ईरान और अमेरिका (तथा इजरायल) के बीच शुरू हुए संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में मचा दी हलचल।।



ईरान और अमेरिका (तथा इजरायल) के बीच शुरू हुए संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में मचा दी हलचल।।

ईरान और अमेरिका (तथा इजरायल) के बीच हाल ही में शुरू हुए संघर्ष (फरवरी-मार्च 2026) ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मचा दी है। भारत के लिए यह स्थिति काफी संवेदनशील है, क्योंकि हमारी ऊर्जा सुरक्षा का एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र पर निर्भर है।सोशल मीडिया पर फैल रही तेल और गैस की किल्लत की खबरों के बीच इंडियन ऑयल (IOCL) और भारत पेट्रोलियम (BPCL) ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया है कि घबराने की कोई बात नहीं है।

युद्ध ने विश्व जगत और  भारत को कैसे प्रभावित किया इसको इस प्रकार से समझा जा सकता है:

​1. तेल और गैस की कीमतों में उछाल
​कच्चा तेल (Crude Oil): इस युद्ध के चलते वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें $90-95 प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं। संघर्ष जारी रहने पर इसके $100 के पार जाने की आशंका जताई जा रही है।
​LPG की कीमतें: भारत में सरकारी तेल कंपनियों ने हाल ही में (7 मार्च 2026) घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में ₹60 की बढ़ोतरी की है। दिल्ली में अब सिलेंडर की कीमत ₹913 तक पहुँच गई है, जो अगस्त 2023 के बाद सबसे अधिक है।
​प्राकृतिक गैस (LNG): कतर से होने वाली गैस सप्लाई प्रभावित होने के कारण एशियाई स्पॉट LNG की कीमतें दोगुनी होकर $25 mmBtu के स्तर को छू रही हैं।

​2. 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) का संकट
​भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता हॉर्मुज जलडमरूमध्य है। यह वह संकरा समुद्री रास्ता है जहाँ से दुनिया का 20% और भारत के कच्चे तेल का लगभग 40-50% हिस्सा गुजरता है।
​आपूर्ति में बाधा: ईरान द्वारा इस रास्ते पर जहाजों को चेतावनी देने और इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा कवरेज वापस लेने से तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है।
​रूस से राहत: अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की विशेष छूट दी है ताकि खाड़ी देशों से होने वाली तेल की कमी को पूरा किया जा सके।

​3. भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
​महंगाई (Inflation): तेल की कीमतें बढ़ने से ट्रांसपोर्टेशन महंगा हो रहा है, जिसका सीधा असर फल, सब्जी और अन्य जरूरी सामानों की कीमतों पर पड़ने लगा है।
​राजकोषीय घाटा: भारत अपनी जरूरत का 88-90% तेल आयात करता है। ऊँची कीमतों के कारण भारत का 'इम्पोर्ट बिल' बढ़ेगा, जिससे रुपया कमजोर हो सकता है।
​उर्वरक (Fertilizers) संकट: इस क्षेत्र से यूरिया और सल्फर का बड़ा निर्यात होता है। इसकी कमी से भारत में खेती की लागत बढ़ सकती है और सरकार का सब्सिडी बोझ भी बढ़ेगा।

भारत के संदर्भ में इस समस्या का समाधान इस प्रकार से भारत सरकार द्वारा निकाले गए हैं।

1. तेल कंपनियों का आधिकारिक रुख
​अफवाहों का खंडन: इंडियन ऑयल और भारत गैस ने 'एक्स' (Twitter) पर स्पष्ट किया कि देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। उन्होंने इन खबरों को "निराधार" और "भ्रामक" बताया है।
​सप्लाई चेन सुरक्षित: कंपनियों ने आश्वासन दिया है कि उनकी रिफाइनरियां सामान्य रूप से काम कर रही हैं और वितरण नेटवर्क (Distribution Network) पूरी तरह सक्रिय है। उन्होंने नागरिकों से अनुरोध किया है कि वे पेट्रोल पंपों पर भीड़ न लगाएं और पैनिक बुकिंग न करें।

​2. सरकार द्वारा उठाए गए ठोस कदम
​केवल आश्वासन ही नहीं, सरकार ने बैकएंड पर कई कड़े फैसले लिए हैं ताकि कमी न होने पाए:
​LPG उत्पादन बढ़ाने के निर्देश: पेट्रोलियम मंत्रालय ने सभी रिफाइनरियों को आदेश दिया है कि वे अपनी अन्य प्रक्रियाओं (जैसे पेट्रोकेमिकल्स) को रोककर सारा ध्यान LPG उत्पादन पर लगाएं।
​इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल: सरकार ने विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए यह सुनिश्चित किया है कि प्रोपेन और ब्यूटेन जैसी गैसों का उपयोग केवल घरेलू रसोई गैस बनाने में किया जाए।
​रणनीतिक रिजर्व: भारत के पास अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए लगभग 25 दिनों का कच्चे तेल का रिजर्व और करीब 2-3 हफ्तों का LNG स्टॉक मौजूद है।

​3. वैकल्पिक स्रोत (Alternatives)
​ईरान संकट के बावजूद आपूर्ति सुचारू रखने के लिए भारत ने अपनी रणनीति बदली है:
​रूस से तेल आयात: संकट के समय अमेरिका द्वारा मिली विशेष छूट के बाद भारत रूस से और अधिक तेल खरीदने की योजना बना रहा है।
​अन्य देशों से बातचीत: कतर में सप्लाई रुकने के बाद भारत ने ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका से गैस (LNG) खरीदने के लिए बातचीत शुरू कर दी है।

फिलहाल, भारत सरकार और तेल कंपनियां 'वेट एंड वॉच' (देखो और इंतजार करो) की स्थिति में हैं। हालांकि रसोई गैस के दाम बढ़े हैं, लेकिन पेट्रोल और डीजल की कीमतों को अभी स्थिर रखने की कोशिश की जा रही है क्योंकि कंपनियों के पास पिछले मुनाफे का कुछ 'कुशन' मौजूद है।

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