सम्पादकीय: विदेशी मशरूम की रोटी खाने वाला पीएम के देश का वास्तविक आईना: नमक-रोटी खाती बिटिया।
सोशल मीडिया पर हाल ही में वायरल हुई एक तस्वीर ने देश के आर्थिक विकास और सामाजिक प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रेन के साधारण जनरल डिब्बे में अपनी नन्हीं बच्ची के साथ सफर करता एक पिता केवल नमक और मिर्च के सहारे सुखी रोटी खाने को मजबूर है। थाली में न कोई सब्जी है, न कोई पौष्टिक आहार। यह दृश्य महज एक तस्वीर नहीं, बल्कि उस कड़वी और निर्मम वास्तविकता का दस्तावेज है, जो भारत की विकास गाथा के समानांतर चुपचाप बह रही है।
शासकों की थाली और जनता का संघर्ष बङा बहस:
"डाॅक्टर मनमोहन सिंह पीएम बने और भोजन को अधिकार में शामिल किया, जिसके वजह से आज लोगों को रोटी-नमक नसीब है, वरना भूखे पेट में हाथ डालकर सोने को मजबूर होते भारतीय लोग ।"
भारतीय राजनीतिक इतिहास का यह एक ऐसा पहलू है जिस पर सोचना चाहिए। देश के शीर्ष पदों पर रहे नेताओं, की जीवनशैली आम नागरिक की जमीनी हकीकत से कोसों दूर रही है। शाही भोज और विशिष्ट खान-पान के बीच देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। जैसे; आज के पीएम नरेंद्र मोदी विदेशी मशरूम की रोटी खाते है, और जनता को आटे की रोटी के साथ नमक नसीब है। नेहरू, इंदिरा, राजीव सभी ने विदेशी खाना खाते रहे , लेकिन जनता का पेट 75 साल बाद भी खाली रहा।
यह विडंबना ही है कि आजादी के सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी समाज के एक हिस्से को पौष्टिक भोजन तो दूर, केवल नमक और मिर्च के सहारे अपनी भूख मिटाने को विवश होना पड़ रहा है। यह स्थिति इस बात का प्रतीक है कि विकास के तमाम बड़े आंकड़ों और जीडीपी की ऊंची दरों के बावजूद, समृद्धि का लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया है।
लेकिन, इस विमर्श के दूसरे पहलू में डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान उठाए गए ऐतिहासिक कदमों को याद करने की जरूरत है। उनके कार्यकाल में लाए गए 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून' (NFGA) ने देश के करोड़ों गरीबों के लिए भोजन को एक कानूनी अधिकार के रूप में स्थापित किया। इस नीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि देश का कोई भी नागरिक गरीबी के कारण भूखे पेट सोने को मजबूर न हो।
यदि इस प्रकार के कानूनी सुरक्षा कवच और सब्सिडी वाले खाद्यान्न की व्यवस्था न होती, तो देश के गरीब वर्ग की स्थिति और भी अधिक दयनीय हो सकती थी। नीतियों के बावजूद धरातल पर क्रियान्वयन की कमियां यह दर्शाती हैं कि आज भी व्यवस्था में कई छिद्र हैं, जिन्हें भरना बाकी है। जब तक हर परिवार की थाली तक दाल, सब्जी और पौष्टिक आहार नहीं पहुंचता, तब तक केवल कागजी योजनाओं से पूर्ण संतुष्टि नहीं मिल सकती।
आज जब भारत को दुनिया की प्रमुख और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, तब ऐसी तस्वीरें हमें आत्ममंथन करने पर मजबूर करती हैं। बड़े-बड़े आंकड़े, शेयर बाजार की ऊँचाइयाँ और बुनियादी ढांचे के विकास का शोर अक्सर उस आबादी की आवाज को दबा देता है, जिसके लिए आज भी दो वक्त की सूखी रोटी का इंतजाम करना सबसे बड़ी जंग है। किसी के लिए भोजन पसंद और स्वाद का विषय हो सकता है, लेकिन समाज के एक बड़े वर्ग के लिए यह केवल जीवित रहने का संघर्ष है।
जीडीपी के आंकड़े यह तो बता सकते हैं कि देश में कितनी संपत्ति का सृजन हो रहा है, लेकिन वे यह नहीं दर्शाते कि वह संपत्ति समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच भी रही है या नहीं। यदि एक पिता अपनी बच्ची को रोटी के साथ एक कटोरी सब्जी भी मुहैया कराने में असमर्थ है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारी कल्याणकारी योजनाओं और धरातल की सच्चाई के बीच एक गहरा अंतर बना हुआ है।
यह स्थिति नीति-निर्माताओं और समाज दोनों के लिए एक चेतावनी है। केवल बुनियादी ढाँचे या भव्य आयोजनों से देश सशक्त नहीं बनता; देश की असली ताकत उसके नागरिकों का जीवन स्तर है। खाद्य सुरक्षा और जन-कल्याण की योजनाएं कागजों और आंकड़ों से निकलकर वास्तविक जरूरतमंदों तक पारदर्शी तरीके से पहुँचनी चाहिए। गरीबी केवल आय की कमी नहीं है, बल्कि यह अवसरों और बुनियादी मानवीय गरिमा से वंचित रहने की स्थिति है। जब तक समाज के हर बच्चे को संतुलित पोषण और हर परिवार को न्यूनतम जीवन यापन की सुविधाएं नहीं मिल जातीं, तब तक आर्थिक समृद्धि के बड़े दावे अधूरे ही रहेंगे।
समय आ गया है कि हम आर्थिक प्रगति को केवल मैक्रो-आंकड़ों के चश्मे से न देखें, बल्कि उस अंतिम व्यक्ति की थाली से भी मापें, जो आज भी नमक और रोटी के सहारे अपने परिवार का पेट पालने पर मजबूर है। इसके साथ ही, एक समाज के रूप में हमें अपनी सोई हुई संवेदनाओं को जगाना होगा ताकि मुसीबत के समय किसी के हाथ में कैमरे के बजाय मदद का हाथ आगे बढ़े।
स्रोत: सोशल साइट्स, सोशल मीडिया विश्वसनीय पोस्ट्स और अन्य विश्वसनीय सूत्र।
(शैलेन्द्र कुमार, न्यूज डेस्क N5)
