सम्पादकीय: बिहार का बुनियादी ढांचा बनाम जल परिवहन की विभीषिका
बिहार में पिछले दो दशकों से नीतिश कुमार के नेतृत्व में एनडीए और महागठबंधन की विभिन्न स्वरूपों वाली सरकारें रही हैं। इस लंबे राजनीतिक दौर में राज्य के भीतर सड़कों, महासेतुओं और पुल-पुलियों के जाल को बिछाने और उनके चौड़ीकरण को विकास का मुख्य पैमाना बनाया गया है। सरकार के दावों के अनुसार कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। इसके बावजूद, उत्तर बिहार के दियारा और नदी-तटीय क्षेत्रों (विशेषकर राघोपुर जैसे इलाकों) के आम नागरिकों के लिए नाव आज भी जीवन रेखा बनी हुई है और इस 'जीवन रेखा' पर मंडराता मौत का खतरा जस का तस है। हाल ही में वैशाली जिले के राघोपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत रामपुर श्यामचंद दियारा इलाके में नाव पलटने से 13 लोगों (मुख्य रूप से मासूम बच्चों) की दर्दनाक मौत ने इस पूरे प्रशासनिक विकास मॉडल पर गंभीर और चुभते हुए सवाल खड़े कर दिए हैं।
पिछले 20 वर्षों में राज्य के कई हिस्सों में पक्की सड़कें और बड़े पुल बने हैं, जिन्हें सरकार अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती है। लेकिन यह विकास अक्सर मुख्यधारा के शहरी या राजनीतिक रूप से प्रभावशाली क्षेत्रों तक ही सीमित नजर आता है।
यह विडंबना ही है कि कागजों पर और विज्ञापनों में विकास की लंबी फेहरिस्त दिखाई जाती है, लेकिन नवनिर्मित पुलों और सड़कों के उद्घाटन के कुछ ही समय बाद उनके चटकने, धंसने या टूटने की खबरें आम हो चुकी हैं। यह घटिया निर्माण सामग्री और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। वैशाली का राघोपुर एक ऐसा ही क्षेत्र है जो चारों तरफ से गंगा नदी से घिरा हुआ एक बड़ा दियारा इलाका है। यहाँ के निवासियों के लिए मुख्य भूमि तक पहुँचने का एकमात्र साधन या तो नाव है या फिर अस्थायी और जोखिम भरे इंतजाम।
उत्तर बिहार के कोसी, गंडक, बागमती और गंगा के दियारा क्षेत्रों में आज भी लाखों लोग रोज़ाना अपनी जान हथेली पर रखकर जर्जर, बिना फिटनेस और क्षमता से अधिक भरी हुई (ओवरलोडेड) नावों से सफर करने को मजबूर हैं। इन नावों पर न तो लाइफ जैकेट की कोई व्यवस्था होती है और न ही बच्चों व बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए कोई प्रशासनिक मॉनिटरिंग। राघोपुर हादसे में भी यही देखा गया कि एक छोटे से पारिवारिक भोज में शामिल होने जा रही ओवरलोडेड नाव बीच नदी में संतुलन खो बैठी और कई मासूमों की जिंदगी निगल गई।
सड़क और पुलों पर हज़ारों करोड़ खर्च करने वाली सरकारें ग्रामीण और जल परिवहन सुरक्षा के प्रति हमेशा उदासीन रही हैं। नाविकों का कोई औपचारिक प्रशिक्षण, नावों का नियमित पंजीकरण या सुरक्षा ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं धरातल पर नदारद हैं।
इस हृदयविदारक घटना के बाद जब बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने राघोपुर के पीड़ित परिवारों के बीच पहुंचकर ढांढस बंधाया और सीधे मौके से प्रशासनिक अधिकारियों को फोन कर जवाबदेही तय करने को कहा, तो यह इस बात को रेखांकित करता है कि संकट के समय भी जनता को न्याय दिलाने के लिए राजनीतिक दबाव की आवश्यकता पड़ती है।
हर बड़ी दुर्घटना के बाद शासन-प्रशासन की तरफ से 4 लाख रुपये की अनुग्रह राशि (मुआवजा) घोषित कर इतिश्री कर ली जाती है। परंतु, सवाल यह उठता है कि क्या मुआवजे की यह राशि किसी की उजड़ी हुई गृहस्थी या खोए हुए बच्चों को वापस ला सकती है? सरकार को मौत के बाद मिलने वाले मुआवजे के बजाय 'दुर्घटना रोकने वाले स्थायी उपायों' पर ध्यान देना चाहिए।
बिहार में पिछले 20 वर्षों का प्रशासनिक कालखंड इस बात का गवाह है कि बड़े-बड़े पुल और सड़कों के निर्माण के बावजूद निचले स्तर के ढांचागत नियोजन (Infrastructural Planning) में भारी खाइयां मौजूद हैं। जब तक उत्तर बिहार के दियारा क्षेत्रों (जैसे राघोपुर) में आवागमन के लिए सुरक्षित स्थायी पुलों का निर्माण नहीं होता या तब तक जल परिवहन को पूरी तरह आधुनिक, सुरक्षित और नियंत्रित नहीं किया जाता, तब तक विकास के तमाम दावे खोखले ही माने जाएंगे। सड़क टूटने से शायद व्यावसायिक नुकसान होता है, लेकिन नाव पलटने से मासूमों की सांसें उजड़ती हैं—यही बिहार के कथित विकास का सबसे बड़ा और कड़वा सच है।
(सम्पादकीय-N5)
