पीडीएस विक्रेताओं का दर्द: व्यवस्था की उपेक्षा और वादों का जाल।।
पटना के गर्दनीबाग में जन वितरण प्रणाली विक्रेताओं (PDS) की आठ सूत्री मांगों को लेकर आयोजित
राज्यस्तरीय विशाल धरना-प्रदर्शन को बिहार नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने संबोधित
कर अपना और पार्टी का समर्थन दे दिया है। बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव
द्वारा पटना के गर्दनीबाग में जन वितरण प्रणाली (PDS) विक्रेताओं के राज्यस्तरीय विशाल धरना-प्रदर्शन
में शामिल होना और उनकी मांगों का पुरजोर समर्थन करना, राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और
राजनीतिक इच्छाशक्ति पर एक बड़ा बहस छेङ दिया है।
फेयर प्राइस डीलर्स एसोसिएशन के बैनर तले अपनी आठ सूत्री मांगों को
लेकर आंदोलन रत ये विक्रेता केवल अपने अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि उस सार्वजनिक वितरण प्रणाली की
बदहाली को उजागर कर रहे हैं जो राज्य के करोड़ों गरीब और वंचित परिवारों के जीवन
का आधार है। रिकॉर्डतोड़ महंगाई, व्याप्त संगठित भ्रष्टाचार और सरकारी उपेक्षा की मार झेल रहे इन राशन
डीलरों का आक्रोश अब राजधानी पटना की सङक पर आ चुका है।
जन वितरण प्रणाली (PDS) विक्रेताओं का राज्यस्तरीय विशाल धरना-प्रदर्शन केवल अपनी आठ सूत्री मांगों को लेकर किया गया एक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह उस चरमराती व्यवस्था का आईना है जो राज्य के करोड़ों गरीबों की भूख मिटाने की रीढ़ मानी जाती है। फेयर प्राइस डीलर्स एसोसिएशन के बैनर तले एकजुट हुए विक्रेता आज रिकॉर्डतोड़ महंगाई, संगठित भ्रष्टाचार और सरकारी उदासीनता की दोहरी मार झेलने को मजबूर हैं। जो राशन डीलर विषम परिस्थितियों में भी अंतिम व्यक्ति तक अनाज पहुँचाने की जिम्मेदारी निभाते हैं, आज खुद उनके परिवारों का भविष्य अनिश्चितता और आर्थिक तंगी के भंवर में फँसा हुआ है।
इस पूरे मामला पर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सवाल उठाये हैं।
उन्होंने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी और पारदर्शी बनाए रखने के लिए
विक्रेताओं को गरिमामय जीवन का आधार देना होगा की मांग को बेहद ज़रूरी बताया।
गुजरात मॉडल की तर्ज पर विक्रेताओं को 30 हज़ार रुपये का निश्चित मासिक मानदेय दिए
जाने की मांग पूरी तरह न्यायसंगत बताया है।
तेजस्वी ने इसपर भी जोर दिया कि अनिश्चित कमीशन के सहारे परिवार चलाना इस महंगाई के दौर में व्यावहारिक नहीं रह गया है। इसके अतिरिक्त, झारखंड की तरह अनुकंपा नियुक्ति में समय सीमा की बाध्यता को समाप्त करना मानवीय दृष्टिकोण से अत्यंत आवश्यक है, ताकि किसी डीलर के असामयिक निधन पर उसका परिवार आर्थिक सहारा पाने से वंचित न रहे।
फिलहाल, वर्तमान प्रशासनिक लापरवाही का सबसे दुखद पहलू यह है कि
विक्रेताओं का छह महीने से लेकर एक वर्ष तक का कमीशन बकाया पड़ा हुआ है। इससे भी
गंभीर बात यह है कि विधानसभा चुनाव पूर्व सरकार द्वारा घोषित 47 रुपये की कमीशन
बढ़ोतरी एक वर्ष बीत जाने के बाद भी कागज़ों से बाहर नहीं निकल सकी है। चुनावी
घोषणाओं का इस तरह अमल में न आना सरकार की नीति और नीयत दोनों पर सवाल खड़े करता
है। महीनों तक कमीशन रुकने से हज़ारों परिवारों के लाखों लोग आज गंभीर आर्थिक
परेशानियों का सामना कर रहे हैं।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार केवल डिजिटल तकनीकों या कड़े
नियमों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए धरातल पर काम कर रहे डीलरों की बुनियादी ज़रूरतों को
पूरा करना भी उतना ही अनिवार्य है। सरकार को ज्ञापन और आश्वासनों से आगे बढ़कर
अविलंब लंबित कमीशन का भुगतान करना चाहिए और मानदेय की मांग पर ठोस नीति बनानी
चाहिए। यदि व्यवस्था की नींव में खड़े राशन डीलर ही उपेक्षित और असंतुष्ट रहेंगे, तो खाद्य सुरक्षा के तमाम सरकारी दावे
धरातल पर खोखले ही साबित होंगे।
