जब मासूमियत भी व्यवस्था के दावों की पोल खोल दे-छह साल के बच्चा का सरकार पर आक्रोश।।
छह साल के इस बच्चा का सरकार पर जो आक्रोश
था वो सरकार पर सवाल खङा करता है। नीतीश कुमार के बीस सालों के शासन को चुनौती
देता है। ये घटना बता रही है कि सरकार पिछले बीस साल में सिर्फ राजनीतिक की है।
शिक्षा और इसके सुधार को लेकर सिर्फ खाना-पूर्ति का काम की है। जिसे अब शिक्षित
लोग समझ चुके हैं।
बिहार में प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली
और रोजगार की अनिश्चितता के बीच सड़कों पर उतरा आक्रोश अब केवल नौजवानों तक सीमित
नहीं रह गया है। हाल ही में 6 साल के एक बच्चे
द्वारा शासन-प्रशासन के खिलाफ मुखर होकर पोस्टर थामना और उस पर पुलिस की त्वरित
प्रतिक्रिया, राज्य के मौजूदा ढांचे की संवेदन हीनता और
विफलताओं का आईना है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में खिलौने और किताबें होनी
चाहिए, उस उम्र में यदि एक बच्चा सरकार के खिलाफ
सड़कों पर खड़ा होकर व्यवस्था को उखाड़ने की बात कहे, तो यह किसी भी
लोकतांत्रिक सरकार के दो दशकों के दावों पर सीधा कुठाराघात है।
नीतीश मॉडल और बीस
सालों का हिसाब
पिछले दो दशकों से बिहार में 'सुशासन' और 'शिक्षा में
सुधार' के बड़े-बड़े वादे किए जाते रहे हैं। साइकिल
योजना, पोशाक योजना और इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर
जो दावे कागजों पर चमकाए गए, उनकी असल हकीकत अब
शिक्षित युवाओं और आम जनता के सामने उजागर होने की शुरुआत हो चुकी है। परीक्षा
तंत्र में बार-बार सामने आने वाले पेपर लीक, भर्ती
प्रक्रियाओं में देरी और रोजगार के अभाव ने यह साबित कर दिया है कि पिछले बीस
सालों में शिक्षा क्षेत्र में संस्थागत सुधार के बजाय सिर्फ महज राजनीतिक खाना-पूर्ति
और चुनावी प्रबंधन का काम हुआ है।
शिक्षित समाज और
प्रशासनिक डर
इस पूरी घटना का सबसे दुखद पहलू प्रशासन का
रुख रहा। अपनी मांगों के लिए आवाज उठा रहे छात्रों पर बल प्रयोग और एक मासूम बच्चे
को हिरासत में लेने की प्रशासनिक उत्सुकता यह दर्शाती है कि शासन तंत्र अब संवाद
करने की क्षमता खो चुका है। जब समाज का हर वर्ग—चाहे वह प्रतियोगी परीक्षा की
तैयारी कर रहा युवा हो या अपने भविष्य की अनिश्चितता को देखता एक बच्चा—सिस्टम की
नाकामी को समझने लगता है, तो सत्ता बल प्रयोग का
सहारा लेने लगती है।
बदलाव की गूंज
छह साल के छात्र का यह संकल्प कि "जेल
भी जाना पड़े तो जाएंगे, लाठी भी खाना पड़े तो
खाएंगे, पर भ्रष्टाचारी सरकार को उखाड़
फेंकेंगे", केवल एक नारा नहीं बल्कि वर्षों से जमा हो
रहे जन आक्रोश का प्रस्फुटन ही है। राज्य की सत्ता संभाल रहे हुक्मरानों को यह
समझना होगा कि जनता और विशेषकर युवाओं के भरोसे को लंबे समय तक बयानबाजी से नहीं
बांधा जा सकता। यदि बुनियादी सुधार और परीक्षा प्रणालियों में पारदर्शिता की दिशा
में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सड़कों से उठने
वाली यह आवाज सत्ता के दरवाजे बंद करने का कारण बन सकती है।
(न्यूज डेस्क N5)
