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संकट में भारत का 'भौगोलिक कवच': अरावली में बढ़ती दरारें बढ़ा रही हैं पूर्वी राज्यों में रेगिस्तान का खतरा।।

संकट में भारत का 'भौगोलिक कवच': अरावली में बढ़ती दरारें बढ़ा रही हैं पूर्वी राज्यों में रेगिस्तान का खतरा।।

​विशेष संवाददाता/N5
नई दिल्ली/जयपुर
​भारत के सबसे उपजाऊ मैदानी इलाकों—उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल—की कृषि संपन्नता के पीछे छिपे एक मौन रक्षक पर आज गंभीर संकट मंडरा रहा है। 

राजस्थान के थार रेगिस्तान से उठने वाले भयानक रेतीले तूफान (Dust Storms) जब भी देश के पूर्वी हिस्सों की तरफ बढ़ते हैं, तो उनके रास्ते में दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, अरावली एक मजबूत दीवार बनकर खड़ी हो जाती है। 

पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि अरावली को नहीं बचाया गया, तो उत्तर और पूर्वी भारत की अति उपजाऊ मिट्टी बहुत जल्द रेत के समंदर में बदल सकती है।

​###थार की आंधियों और गंगा के मैदानों के बीच 'द ग्रेट वॉल'

​भौगोलिक दृष्टि से अरावली पर्वतमाला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा होते हुए दिल्ली तक लगभग 692 किलोमीटर में फैली है। यह केवल पत्थरों का पहाड़ नहीं, बल्कि भारत का एक प्राकृतिक 'क्लाइमेट बैरियर' (जलवायु अवरोधक) है।

​हर साल गर्मियों के मौसम में राजस्थान और पड़ोसी देश पाकिस्तान के रेतीले इलाकों से 70 से 100 किमी/घंटे की रफ्तार से चलने वाली बालू युक्त हवाएं उठती हैं। ये हवाएं अपने साथ लाखों टन महीन बालू रेत लेकर पूर्व की ओर बढ़ती हैं। अरावली इन गर्म और धूलभरी हवाओं को सीधे आगे बढ़ने से रोक देती है। 

जिससे उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) वाले बेहद उपजाऊ खेत इस बंजर रेत की मार से सुरक्षित बचे रहते हैं।

​###अरावली न हो तो क्या होगा?

​कृषि वैज्ञानिकों और भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि अरावली का यह सुरक्षा चक्र हटा दिया जाए, तो भारत की खाद्य सुरक्षा (Food Security) खतरे में पड़ जाएगी:

​मिट्टी का मरुस्थलीकरण (Desertification): उड़कर आने वाली बालू रेत उत्तर प्रदेश और बिहार की उपजाऊ मिट्टी पर जमा होने लगेगी। रेत में पोषक तत्वों और जल-धारण क्षमता (Water Retention) की कमी होती है, जिससे यह अति उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे बंजर होने लगेगी।

​फसलों की तबाही: धान, गेहूँ और गन्ने के कटोरे कहे जाने वाले इन राज्यों में हर साल रेतीले तूफान फसलों को अंकुरण के स्तर पर ही दफन कर देंगे।

​"अरावली भारत का एक ऐसा भौगोलिक कवच है जो थार रेगिस्तान के पूर्ववर्ती विस्तार (Desert March) को रोकता है। इसके बिना उत्तर भारत के मौसम चक्र और कृषि व्यवस्था की कल्पना भी डरावनी है।"— पर्यावरण विशेषज्ञ।

​खतरे की घंटी: अरावली में हो चुके हैं 28 से अधिक 'गैप'
​चिंता की बात यह है कि पिछले कुछ दशकों में अनियंत्रित और अवैध खनन (Illegal Mining), शहरीकरण और जंगलों की कटाई के कारण इस प्राकृतिक दीवार को भारी नुकसान पहुँचा है।

​भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और विभिन्न पर्यावरण रिपोर्टों के अनुसार, राजस्थान और हरियाणा के हिस्सों में अरावली की पहाड़ियां कई जगहों से पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। पूरी पर्वत श्रृंखला में 28 से अधिक बड़े गैप (दरारें) आ चुके हैं।

​###असर दिखने लगा है:

इन खुले रास्तों (Gaps) से होकर अब रेगिस्तान की रेत और धूल भरी हवाएं दिल्ली-NCR, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में आसानी से घुस रही हैं। हाल के वर्षों में दिल्ली और पश्चिमी यूपी में गर्मियों के दौरान धूल के गुबार और आसमान में धुंध (Haze) का बढ़ना इसी का सीधा नतीजा है।

​###समय रहते जागने की जरूरत

​यदि अरावली के इन गैप्स को भरने के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण (Green Wall of India) नहीं किया गया और अवैध खनन पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई गई, तो वह दिन दूर नहीं जब यह रेतीली हवाएं बिहार और पश्चिम बंगाल के खेतों को भी अपनी चपेट में ले लेंगी। 

अरावली का संरक्षण अब केवल राजस्थान का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे देश के अस्तित्व और किसानों की आजीविका को बचाने की लड़ाई है।

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