विजय (Thalapathy Vijay) का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय।AIADMK (47 सीटें) ने दिया संकेत।।

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विजय (Thalapathy Vijay) का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय।AIADMK (47 सीटें) ने दिया संकेत।।  2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के परिणाम बेहद ऐतिहासिक रहे हैं। अभिनेता से नेता बने विजय (Thalapathy Vijay) की पार्टी तमिलगा वेट्टी कड़गम (TVK) ने अपने पहले ही चुनाव में राज्य के पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के समीकरणों को बदलते हुए सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी जगह बनाई है। मौजूदा सत्ताधारी पार्टी DMK (59 सीटें) अपने सहयोगियों के साथ मिलकर भी बहुमत के आंकड़े से काफी दूर है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की हार और पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद DMK ने फिलहाल विपक्ष में बैठने के संकेत दिए हैं। 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद राज्य में त्रिशंकु विधानसभा (Hung Assembly) की स्थिति बन गई है। विजय (Thalapathy Vijay) की पार्टी TVK सबसे बड़ी पार्टी तो बन गई है, लेकिन सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 118 के जादुई आंकड़े से 10 सीटें पीछे रह गई है। 2021 के चुनाव में कांग्रेस (INC), DMK (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) के नेतृत्व वाले 'सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस' (SPA) का हिस्सा थी। इस गठबंधन में DMK ...

नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार ने राजनीतिक में प्रवेश कर गए और उन्होंने जदयू की सदस्यता ग्रहण कर ली।।

नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार ने राजनीतिक में प्रवेश कर गए और उन्होंने जदयू की सदस्यता ग्रहण कर ली।। 

नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार राजनीतिक में प्रवेश कर गए। जदयू की सदस्यता ग्रहण कर ली। इनका सीधा मुकाबला तेजस्वी यादव से होगा जो पिछले कई सालों से राजनीतिक में हैं। 

तेजस्वी यादव पिछले कई चुनावों से गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं और उनकी अपनी एक स्थापित वोट बैंक है। दूसरी ओर, निशांत कुमार अभी राजनीति के 'लर्निंग फेज' में होंगे। उनका सीधा मुकाबला तेजस्वी से होना यह दर्शाता है कि आने वाले समय में बिहार की लड़ाई काफी दिलचस्प और वैचारिक होने वाली है।

बिहार की राजनीति के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है। नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार का जनता दल (यूनाइटेड) की सदस्यता लेना और सक्रिय राजनीति में कदम रखना राज्य के भविष्य के समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।

अब तक बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव को सबसे प्रमुख युवा चेहरे के रूप में देखा जाता रहा है। निशांत कुमार के आने से मुकाबला अब दो राजनीतिक परिवारों की अगली पीढ़ी के बीच सीधा हो गया है। जहाँ तेजस्वी के पास सालों का सांगठनिक और प्रशासनिक (उपमुख्यमंत्री के तौर पर) अनुभव है, वहीं निशांत के लिए अपनी पहचान बनाना और जदयू के कैडर को एकजुट करना एक बड़ी चुनौती होगी।

लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि निशांत कुमार के लिए बाहरी विरोध (तेजस्वी यादव और अन्य दल) से निपटना शायद फिर भी आसान हो, लेकिन अपने ही 'कुनबे' के भीतर असंतोष को शांत करना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी। यदि वरिष्ठ नेता केवल 'दबाव' में निशांत को स्वीकार करते हैं, तो वे दिल से उनके लिए काम नहीं करेंगे।

जदयू में ऐसे कई कद्दावर नेता हैं जो दशकों से नीतीश कुमार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। निशांत कुमार के लिए चुनौती यह होगी कि वे इन वरिष्ठ नेताओं को यह विश्वास दिला सकें कि वे केवल "वारिस" नहीं, बल्कि उनके अनुभवों का सम्मान करने वाले एक सहयोगी भी हैं। अगर पुराने नेताओं को लगा कि उनकी अनदेखी हो रही है, तो पार्टी के भीतर असंतोष पनप सकता है।

​एक महत्वपूर्ण बात: तेजस्वी यादव ने भी शुरुआती दिनों में अपनी पार्टी (राजद) के पुराने नेताओं के साथ इसी तरह की चुनौतियों का सामना किया था, जिससे उन्होंने धीरे-धीरे सामंजस्य बिठाया। निशांत के पास समय कम है और उम्मीदें बहुत ज्यादा।



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