Skip to main content

विश्लेषण: ट्रंप का दावा—'अगर मैं न होता तो हो जाता परमाणु युद्ध', जानिए इस बयान के पीछे की बड़ी इनसाइड स्टोरी।।

विश्लेषण: ट्रंप का दावा—'अगर मैं न होता तो हो जाता परमाणु युद्ध', जानिए इस बयान के पीछे की बड़ी इनसाइड स्टोरी।।

​वॉशिंगटन / नई दिल्ली /N5:

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने चिर-परिचित आक्रामक और बेबाक अंदाज में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को हिलाकर रख दिया है।  ट्रंप के ताजा बयान ने मध्य पूर्व (Middle East) और दक्षिण एशिया (South Asia) के समीकरणों को एक नया मोड़ दे दिया है। 

ट्रंप ने न सिर्फ अमेरिकी सैन्य ताकत का लोहा मनवाया, बल्कि यह दावा भी कर दिया कि उनके दखल की वजह से दुनिया एक संभावित परमाणु युद्ध से बच गई। आइए ट्रंप के इस बहुआयामी बयान का सिलसिलेवार और गहराई से विश्लेषण करते हैं।

​1. 'परमाणु युद्ध' का दावा: कितनी हकीकत, कितना फसाना?
​ट्रंप का यह कहना कि "अगर मैं नहीं होता, तो परमाणु युद्ध हो जाता," उनका अब तक का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला दावा है। ट्रंप यहां मुख्य रूप से दो मोर्चों की ओर इशारा कर रहे हैं।

​भारत-पाकिस्तान तनाव: पुलवामा और बालाकोट संकट के बाद दोनों देशों के बीच परमाणु युद्ध की आशंकाएं चरम पर थीं। ट्रंप यह संदेश देना चाहते हैं कि पर्दे के पीछे से अमेरिका ने दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसियों को शांत करने में निर्णायक भूमिका निभाई।

​अमेरिका-ईरान संकट: जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान और अमेरिका सीधे युद्ध के मुहाने पर थे। ट्रंप का दावा है कि उनके कड़े रुख और बाद में दिखाई गई 'राहत' ने इस संकट को विश्व युद्ध में बदलने से रोक लिया।

​2. ईरान पर 'पाकिस्तानी मध्यस्थता' और ट्रंप की राहत।

​बयान का सबसे दिलचस्प हिस्सा वह है जहां ट्रंप कहते हैं, "मैंने पाकिस्तान के कहने पर ईरान को थोड़ी राहत दी।" 

यह पहली बार है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ (mediator) की भूमिका निभाई है।

​पाकिस्तान के ईरान के साथ करीबी ऐतिहासिक और भौगोलिक संबंध हैं (बकौल ट्रंप: "पाकिस्तान ईरान के करीब हैं" )। पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा कि उसके पड़ोस में कोई बड़ा युद्ध हो। 

इस मध्यस्थता के जरिए पाकिस्तान ने खुद को वैश्विक मंच पर एक 'समस्या' के बजाय 'संकटमोचक' (trouble-shooter) के रूप में पेश करने की कोशिश की है।

​ट्रंप असल में ईरान को पूरी तरह तबाह नहीं करना चाहते, बल्कि वे एक ऐसी नई और सख्त डील चाहते हैं जो काम करे ("हम एक ऐसी डील चाहते हैं जो सार्थक हो" )। इसके लिए वे पाकिस्तान के प्रभाव का इस्तेमाल करके ईरान पर 'सही काम करने' (परमाणु कार्यक्रम रोकने) का दबाव बना रहे हैं।

​3. 'पाकिस्तान अब मेरा दोस्त है': रिश्तों में यू-टर्न।

​कुछ समय पहले तक जो डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान पर 'झूठ और धोखे' का आरोप लगाकर उसकी सैन्य मदद रोक चुके थे, आज उनका यह कहना कि "पाकिस्तान मेरे दोस्त बन गए हैं", अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आए एक बड़े बदलाव को दिखाता है।

​अमेरिका को अफगानिस्तान से अपने पैर खींचने के लिए पाकिस्तान की रसद और तालिबान पर उसके प्रभाव की सख्त जरूरत थी।

अमेरिका भारत के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी रखता है, लेकिन दक्षिण एशिया में पूरी तरह किसी एक पाले में न दिखने के लिए वह पाकिस्तान को भी पूरी तरह छोड़ना नहीं चाहता। ट्रंप ने "हमने उन्हें भारत के साथ युद्ध करने से रोका" कहकर भारत को भी यह संदेश दिया है कि दक्षिण एशिया की शांति की चाबी अभी भी वाशिंगटन के पास है।

​4. बॉडी लैंग्वेज का खेल: 'बाबा ट्रंप' का कूटनीतिक संदेश।

​लेख के अंत में ध्यान देने योग्य बात वह है जो इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के दृश्य (visuals) से उभरती है—जहाँ राष्ट्रपति ट्रंप बैठकर बात कर रहे हैं । कूटनीति में 'बॉडी लैंग्वेज' और बैठने की व्यवस्था (seating protocol) का बहुत महत्व होता है।

​इसे 'पावर प्ले' (Power Play) कहा जाता है। यह अमेरिकी घरेलू जनता को यह दिखाने का तरीका भी है कि 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति के तहत दुनिया के नेता उनके सामने खड़े होते हैं।

​निष्कर्ष
​डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान महज एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि यह उनकी 'लेन-देन वाली कूटनीति' (Transactional Diplomacy) का क्लासिक उदाहरण है। 

