UGC 2012 Rule: SC/ST छात्रों के लिए सुरक्षा कवच या 'कागजी शेर'? जानिए क्यों उठ रही है इसे खत्म करने की मांग

UGC 2012 Rule: SC/ST छात्रों के लिए सुरक्षा कवच या 'कागजी शेर'? जानिए क्यों उठ रही है इसे खत्म करने की मांग

नई दिल्ली/ब्यूरो: उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक न्याय और समानता के दावों के बीच एक पुरानी बहस फिर से जीवंत हो गई है। मामला विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2012 के उन नियमों का है, जो अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा UGC के नए 2026 नियमों पर 'स्टे' (Stay) लगाने और 2012 के पुराने नियमों को ही प्रभावी रखने के फैसले ने वंचित वर्ग के छात्रों और विचारकों के बीच आक्रोश पैदा कर दिया है।

विशेषज्ञों और छात्र संगठनों का तर्क है कि 2012 का यह नियम SC/ST छात्रों को न्याय दिलाने में पूरी तरह विफल रहा है और इसे "लहूलुहान" करने वाला कानून कहना गलत नहीं होगा।

क्या है 2012 का UGC नियम?

वर्ष 2012 में UGC ने "उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना" (Promotion of Equity) विनियम अधिसूचित किया था। इसका उद्देश्य परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकना था। इसके तहत:

  • हर कॉलेज/यूनिवर्सिटी में एक 'एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर' नियुक्त करना था।

  • जातिगत भेदभाव की शिकायतों के निवारण के लिए एक तंत्र बनाना था।

  • SC/ST छात्रों के लिए समानता सुनिश्चित करने हेतु 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल' (EOC) की स्थापना करनी थी।

विवाद की जड़: क्यों यह नियम SC/ST के लिए घातक है?

नलांदा5 के विश्लेषण के अनुसार, 2012 के नियम में कुछ ऐसी कमियां हैं जो इसे प्रभावहीन बनाती हैं:

  1. बाध्यता का अभाव (Non-Binding): 2012 के नियम केवल 'सलाह' (Advisory) की तरह थे। अगर कोई विश्वविद्यालय इनका पालन नहीं करता, तो UGC के पास उस संस्थान के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई (जैसे फंडिंग रोकना या मान्यता रद्द करना) का कोई ठोस अधिकार नहीं था।

  2. जवाबदेही की कमी: शिकायतों के निपटारे के लिए कोई निश्चित समय सीमा (Time-frame) तय नहीं थी। इसके कारण रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी जैसे मामले सामने आए, जहाँ संस्थानों ने समय पर कोई कदम नहीं उठाया।

  3. सिर्फ कागजी खानापूर्ति: अधिकांश विश्वविद्यालयों में 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल' सिर्फ फाइलों तक सीमित रहे। छात्रों को यह भी पता नहीं होता था कि भेदभाव होने पर शिकायत कहाँ और कैसे करनी है।

कोर्ट के 'स्टे' का असर: वंचित वर्ग की उम्मीदों पर पानी

UGC ने 2026 के लिए नए सख्त नियम बनाए थे, जिनमें दोषी संस्थानों की फंडिंग रोकने और भारी जुर्माने का प्रावधान था। लेकिन सामान्य वर्ग के कुछ संगठनों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इन नए नियमों पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा है कि फिलहाल 2012 वाले पुराने नियम ही लागू रहेंगे।

"2012 के नियम वापस लाना SC/ST छात्रों को उसी अंधेरी गली में धकेलने जैसा है, जहाँ उनकी शिकायतों को सुनने वाला कोई नहीं है। यह नियम छात्रों को सुरक्षा देने के बजाय उन्हें लाचार बनाता है।" - सामाजिक न्याय कार्यकर्ता

निष्कर्ष: सुधार या समाप्ति?

SC/ST छात्रों के हितों की रक्षा के लिए 2012 के इस "दंतविहीन" (Teethless) नियम को खत्म करना या इसमें क्रांतिकारी बदलाव करना अनिवार्य है। जब तक नियमों में दंड और जवाबदेही का प्रावधान नहीं होगा, तब तक कैंपस में समानता केवल एक सपना बनी रहेगी।


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