पीएम ने दोहराया बयान और बताया, 'दिमागी नक्सल' को लाल किला से होम्योपैथी की पहली गोली दी थी।
“मैंने लाल किले से जैसे ही दिमागी नक्सल वाली होम्योपैथी की गोली दी, सारे दिमागी नक्सल निकल कर बाहर आने लगे, और जो लोग दिमागी नक्सल को बढ़ावा दे रहे हैं, अब जनता उनका भी असली रंग देख रही है।-माननीय प्रधानमंत्री।”
पीएम नरेंद्र मोदी का यह बयना उन युवायों के सामने दिया गया जो आगे चलकर कुछ हिं दिनों में देश के मुख्य धारा अगली पंक्ति का नेतृत्व करने वाले हैं। इस बयान के कई मायने हैं। पहला कि यह बयान पीएम ने स्वतंत्रता दिवस के दिन दिया था। दूसरा कि लाल किला से दिया था। तीसरा, लाल किला ऐसा स्थल है, जहाँ से सिर्फ शांति फैलाया जाता है। यहाँ से किसी वर्ग पर राजनीतिक प्रहार नहीं कर सकते। भारत के अन्य प्रधान मंत्री मोदी जैसा बयान दिया होगा, लेकिन भारत का एक ऐसा पीएम हुए डॉक्टर मनमोहन सिंह जी, जिसने लाल किला से ऐसा भाषण नहीं दिया और उसके बाद उस बयान को फिर दोहराया नहीं।
भारतीय राजनीति और सार्वजनिक विमर्श में शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं के बयानों का अपना एक विशेष महत्व और वजन होता है। हाल ही में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से और उसके पश्चात युवा वर्ग के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया 'दिमागी नक्सल' (अर्बन या मेंटल नक्सल) संबंधी बयान देश भर में चर्चा और तीखी बहस का केंद्र बन गया है। इस बयान के राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक निहितार्थों को लेकर विश्लेषकों और आम जनता के बीच विभिन्न दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं।
लाल किला भारत की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक परंपरा और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक माना जाता रहा है। पारंपरिक रूप से इस ऐतिहासिक स्थल का उपयोग देश के विकास की भावी दिशा तय करने, शांति, सद्भाव और वैश्विक कल्याण का संदेश देने के लिए होता रहा है। इस मंच से राजनीतिक आक्षेपों या किसी विशिष्ट विचारधारात्मक वर्ग पर कड़े प्रहार करने से बचने की परंपरा रही है।
प्रधानमंत्री का बयान कि—"मैंने लाल किले से जैसे ही दिमागी नक्सल वाली होम्योपैथी की गोली दी, सारे दिमागी नक्सल निकल कर बाहर आने लगे..."—उस युवा पीढ़ी के सामने आया जो आने वाले समय में देश के नेतृत्व और नीतियों की दिशा तय करेगी। आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर युवाओं के बीच ऐसी भाषा और तंज का प्रयोग देश के समावेशी ताने-बाने पर सवाल खड़े करता है।
राजनीतिक विश्लेषक पूर्व प्रधानमंत्रियों, विशेष रूप से डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल और भाषण शैली का उल्लेख करते हैं। डॉ. मनमोहन सिंह ने भी देश के सामने आंतरिक सुरक्षा और नक्सलवाद को गंभीर चुनौती माना था, किंतु उन्होंने इस विषय पर लाल किले की प्राचीर या अन्य मंचों से विचार रखते समय बेहद संयमित, नीतिगत और विचारशील भाषा का प्रयोग किया। उन्होंने नक्सलवाद को एक सामाजिक-आर्थिक चुनौती के रूप में देखा और समाधान पर बल दिया, न कि किसी वैचारिक समूह को राजनीतिक शब्दावली से लक्षित करने पर।
विरोधी पक्षों और नागरिक समाज के एक बड़े वर्ग का तर्क है कि 'दिमागी नक्सल' जैसी शब्दावली का प्रयोग लोकतंत्र में असहमति जताने वाले विचारकों, बुद्धिजीवियों और युवाओं को हाशिए पर धकेलने का प्रयास हो सकता है। जब शीर्ष नेतृत्व द्वारा ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाता है, तो इससे समाज में ध्रुवीकरण और विभाजन की भावना को बढ़ावा मिलने का जोखिम रहता है।
एक जीवंत लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन संवाद की गरिमा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। भारत का लाल किला किसी एक पार्टी या राजनीतिक धारा का नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है। युवाओं को आगे बढ़ाने और देश की मुख्यधारा में लाने के लिए आवश्यक है कि उन्हें जोड़ने वाली, सकारात्मक और सर्वसमावेशी भाषा से प्रेरित किया जाए। देश का भावी नेतृत्व इस बात से तय होगा कि राजनीतिक विमर्श में कितनी परिपक्वता, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान होता है।
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(रिपोर्ट- शैलेन्द्र कुमार सम्पादकीय डेस्क N5)
