सियासत से बड़ा 'साथ'—बंगाल के रण में ममता की 'शक्ति' बने तेजस्वी यादव

विशेष रिपोर्ट: सियासत से बड़ा 'साथ'—बंगाल के रण में ममता की 'शक्ति' बने तेजस्वी यादव

कोलकाता: पश्चिम बंगाल के चुनावी महासमर में जहाँ गठबंधन के कई साथी अपनी राहें जुदा कर चुके हैं, वहीं बिहार के युवा नेतृत्व तेजस्वी यादव ने 'गठबंधन धर्म' की एक ऐसी मिसाल पेश की है जिसकी गूँज पूरे देश में है। राहुल गांधी के तीखे हमलों और कांग्रेस के विरोध के बीच, तेजस्वी यादव ने ममता दीदी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर यह साबित कर दिया कि असली राजनीति पदों के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांतों और रिश्तों के लिए की जाती है।

"दीदी बंगाल की शेरनी हैं": तेजस्वी का ममता को खुला समर्थन

कोलकाता की सड़कों पर जब तेजस्वी यादव और ममता बनर्जी एक साथ नजर आए, तो समर्थकों का उत्साह चरम पर था। तेजस्वी ने न केवल चुनावी रैलियों को संबोधित किया, बल्कि ममता बनर्जी के संघर्ष को देश के लिए मिसाल बताया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ममता दीदी बंगाल की वह 'शेरनी' हैं जो अकेले दिल्ली की सत्ता को चुनौती दे रही हैं, और संकट के इस समय में उन्हें अकेला छोड़ना गठबंधन धर्म के खिलाफ होता।

राजनीति से ऊपर की सोच

जहाँ कांग्रेस के दिग्गज नेता ममता सरकार पर बीजेपी से भी अधिक प्रहार कर रहे हैं, वहीं तेजस्वी यादव ने इन मतभेदों से ऊपर उठकर सोचा। उन्होंने साफ संदेश दिया कि जब शत्रु बड़ा हो, तो सहयोगियों के बीच के छोटे-मोटे झगड़ों को भुला देना चाहिए। तेजस्वी ने बिहार और बंगाल के ऐतिहासिक रिश्तों की दुहाई देते हुए हिंदी भाषी मतदाताओं से अपील की कि वे 'दीदी' के हाथों को मजबूत करें।

'गठबंधन धर्म' बनाम 'चुनावी होड़'

तेजस्वी का यह कदम केवल चुनावी जीत के लिए नहीं, बल्कि विपक्षी एकता के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है। सियासी हलकों में इस बात की चर्चा है कि राहुल गांधी के हमलों ने जहाँ विपक्ष में बिखराव दिखाया, वहीं तेजस्वी के समर्थन ने ममता बनर्जी को एक नई मनोवैज्ञानिक बढ़त दिला दी है।

"ममता दीदी का साथ देना मेरी नैतिक जिम्मेदारी है। हम यहाँ जीतने-हारने नहीं, बल्कि एक योद्धा का साथ देने आए हैं जो देश के लोकतंत्र के लिए लड़ रही है।"तेजस्वी यादव (एक चुनावी जनसभा के दौरान)

वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे चरण के मतदान के बीच राज्य की सियासत में एक अद्भुत विरोधाभास देखने को मिल रहा है। जहाँ एक तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपनी रैलियों में ममता बनर्जी पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) से भी अधिक तीखा हमला बोल रहे हैं, वहीं बिहार के युवा नेता तेजस्वी यादव ने 'गठबंधन धर्म' की एक नई परिभाषा लिखते हुए ममता बनर्जी का हाथ थाम लिया है।

राहुल के तीखे बाण: "बीजेपी की बी-टीम" का आरोप

हालिया रैलियों में राहुल गांधी का रुख ममता बनर्जी के प्रति अप्रत्याशित रूप से हमलावर रहा है। उन्होंने मालदा और मुर्शिदाबाद की सभाओं में सीधे तौर पर मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि बंगाल में 'तानाशाही' और 'भ्रष्टाचार' का बोलबाला है। राहुल ने यहाँ तक कह दिया कि TMC राज्य में बीजेपी की 'बी-टीम' की तरह काम कर रही है ताकि विपक्षी वोटों को बांटा जा सके। राजनीति के जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के लिए यह 'अस्तित्व' की लड़ाई है, क्योंकि बंगाल में उसका जनाधार पूरी तरह खिसक चुका है।

निष्कर्ष: बिखराव या नई शुरुआत?

बंगाल का यह चुनाव विपक्षी एकता (INDIA Alliance) के लिए एक प्रयोगशाला बन गया है। एक तरफ कांग्रेस का 'एकला चलो' वाला रवैया है, तो दूसरी तरफ तेजस्वी यादव, हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं का ममता के प्रति अटूट विश्वास।

अब देखना यह होगा कि राहुल गांधी के हमले ममता बनर्जी को कमजोर करते हैं या तेजस्वी यादव का साथ उन्हें चौथी बार सत्ता की कुर्सी तक पहुँचाता है। पर एक बात साफ है—तेजस्वी यादव ने इस चुनाव में खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया है जो गठबंधन की गरिमा को चुनावी हार-जीत से ऊपर रखता है।