राहुल गांधी का 'वोट चोरी' वाला बयान—राजनीति या संवैधानिक संस्थाओं पर प्रहार?
विश्लेषण: राहुल गांधी का 'वोट चोरी' वाला बयान—राजनीति या संवैधानिक संस्थाओं पर प्रहार?
नई दिल्ली/पटना: कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगाए गए "वोट चोरी" के आरोपों ने देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। राहुल गांधी ने दावा किया है कि पीएम मोदी चुनाव जीतकर नहीं, बल्कि "वोट चोरी" करके सत्ता में आए हैं। इस बयान के बाद राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता के बीच यह बहस छिड़ गई है कि क्या यह महज एक चुनावी जुमला है या युवाओं को भड़काने की एक सोची-समझी रणनीति?
'वोट चोरी' का आरोप और हकीकत
राहुल गांधी ने अपनी रैलियों और सोशल मीडिया के जरिए यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश की है कि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है। हालांकि, गौर करने वाली बात यह है कि भारतीय चुनाव आयोग (ECI) एक स्वतंत्र संस्था है और भारत की चुनाव प्रणाली की दुनिया भर में मिसाल दी जाती है।
विशेषज्ञों का तर्क: यदि राहुल गांधी के पास इस "चोरी" के कोई ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें सड़कों पर बयानबाजी करने के बजाय न्यायालय (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाना चाहिए। भारत में चुनाव याचिका (Election Petition) दायर करने का कानूनी प्रावधान है, लेकिन साक्ष्यों के अभाव में केवल बयानबाजी करना संस्थानों की साख पर हमला माना जा रहा है।
क्या युवाओं को गुमराह किया जा रहा है?
लेख का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राहुल गांधी सीधे तौर पर देश के युवाओं और 'Gen Z' को संबोधित कर रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि बेरोजगारी और आर्थिक मुद्दों पर बात करने के बजाय, चुनाव प्रक्रिया पर संदेह पैदा करना युवाओं के मन में लोकतंत्र के प्रति अविश्वास भर सकता है।
"लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सबको है, लेकिन बिना प्रमाण के संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए 'अपशब्द' और 'चोरी' जैसे शब्दों का प्रयोग करना राजनीतिक मर्यादा का उल्लंघन है।"
बीजेपी की कड़ी प्रतिक्रिया
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों को "निराधार और हार की हताशा" करार दिया है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि जब कांग्रेस चुनाव जीतती है (जैसे हिमाचल या तेलंगाना में), तब ईवीएम और चुनाव प्रक्रिया सही होती है, लेकिन हारने पर वे संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने लगते हैं।
निष्कर्ष
राजनीति में आरोपों का स्तर इतना नीचे नहीं गिरना चाहिए कि वह देश की नींव यानी 'लोकतंत्र' पर ही सवालिया निशान लगा दे। राहुल गांधी को चाहिए कि वे अपने दावों की पुष्टि के लिए संवैधानिक रास्तों का चुनाव करें, न कि केवल जनसभाओं में ऐसे आरोप लगाएं जो 'अपशब्द' की श्रेणी में आते हों।
ब्यूरो रिपोर्ट, N5Bharat News
