बिहार में बाढ़ का तांडव: 12 जिलों में हाहाकार, पानी में डुबकी लगाती जिंदगी और कैमरे के सामने नेता।
विशेष रिपोर्ट पटना/बिहार/N5: बिहार में उफनती नदियों ने एक बार फिर
लाखों जिंदगियों को घुटनों पर ला दिया है। गंगा, गंडक, सोन, पुनपुन, घाघरा, बूढ़ी गंडक,
बागमती और कोसी नदियों के रौद्र रूप के
कारण प्रदेश की स्थिति गंभीर बनी हुई है। पटना, भोजपुर, सारण, वैशाली, भागलपुर, मुंगेर, कटिहार, बेगूसराय
और बक्सर समेत 12 जिलों की 10 लाख से भी अधिक आबादी जलप्रलय का सामना करने को
मजबूर है। कई इलाकों में पानी घुसे 4-5 घंटे से अधिक का समय बीत चुका है और लोग
अपने ही घरों में कैद होने को विवश हैं।
“बिहार में आये बाढ़ के 4-5 घंटा पहले
की तस्वीर है। इन जिलों के घरों में पानी घुस चुका है। लोगों को घरों में दुबकने
के सिवा कोई उपाय नहीं है। ऐसी स्थिति में हवाई सेना द्वार मदद किये जाने की तस्वीर
आनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं। नेताओं के तस्वीरें देखने को मिले।”
तटबंधों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है और कई निचले इलाकों में पानी तेजी
से फैल गया है। हालांकि केंद्रीय जल आयोग के अनुसार पटना के गांधी घाट पर गंगा के
जलस्तर में आंशिक कमी दर्ज की गई है, लेकिन
सोन, घाघरा, बूढ़ी गंडक और कोसी नदियां अभी भी कई स्थानों पर खतरे के निशान से
ऊपर बह रही हैं। सड़कों का वजूद मिट चुका है और ग्रामीण इलाके पूरी तरह कट चुके
हैं।
घरों में दुबकने को मजबूर लोग, कहां
हैं जीवनरक्षक दल?
स्थिति इतनी भयावह है कि लोग अपने घरों के ऊपरी हिस्सों या छतों पर दुबकने के सिवा कोई रास्ता नहीं तलाश पा रहे हैं। कई गांवों में चूल्हे तक पानी में डूब चुके हैं। ऐसे वक्त में जब लोगों के पास न खाने को भोजन है और न पीने का साफ पानी, प्रशासनिक स्तर पर त्वरित राहत और राहत सामग्री पहुंचाने के लिए वायुसेना के हेलीकॉप्टरों की उम्मीद जताई जा रही थी। आदर्श स्थिति यह होती कि आसमान में मंडराते वायुसेना के हेलीकॉप्टरों से एयरड्रॉप की जाती राहत सामग्री और लोगों को एयरलिफ्ट किए जाने की तस्वीरें सामने आतीं।
तस्वीरों का फर्क: सेना की जगह राजनेताओं की चहलकदमी
लेकिन ज़मीनी हकीकत का मंज़र कुछ और ही बयां कर रहा है। आपदा के इस
दौर में पीड़ितों तक समय पर मदद पहुंचने के बजाय, टीवी स्क्रीन और समाचार पत्रों में नेताओं के दौरों, निरीक्षणों और बयानों की तस्वीरें हावी हैं।
जलभराव वाली जगहों पर नेताओं के फोटो-ऑप्स (Photo-Ops) तो खूब दिखाई दे रहे हैं, लेकिन
जिन ग्रामीणों के घरों में 4-5 फीट पानी भरा हुआ है, वे अब भी प्राथमिक राहत और एयर-रेस्क्यू का इंतजार कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब-जब नदियां उफान पर आती हैं, सरकारी अमला हवाई और ज़मीनी सर्वेक्षणों तक सीमित रह जाता है। ग्राउंड ज़ीरो पर फंसी जनता सिर्फ यही सवाल पूछ रही है— जब तटबंध टूट रहे हों और नदियां खतरे के निशान को लांघ चुकी हों, तब राजनीति की तस्वीरें ज्यादा जरूरी हैं या राहत सामग्री लेकर आने वाले सेना के हेलीकॉप्टर? आने वाले 24-48 घंटे बेहद नाजुक हैं और अब भी जनता को ठोस राहत अभियान का इंतजार है।
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(रिपोर्ट- शैलेन्द्र कुमार न्यूज डेस्क N5)


