भारतीय जनता पार्टी
(बीजेपी) नये भारत निर्माण पर जोरशोर से काम कर रही है। पार्टी के रजनीतिक
महानायकों नोटबंदी और स्वच्छ भारत निर्माण के बाद नागरिक संशोधन विधेयक 2019 को
लागू करने में अपना पूरा दम-खम लगाने पर उतारू है। इसे भारत के लोगों के लिए
हितकारी विधेयक बताया जा रहा है इसके दूरगामी प्रभाव भी अच्छे होने के संकेत हैं
किसी भी दृष्टी से इसकी आलोचना सुनने के मूड में भारतीय जनता पार्टी के नेतागण व
इनके समर्थक नहीं हैं। हरहाल में लागू करना तय कर लिया गया है। जबकि इसके विरोध
में आवाज उठने शुरू हो गए हैं, पूर्वोतर भारत से विरोधभाष के संकेत मिल रहें हैं,
इस क्षेत्र के जनता विधेयक से नाराज हैं इन्हें परेशानी का डर सता रहा है ये लोग
घर से बेघर हो सकते हैं क्योंकि इन्हीं क्षेत्रों में ज्यादातर शरणार्थी लोग रहते
हैं, जिनपर सीधे-सीधे विधेयक के माध्यम से तलवार चलाये जाने की उम्मीद जतायी जा
रही है। एक दूसरा संकेत यह दिखाई पड़ता है कि इस विधेयक के लागू हो जाने के बाद
संविधान के मूलभूत उद्देश्य पर असर पड़नेवाला है और साथ में अंतर्राष्ट्रीय संस्था
संयुक्त राष्ट्र संघ के नागरिक सुरक्षा कानूनों जो विश्व के नागरिकों को सुरक्षा
देने का वादा करती है का उल्लंघन करने के संकेत परिलक्षित होते हैं। लेकिन भारत के
तत्कालीन सरकार के पास लोकतंत्र का स्पष्ट बहुमत प्राप्त है और जनता का समर्थन भी
इस हिसाब से इन नेताओं पर भला कौन सवाल उठा सकता है ? इनसे कौन पुछने का हिमाकत कर
सकता है कि भारत जैसे शांतिप्रिय देश में ऐसे नागरिकता विधयेक का सही मायने में
औचित्य है, इसके आगे के भारत पर किस प्रकार का प्रभाव पड़नेवाले है तथा इससे भारत
की छबि दुनियां वालों के सामने किस प्रकार के बननेवाले हैं? हम देश के आर्थिक
विकास का काम लोगों को मुहँ बंद करके कर सकते हैं और किया जा भी रहा लोग इस बात को
समझ गए हैं, यहीं वजह रहा कि संविधान भी भारत के नागरिक से सम्पति के अधिकार को
जनता से छीन कर भारत सरकार को समर्पित कर दिया है लेकिन भारत में निवास कर रहें
भारत के लोगों से स्वतंत्र रूप से जीने के अधिकार को राष्ट्रपति शासन के समय भी
जनता के पास सुरक्षित समर्पित कर दिया गया है। इस संकेत को समझने की जरूरत है।
भारत के संविधान के इस निर्देश को हमे अंगीकार करके नागरिकता से जुड़े किसी प्रकार
का अधिनियम देश में लागू करना चाहिए।
नागरिकता से
सम्बंधित संविधान में यह कोई पहला संशोधन नहीं है या फ़िर इसे आखरी भी नहीं माना
जाना चाहिए। समय-समय पर पूर्व सरकारों द्वारा नागरिकता से जुड़े संशोधन किये जा
चुके हैं और इस सरकार भी करने जा रही है। लेकिन पिछले संशोधन तथा इस संशोधन के
संरचना व उद्देश्य में जमीन आसमान का अंतर है जो अपने-अपने जगह पर सही हीं होगा। प्रधानमंत्री
नरेन्द्रमोदी और गृहमंत्री अमित शाह जोड़ी के नागरिकता अधिनियम पिछले सरकार के
द्वारा किये गए परिवर्तन से बहुत अलग है तथा आज के
हालात भी पहले से भिन्न रूप में दृष्टिगोचर होता है। वर्तमान सरकार का मानना है कि
भारत में पड़ोसी देशों से भारत में कुछ लोग अवैध रूप से प्रवेश कर चुके हैं, जिससे
