झारखंड राज्यसभा चुनाव: 'इंडिया' गठबंधन में रार, कांग्रेस और आरजेडी आमने-सामने।।
24 अप्रैल, 2026 को आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए एक बहुत बड़ा राजनीतिक झटका लगा जब राज्यसभा में उसके 10 में से 7 सांसदों ने पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का फैसला किया।
इन सांसदों का नेतृत्व राघव चड्ढा कर रहे थे। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि वे कुल सांसदों का दो-तिहाई (2/3) हिस्सा हैं, इसलिए उन पर दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत कार्रवाई नहीं होनी चाहिए और इसे तकनीकी रूप से बीजेपी के साथ विलय माना जाना चाहिए।
बीजेपी में शामिल होने वाले सात सांसदों के नाम निम्नलिखित हैं:
राघव चड्ढा (पंजाब)
संदीप पाठक (पंजाब)
अशोक मित्तल (पंजाब)
हरभजन सिंह (पंजाब)
विक्रमजीत सिंह साहनी (पंजाब)
संजीव अरोड़ा (राजिंदर गुप्ता) (पंजाब)
स्वाति मालीवाल (दिल्ली)
कारण: राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि आम आदमी पार्टी अपने मूल सिद्धांतों और भ्रष्टाचार विरोधी दावों से भटक गई है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काम करने की इच्छा जताई।
पंजाब पर असर: इन 7 सांसदों में से 6 पंजाब से हैं। पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में यह घटना राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है।
AAP की प्रतिक्रिया: संजय सिंह और अन्य AAP नेताओं ने इसे "ऑपरेशन लोटस" का हिस्सा बताते हुए इन सांसदों को "गद्दार" कहा और राज्यसभा सभापति से इनकी सदस्यता रद्द करने की मांग की है।
अब राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के पास केवल 3 सांसद (संजय सिंह, संत बलबीर सिंह सीचेवाल और एन.डी. गुप्ता) बचे हैं।
आम आदमी पार्टी के अन्य नेता ने इस राजनीतिक विलय को गद्दार बताकर संबोधित कर रहे हैं
आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इस घटना पर बहुत तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बीजेपी में शामिल होने वाले सांसदों पर कड़ा प्रहार किया है।
आम आदमी पार्टी की ओर से आए प्रमुख बयान और आरोप इस प्रकार हैं:
"गद्दार" और "धोखेबाज" का टैग: संजय सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट रूप से कहा कि जिन लोगों को अरविंद केजरीवाल और पार्टी के कार्यकर्ताओं ने खून-पसीने से सींचकर राज्यसभा भेजा, उन्होंने पीठ में छुरा घोंपा है। उन्होंने इन्हें "गद्दार" करार दिया।
ऑपरेशन लोटस का आरोप: पार्टी ने आरोप लगाया कि यह बीजेपी के "ऑपरेशन लोटस" का हिस्सा है। AAP का दावा है कि इन सांसदों को डरा-धमकाकर या भारी प्रलोभन देकर तोड़ा गया है।
जनता के जनादेश का अपमान: भगवंत मान ने कहा कि पंजाब की जनता ने इन चेहरों को नहीं, बल्कि 'झाड़ू' के निशान और अरविंद केजरीवाल की राजनीति को वोट दिया था। उन्होंने इसे पंजाब के लोगों के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात बताया।
सदस्यता रद्द करने की मांग: पार्टी ने राज्यसभा के सभापति (उपराष्ट्रपति) को पत्र लिखकर मांग की है कि इन सांसदों की सदस्यता तुरंत रद्द की जाए। AAP का तर्क है कि यह "विलय" नहीं बल्कि स्वार्थ के लिए किया गया दल-बदल है।
पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी पंजाब और दिल्ली के कई हिस्सों में इन सांसदों के खिलाफ प्रदर्शन किया और उनके पुतले फूंके। AAP अब इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाने और इसे 2027 के पंजाब चुनावों में "धोखे" के रूप में भुनाने की योजना बना रही है।
आम आदमी पार्टी के में हुए इस राजनीतिक बदलाव को राजनीतिक जानकार लोग इसे बङी दरार माना जा रहा है
यह आम आदमी पार्टी (AAP) के इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी फूट मानी जा रही है। 2012 में पार्टी के गठन के बाद से कई बड़े नेता (जैसे प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव या कुमार विश्वास) अलग हुए, लेकिन यह पहली बार है जब पार्टी का एक बड़ा निर्वाचित ब्लॉक (Elected Block) टूटकर दूसरी पार्टी में गया है।
इसे 'बड़ी दरार' मानने के पीछे कई ठोस कारण हैं:
इस टूट से पहले राज्यसभा में AAP एक महत्वपूर्ण ताकत थी, जिसके पास 10 सांसद थे। अब केवल 3 सांसद रह जाने से संसद के ऊपरी सदन में पार्टी की आवाज और वोटिंग की ताकत लगभग खत्म हो गई है।
राघव चड्ढा को अरविंद केजरीवाल का सबसे भरोसेमंद और 'दायां हाथ' माना जाता था। वे पार्टी के मुख्य रणनीतिकार और चेहरे थे। उनका बीजेपी में जाना केवल एक सांसद का जाना नहीं, बल्कि पार्टी के अंदरूनी भरोसे का टूटना है।
बीजेपी में शामिल होने वाले 7 में से 6 सांसद पंजाब से हैं। यह भगवंत मान सरकार और पंजाब में पार्टी की पकड़ के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। इससे यह संदेश जा रहा है कि पंजाब इकाई के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है, जो 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी की संभावनाओं को कमजोर कर सकता है।
चूंकि सांसदों ने दो-तिहाई (2/3) का आंकड़ा पार कर लिया है (10 में से 7), इसलिए वे दल-बदल कानून से बच सकते हैं। अगर अदालत या सभापति इसे वैध मान लेते हैं, तो यह AAP के अस्तित्व के लिए एक बड़ा कानूनी सेटबैक होगा।
लगातार कानूनी जांचों और बड़े नेताओं (जैसे केजरीवाल और सिसोदिया) की जेल यात्रा के बीच, इस तरह की सामूहिक बगावत जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ सकती है।
कुल मिलाकर, यह दरार केवल संख्या बल की नहीं है, बल्कि वैचारिक और रणनीतिक भी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि AAP के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती अपनी बाकी बची टीम को एकजुट रखना और जनता के बीच अपनी "कट्टर ईमानदार" छवि को फिर से स्थापित करना होगा।