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संगम की रेती पर सेवा का संकल्प और 'नेताजी' की विरासत ||

संपादकीय: संगम की रेती पर सेवा का संकल्प और 'नेताजी' की विरासत

प्रयागराज: प्रयाग की पावन त्रिवेणी पर लगा माघ मेला केवल आस्था का संगम नहीं है, बल्कि यह भारत की उस महान परंपरा का साक्षी है जहाँ सेवा को ही परम धर्म माना गया है। इस वर्ष मेले के दृश्य कुछ खास हैं। संगम तट पर श्रद्धालुओं के जयघोष के बीच मुलायम सिंह सेवा संस्थान द्वारा संचालित सेवा शिविर मानवता की एक नई कहानी लिख रहे हैं।

गंगा और 'नेताजी' का अटूट नाता

इस सेवा कार्य के मूल में 'नेताजी' के नाम से विख्यात मुलायम सिंह यादव जी की वे स्मृतियां हैं, जो उन्हें इस पावन धरती से जोड़ती थीं। बहुत कम लोग जानते हैं कि नेताजी के हृदय में गंगा मैया के प्रति अगाध श्रद्धा थी। वे न केवल गंगा स्नान प्रेमी थे, बल्कि गंगा की अविरलता और उसके तट पर आने वाले गरीबों, किसानों और वंचितों की सुख-सुविधाओं को लेकर हमेशा सजग रहते थे। उनके लिए गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की जीवनदायिनी और संस्कृति का प्रतीक थी। आज उनकी इसी सोच को विस्तार देते हुए 'मुलायम सिंह सेवा संस्थान' माघ मेले में आने वाले हर श्रद्धालु की सेवा में जुटा है।

सेवा का स्वरूप: भोजन भी, आरोग्य भी

मेले में दूर-दराज के जनपदों और ग्रामीण अंचलों से आए श्रद्धालु, जो भीषण ठंड में कल्पवास करते हैं, उनके लिए संस्थान ने 'अन्नक्षेत्र' (भंडारा) की व्यवस्था की है। यहाँ केवल भोजन नहीं, बल्कि सम्मान परोसा जा रहा है।

इसके साथ ही, संस्थान ने एक अत्यंत सराहनीय पहल 'निशुल्क नेत्र जांच शिविर' के रूप में की है। गाँवों से आने वाले कई बुजुर्ग अपनी आँखों की समस्याओं को अनदेखा कर देते हैं, लेकिन संगम तट पर उन्हें विशेषज्ञों द्वारा जांच और परामर्श की सुविधा मिल रही है। यह कदम दर्शाता है कि संस्थान केवल तात्कालिक राहत नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के बेहतर स्वास्थ्य और भविष्य के प्रति भी गंभीर है।

राजनीति से परे, लोकनीति की राह

मुलायम सिंह यादव जी का जीवन समाज के अंतिम व्यक्ति की सेवा के लिए समर्पित था। आज जब संस्थान के कार्यकर्ता कड़ाके की ठंड में लोगों को भोजन बांटते हैं या आंखों की जांच में बुजुर्गों का हाथ थामते हैं, तो उसमें नेताजी की उसी 'लोकनीति' की झलक मिलती है। यह आयोजन राजनीति की सीमाओं को लांघकर पूरी तरह से परमार्थ के मार्ग पर है।

N5Bharat का मानना है कि आस्था के इस महाकुंभ में जब धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ ऐसे सामाजिक सरोकार जुड़ते हैं, तभी प्रयागराज की महिमा और अधिक बढ़ जाती है। संस्थान का यह प्रयास उन लाखों श्रद्धालुओं के लिए एक संबल है, जो विश्वास की डोर थामे संगम की रेती पर आते हैं।

नेताजी की यादों को संजोए हुए यह सेवा शिविर इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति चला जाता है, लेकिन उसके द्वारा बोए गए सेवा के बीज वटवृक्ष बनकर समाज को छाया देते रहते हैं।

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