वे पाकिस्तान को अपनी उंगलियों पर नचाना चाहते हैं, भारत को आश्वस्त रखना चाहते हैं, और ईरान को बातचीत की मेज पर लाना चाहते हैं। ट्रंप ने खुद को एक ऐसे वैश्विक मसीहा के रूप में पेश किया है जिसने दुनिया को परमाणु विनाश से बचाया, भले ही इसके लिए उन्होंने कूटनीतिक मर्यादाओं और प्रोटोकॉल को ताक पर रख दिया हो।

Popular Posts

एक सेल्स मैन का काम कर रहें हैं तो आपको इस एक बात का ख्याल अवश्य रखना चाहिए।

एक सेल्स मैन को ये काम अवश्य करनी चाहिए, यदि आप एक सेल्स मैन का काम कर रहें हैं तो आपको इस एक बात  का ख्याल अवश्य रखना चाहिए। एक सेल्स मैन को ये काम अवश्य करनी चाहिए। यदि आप एक सेल्स मैन का काम कर रहें हैं तो आपको इन बातों का ख्याल अवश्य रखना चाहिए। हम कोई भी काम करते हैं उसकी योजना अवश्य तैयार करते हैं। एक छोटा सा छोटा काम के लिए भी हम योजना बनाते हैं। हलांकि छोटे कामों के लिए बनाये गए योजना हमारा दिमाग को पता नहीं चलता। हमारे दिमाग को इसके लिए परेशान होने की जरूरत नहीं पड़ती है। इसपर कभी आपने सोचा है कि आख़िर ऐसा क्यों होता है ? इसकी वजह को हमे जानने का प्रयास अवश्य करनी चाहिए। ऐसे तो इसके अनेकों वजह हो सकते हैं और इसके मनोवैज्ञानिक कारण भी कई हो सकते हैं, लेकिन हमे इन भारी वजहों को छोड़कर एक सरल वजह की तलाश करने की जरूरत है। मेरे अनुसार सरल स्वभाव से इसका एक वजह यह भी हो सकता है कि हमारा दिमाग इन छोटे-छोटे कामों को पहले कई बार कर चुका होता है। यूं कहें इस काम को मेरा दिमाग पूर्ण रूप से अभ्यस्त हो गया होता है। इसलिए हमारा दिमाग को इस छोटा काम को पूरा करने में किसी प्रकार की परेश...

एक कप चाय, मिट्टी वाली में - चाय को पीने में जो मजा है, वो मजा सात समन्दर पार जाकर भी नहीं वो कैसे !

एक कप चाय से याद आया कि मिट्टी के बर्तन वाली चाय को पीने में जो मजा है, वो मजा सात समन्दर पार जाकर एक प्रेमी को अपने प्रेमिका या एक प्रेमिका को अपने प्रेमी से मिलने में भी नहीं होगा! लेकिन वो मजा इस चाय पीने में आपको मिलेगा।  आप महिला हों या पुरुष यदि आप अपने जीवन में, प्रेम में प्रवाहित होने के आनंद से वंचित रह गाएं हैं तो हमारी मानिये एक बार इस चाय के प्रेम में बह जाइये, डूब जाइये और इसके गर्माहट में गोते लगा लीजिये! इसके मंद-मंद सुगंध में अपने नाक के दोनों सुराग को झोंक दीजिये। लेकिन एक बात का ख्याल रखियेगा,   इस चाय को पीने में कभी जल्दीबाजी नहीं कीजियेगा। नहीं तो, आपका जीभ आपसे नाराज हो जायेगा। बेमतलब के आप बेचारा स्वभाव से कोमल जीभ को रुखा कर दीजियेगा। यदि आपको विश्वास नहीं होता, तो एक बार मिट्टी वाला चुक्का में परोसी गई चाय को अपने होंठ से लगाकर और चाय को जीभ पर गिराकर तो देखिये! जैसे हीं, यह चाय आपके जीभ को स्पर्श करेगी वैसे हीं आप स्वयं इसके स्वाद से परिचित हो जाएंगें। हमारी मानिये तो आज हीं आप नुक्कड़ वाली एक कप चाय का मज़ा ले लीजिये। भारत आधुनीकता की ओर कदम बढ़ा च...

राहुल गांधी ने 'एल्फिंस्टन' (Elphinstone) फाइल का जिक्र करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी को घेरा। सदन में भारी हंगामा।।

राहुल गांधी ने 'एल्फिंस्टन' (Elphinstone) फाइल का जिक्र करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी को घेरा। सदन में भारी हंगामा।। राहुल गांधी ने संसद में जिस 'एल्फिंस्टन' (Elphinstone) फाइल या संदर्भ का जिक्र किया, वह सीधा हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार की कार्यशैली पर था। गांधी ने सदन में एक पुरानी फाइल या रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह तर्क देने की कोशिश की कि सरकार कुछ खास उद्योगपतियों (अडानी-अंबानी) को फायदा पहुँचाने के लिए नियमों में बदलाव करती है। उन्होंने 'एल्फिंस्टन' नाम का जिक्र उन ऐतिहासिक नियमों या व्यवस्थाओं के संदर्भ में किया जो मुंबई के बंदरगाहों या रेलवे के बुनियादी ढांचे से जुड़ी थीं। राहुल गांधी ने पीएम मोदी को घेरते हुए निम्नलिखित बातें कहीं: ​नियमों में बदलाव: उनका आरोप था कि सरकार ने पुराने नियमों (जिनका उन्होंने एल्फिंस्टन संदर्भ से जोड़ा) को दरकिनार कर दिया ताकि एयरपोर्ट्स और पोर्ट्स का नियंत्रण कुछ विशेष व्यापारिक समूहों को दिया जा सके। ​अडाणी समूह का जिक्र: उन्होंने दावा किया कि पहले नियम था कि जिसे एयरपोर्ट संचालन का अनुभव नहीं है, उसे टेंडर नहीं म...