला में 102 स्थान पर रखा गया है। हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान, व बांग्लादेश रैकिंग के मामले में भारत से बहुत बेहतर है। जीएचआइ ने भारत को भुखमरी के स्तर को देखते हुए गम्भीर श्रेणी में डाल दिया है जो भारत के लिए चिंताजनक है। जबकि हमारे नेता रुपया को डालर से बराबरी करने व पड़ोसी देश पर आक्रमण करने का मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ते हैं और भारी मतों से चुनाव जीत भी जाते हैं जबकि देश की जनता पड़ोसी देश के हैसियत लायक भी नहीं है। भारत में पाकिस्तान-पाकिस्तान का खूब शोर है, देश के युवा मतदाताओं से पाकिस्तान पर बात कीजिये तो उनके सारे बाल खड़े हो जाते हैं। भारत के युवा पाकिस्तान को खत्म करने के नाम पर किसी भी नेता को देश का प्रधानमंत्री चुनने में उनको जरा सा भी पछतावा नहीं होता। पाकिस्तान के प्रति भारत जैसे शांतिप्रिय देश में इतना नफ़रत की आग लगाने में भारत के तत्कालिन नेताओं की भूमिका को हमेशा याद किया जायेगा क्योंकि आज पाकिस्तान के खिलाफ़ आग उगलने से नेताओं के राजनीतिक कैरियर बुलन्दियों को छू लेता है यह स्थिति भारत में बन चुका है। अंतर्राष्ट्रीय संस्था जिएचआई के रिपोर्ट के अनुसार भारत के बच्चे पाकिस्तान के बच्चे से भी ज्यादा भुखमरी से ग्रसित हैं तो क्या इस मुद्दे को लेकर भारत के इन युवाओं और नेताओं अपने कान खड़े करेंगें? इस मामले में पाकिस्तान से पिछे रहना शोभा देता है? यदि भारत भुखमरी के मामले में पाकिस्तान से बद्दतर स्थिति में रहता है तो फ़िर इन लोगों को पाकिस्तान-पाकिस्तान के नाम पर वोट मांगने का काम भी छोड़ देना चाहिए।


प्राकृतिक सम्पदा के मामले में भारत अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका से काफी बेहतर है। भारत के पास विशाल नदी डेल्टा का मैदान है जो अनाज उत्पादन की दृष्टिकोण से बहुत उपजाऊ मैदान है एवं उतना हीं श्रम शक्ति में भी सम्पन्न है। फ़िर इस देश में अनाज के अभाव से लोग कुपोषित हो जायें यह सवाल हीं पैदा नहीं लेता। जबकि हमारे पड़ोसी देश इन मामले में काफ़ी पिछे है नेपाल एक पहाड़ी देश है, श्रीलंका का भी यहीं हाल है एवं बांग्लादेश और पाकिस्तान में मैदानी भाग है जो भारत से कम है फ़िर भी ये देश जीएचआई  रिपोर्ट में भारत से बेहतर हो गए। यह दुनिया को अचम्भित करनेवाली घटना है। राजनीतिक रूप से दक्षिण एशिया का नेतृत्व करनेवाला देश भारत अपने बच्चों को पौष्टिक भोजन देने में पिछे रह गया इसे किसी भी हाल में डाइजेस्ट नहीं किया जा सकता और करना भी नहीं चाहिए। तकनीकी क्षेत्र को देखा जाय तो इस मामले में भी विश्व बिरादरी में भारत का डंका बजता है पड़ोसी देश मुकाबला नहीं कर सकते। भारत ऐसा देश हैं जहां विश्व स्तर के धनवान व्यक्ति रहता है। भारत पड़ोसी देशों से सैन्य शक्ति के मामले में भी काफ़ी मजबूत स्थिति में है इतना हीं नहीं भारत के सैन्य शक्ति को दुनिया में इसका नाम है। यहाँ के वैज्ञानिक मंगल ग्रह पर पहुंच चुके हैं जो इन पड़ोसी देश सोच भी नहीं सकते। अपने आर्थिक, राजनीतिक, सामरिक मजबूती की वजह से भारत दक्षिण एशिया का नेतृत्वकर्ता के रूप में है। इतना सब कुछ होने के बावजूद भारत बच्चों को पौष्टिक भोजन के साथ पालने में इन देशों से पिछे रह गया जिसका पहला श्रेय भारत के आंतरिक राजनीतिक तथा अधिकारी व्यवस्था को और दूसरा भारत के आवाम को देना पड़ेगा। कहीं न कहीं हम सब भारत के लोग भी इस मामले में चूक कर रहे हैं, हम सब अपने पैसों को सही तरीके से खर्च करने से अवगत नहीं है और हम अपने बच्चों के प्रति जागरूक कम हैं। वर्तमान भारत के माता-पिता के पास इतना पैसा है कि वे अपने बच्चों को पौष्टिक खाना खिला सकते हैं, लेकिन ऐसा करने में असमर्थ हैं जानकारी के अभाव में। जिनके पास पैसा है उनके बच्चे बजारू खाना खा-खा के अस्वस्थ हो जाता है ये लोग खाना को बरबाद करने तथा अन्हेल्दी खाना के शिकार हैं। जो परिवार आर्थिक रूप से असमर्थ हैं  उनके लिए यूपीए सरकार (कांग्रेस) द्वारा शुरू किया गया आंगनबाड़ी और मिड-डे-मील योजना है जो सरकार के निगरानी में गरीब परिवार के (0-14 वर्ष तक दूसरे शब्दों में गर्भवती माँ से अष्ठम वर्ग तक) बच्चों को पौष्टिक भोजन देने का काम कर रहा है, लेकिन इससे जुड़े अधिकारी अपने जेब भरने के चक्कर में गरीब बच्चों को पौष्टिक भोजन देने के बजाय अपना घर भरने का योजना बना लिए हैं। अब ऐसे देश के बच्चे कुपोषित न होंगें तो क्या होंगें ?  

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