"JPNIC विवाद पर अखिलेश यादव का तीखा हमला: 'निर्माता नहीं, केवल बेचने वाली सोच है भाजपा"
लखनऊ/उत्तर प्रदेश/N5:
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर विकास, जन-विरासत और सियासी सोच को लेकर जुबानी जंग तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ स्थित जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर (JPNIC) को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार पर बेहद कड़ा और भावनात्मक हमला बोला है। सोशल मीडिया के जरिए सरकार की प्राथमिकताओं और नीतियो पर सवाल उठाते हुए अखिलेश यादव ने साफ कहा कि सत्ता में बैठे लोग जन-हित की भव्य संरचनाओं को बनाने का हौसला नहीं रखते, वे सिर्फ बनी-बनाई विरासतों का सौदा करना जानते हैं।
सपा प्रमुख ने अपने आधिकारिक बयान में तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि भाजपा JPNIC जैसी अद्भुत और ऐतिहासिक सिग्नेचर बिल्डिंग्स का निर्माण करना तो दूर, उसके बारे में सोच भी नहीं सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार और संकीर्ण मानसिकता ने सत्ताधारियों की दृष्टि को कुंठित कर दिया है। जब कोई सरकार जन-हित के लिए बड़ा विजन नहीं रख पाती, तब वह जनता की गाढ़ी कमाई से खड़ी की गई राष्ट्रीय धरोहरों और आधुनिक इमारतों का निजीकरण करने या उन्हें बेचने की नीति अपनाती है।
अखिलेश यादव का यह प्रहार केवल एक इमारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के विकास मॉडल पर सीधा सवाल खड़ा करता है। JPNIC जैसी विशाल संरचनाएं केवल ईंट और गारे की इमारतें नहीं हैं; ये लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे महान विचारकों के सम्मान, प्रदेश के आधुनिक दृष्टिकोण और जनता के लिए विश्वस्तरीय सुविधाओं के सपने का प्रतीक हैं। अखिलेश यादव का तर्क है कि जहां एक तरफ समाजवादी सोच ने राज्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर के इंफ्रास्ट्रक्चर से सजाने का काम किया, वहीं दूसरी तरफ मौजूदा सरकार की प्राथमिकताएं केवल संकुचित दायरे में सिमट कर रह गई हैं।
अखिलेश यादव ने अपनी बात का अंत एक बेहद धारदार और राजनीतिक संदेश वाले नारे के साथ किया— "भाजपा जाएगी, बड़ी सोच आएगी!" यह पंक्ति सीधे तौर पर जन-भावनाओं को झकझोरने और आने वाले चुनावों के लिए एक वैचारिक दिशा तय करने का काम करती है। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उन लोगों के दर्द की आवाज है जो प्रदेश को विकास की ऊंचाई पर देखना चाहते हैं।
विकास और निर्माण की राजनीति हमेशा दीर्घकालिक दृष्टिकोण से तय होती है, जबकि बनी-बनाई संपत्तियों को बेचना या गिरवी रखना एक तात्कालिक और संकीर्ण नीति को दर्शाता है।
इस मुद्दे पर दो मुख्य दृष्टिकोण उभरकर सामने आते हैं:
सृजन और विजन (बनाने वाली सोच): किसी राज्य या देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए बड़े प्रोजेक्ट्स (जैसे JPNIC, एक्सप्रेसवे, या विश्वस्तरीय संस्थान) का निर्माण करना केवल ईंट-पत्थर खड़े करना नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए अवसर, रोजगार और प्रदेश की पहचान गढ़ने का काम करता है। यह 'बड़ी सोच' और दीर्घकालिक विकास का प्रतीक है।
मुद्रीकरण और संकुचित सोच (बेचने या गिरवी रखने की नीति): जब सरकारें नए और बड़े प्रोजेक्ट्स बनाने के बजाय मौजूदा सार्वजनिक संपत्तियों को बेचने, लीज पर देने या मॉनिटाइज (Monetize) करने पर निर्भर हो जाती हैं, तो इसे आर्थिक दूरदर्शिता की कमी माना जाता है। जनता के टैक्स के पैसे से बनी राष्ट्रीय और प्रांतीय धरोहरों का निजीकरण करना यह दर्शाता है कि सरकार अपनी वित्तीय प्राथमिकताओं को संभालने में नाकाम हो रही है।
लोकतंत्र में जनता हमेशा उस नेतृत्व को पसंद करती है जो सृजनकर्ता (Builder) हो, न कि केवल सौदागर (Seller)। सार्वजनिक संपत्तियां देश और राज्य की साझा विरासत होती हैं। उन्हें बेचने या गिरवी रखने के बजाय उनका पारदर्शी संचालन और रख-रखाव करना ही सच्ची प्रशासनिक क्षमता है। जब नीतियां निर्माण के बजाय बिक्री पर केंद्रित होने लगती हैं, तो विकास का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। अब सवाल यह उठता है कि क्या जन-सुविधाओं और गौरवशाली इमारतों को इस तरह उपेक्षित करना सही है? जनता यह साफ देख रही है कि किसने प्रदेश को भविष्य की बड़ी सोच दी और कौन केवल संकीर्ण राजनीति का परिचय दे रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा उत्तर प्रदेश के राजनीतिक मंच पर और भी ज्यादा गरमाने वाला है।
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(सम्पादकीय: शैलेन्द्र कुमार N5)