देश का आंतरिक सुरक्षा खतरे में पड़ सकता है और ये लोग भारत में आकर अलगवाद का जनक
बनते जा रहें हैं जिसे इस कानून के जरिये निपटा जा सकता है। नागरिकता संशोधन
अधिनियम 2019 पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश से धर्म के आधार पर प्रताड़ना
के कारण भारत आए हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन व अन्य धर्मावलम्बियों तथा शरणार्थीयों को
भारत की नागरिकता प्रदान किया जाने की सिफारिश करता है जबकि मुस्लिम समुदाय के लोगों को इस अधिनियम से बाहर
रखा गया है। मतलब साफ़ है कि मुस्लिम धर्मावलम्बियों शरणार्थियों को भारत की
नागरिकता नहीं दिया जाने का प्रवधान किया गया है। दूसरे अर्थों में समझा जाय तो
मुस्लिम शरणागत भारतियों को इस देश को छोड़ना पड़ेगा या इन लोग भारत में रहकर अपने
नागरिकता का संघर्ष करेंगें जो भारत सरकार एवं जनता दोनों के लिए बहुत हीं टेढ़ी
खीर साबित होनेवाला है। अधिनियम का यहीं मूल विन्दु देश में कलह का जनक बनता जा
रहा है तथा इसी को लेकर विपक्ष पार्टी इस अधिनियम का विरोध कर रहें हैं।
राष्ट्रीय नागरिकता
रजिस्टर (एनआरसी) पर देश में बहस छिड़ चुकी है। इसको लेकर भारत दो फाड़ हो चुका है।
सत्ताधारी सरकार इसको जायज मानती है वहीं विपक्ष इसे संविधान विरोधी बता रही है। मोदी
सरकार इस बहस पर अपना मंशा साफ़ कर दिया है कि मुस्लिम धर्मावलम्बियों को इस कानून
से अलग हीं रखा जायेगा तथा इस मुद्दे पर सरकार समझौता करने के मूड में बिल्कुल हीं
नहीं है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार का मानना है कि यह विधेयक पूरे देश के
लिय हितकारी साबित होनेवाला है इसलिए इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता। अपने तर्क
में पार्टी का कहना है कि क्योंकि हमारी पार्टी 2014 तथा 2019 के लोकसभा चुनाव में
पार्टी अपने चुनावी अभियान में इस विधेयक को चुनावी वादे में शामिल किये हुए था और
भारत के जनता ने इसी के आधार पर भाजपा को स्पष्ट बहुमत से जिताया है इसलिए हमारी
पार्टी जनता के लिए वचनवद्ध है अतः बीजेपी इस अधिनियम को लागू करने जा रही है।
इसके लिए मोदी टीम लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में अपना बहुमत जुटा चुकी है
क्योंकि पिछले साल इस विधेयक को राज्यसभा में रोक दिया गया था, जिससे लागू नहीं हो
सका। लेकिन इस बार मोदी सरकार पूरे तैयारी के साथ है और विधेयक को पास कराना इनका
मूल लक्ष्य में शामिल हो चुका है जबकि विपक्ष के लोग इस विधेयक को रोकने के लिए
अपना पूरा दमखम लगाने में कोई कसर छोड़नेवाले नहीं हैं। विपक्ष का कहना है कि इसके लिए
हम सुप्रीम कोर्ट तक भी जाने को तैयार हैं। उधर पूर्वोत्तर भारत के प्रतिष्ठित
नेता तरुण गोगोई ने इस विधेयक को असंवैधानिक एवं विभाजनकारी करार दिया है। दक्षिण
भारत के दिग्गज नेता शशि थरूर अपने दार्शनिक विचार में कहते हैं कि नागरिक संशोधन
विधेयक 2019 मौजूदा स्वरूप में पारित हो गया, तो यह गांधी के विचारों पर जिन्ना के
विचारों की जीत होगी।
