गुलफिशा फातिमा 5 साल बाद जेल से रिहा: सुप्रीम कोर्ट से जमानत ।।
गुलफिशा फातिमा 5 साल बाद जेल से रिहा: सुप्रीम कोर्ट से जमानत के बाद तिहाड़ से आईं बाहर
नई दिल्ली: 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े 'बड़ी साजिश' (Larger Conspiracy) के मामले में आरोपी छात्रा कार्यकर्ता गुलफिशा फातिमा बुधवार, 7 जनवरी 2026 को तिहाड़ जेल से रिहा हो गई हैं। करीब 5.5 साल जेल में बिताने के बाद उनकी घर वापसी हुई है।
सुप्रीम कोर्ट से मिली बड़ी राहत
सोमवार, 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाया था। अदालत ने गुलफिशा फातिमा समेत पांच आरोपियों को जमानत दी, जबकि उमर खालिद और शारजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी।
जमानत पाने वाले अन्य आरोपी:
मीरान हैदर
शिफा-उर-रहमान
मोहम्मद सलीम खान
शादाब अहमद
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देते समय स्पष्ट किया कि लंबे समय तक बिना ट्रायल के जेल में रखना अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा:
"जमानत देना संवैधानिक विवेक का एक नपा-तुला अभ्यास है, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्र की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाता है।"
अदालत ने यह भी माना कि इन पांचों आरोपियों की भूमिका उमर खालिद और शारजील इमाम की तुलना में "कम गंभीर" प्रतीत होती है।
रिहाई की प्रक्रिया और शर्तें
दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रिहाई के निर्देश जारी किए। गुलफिशा को 2 लाख रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की दो स्थानीय जमानतों पर रिहा किया गया है।
अदालत द्वारा लगाई गई शर्तें:
उन्हें मुकदमे की लंबित अवधि के दौरान शांति और अच्छा व्यवहार बनाए रखना होगा।
वे किसी भी रैलियों या सार्वजनिक सभाओं में हिस्सा नहीं ले सकेंगी।
किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या डिजिटल माध्यम से भड़काऊ सामग्री या पोस्टर प्रसारित करने पर रोक रहेगी।
पृष्ठभूमि: क्या था मामला?
गुलफिशा फातिमा को अप्रैल 2020 में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उन पर सख्त आतंकवाद विरोधी कानून UAPA के तहत आरोप लगाए गए थे। पुलिस का दावा था कि वह CAA-NRC के विरोध प्रदर्शनों के दौरान दंगों की साजिश रचने में शामिल थीं। गुलफिशा के वकीलों ने हमेशा इन आरोपों को निराधार बताया था और 5 साल से अधिक समय तक बिना ट्रायल जेल में रहने को मानवाधिकारों का हनन कहा था।
