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आरा में लगातार दो खून; बिहार में सुशासन के दावों पर सुलगते सवाल—क्या नीतीश कुमार के 20 सालों का सुशासन पटरियों से उतर गई?

संपादकीय: आरा में लगातार दो खून; बिहार में सुशासन के दावों पर सुलगते सवाल—क्या नीतीश कुमार के 20 सालों का सुशासन पटरियों से उतर गई?
बिहार का आरा जिला इन दिनों अपराधियों के लगातार बढ़ते हौसलों और सनसनीखेज वारदातों का केंद्र बन गया है। हाल ही में हुई सिलसिलेवार हत्याओं ने राज्य के प्रशासनिक दावों और खासकर नीतीश कुमार के 20 वर्षों के 'सुशासन' के मॉडल को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह महज कुछ आपराधिक घटनाएं हैं या फिर बिहार की कानून-व्यवस्था पर कोई बहुत बड़ा 'सर्जिकल स्ट्राइक' है, जो सिस्टम की पोल खोल रहा है?
भोजपुर जिले के आरा शहर में अपराध का ग्राफ लगातार चिंताजनक रूप से ऊपर जा रहा है। ताजा मामलों पर गौर करें तो, आरा शहर के नवादा थाना क्षेत्र के अंतर्गत जैन कॉलेज गेट के पास सुबह-सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकले सेवानिवृत्त कस्टम अधिकारी और क्षत्रिय कल्याण संगठन के भोजपुर जिला अध्यक्ष राम कुमार सिंह की बाइक सवार बदमाशों ने गोलियों से भूनकर हत्या कर दी. इस सनसनीखेज वारदात के बाद मौके पर भोजपुर के एसपी अवधेश दीक्षित पुलिस बल के साथ पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया, लेकिन आम जनता में सुरक्षा को लेकर बैठा खौफ आसानी से कम होने वाला नहीं है।
यह घटना अकेली नहीं है। इससे पहले पिछले शनिवार को भी एक व्यापारी को सरेआम गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया था। इस माह के इन लगातार मर्डर्स ने यह साबित कर दिया है कि अपराधियों के मन से कानून का डर पूरी तरह समाप्त हो चुका है। अब न तो व्यापारी सुरक्षित हैं और न ही सुबह टहलने वाले संभ्रांत नागरिक।
जब एक जिला मुख्यालय में, पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे इस तरह की दुस्साहसिक वारदातें होने लगें, तो इसे छिटपुट अपराध कहकर टाला नहीं जा सकता। जैन कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान के पास सुबह के वक्त इस प्रकार की वारदात होना पुलिस गश्त और खुफिया तंत्र की घोर विफलता को दर्शाता है।
जब दिनदहाड़े सेवानिवृत्त अधिकारियों और कारोबारियों को निशाना बनाया जाने लगे, तो आम आदमी खुद को पूरी तरह असहाय महसूस करता है। इससे यह गंभीर सवाल खड़ा होता है कि क्या बिहार का संपूर्ण लॉ एंड ऑर्डर तंत्र अब चरमरा चुका है और अपराधी बेलगाम हो चुके हैं?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लंबे समय से 'सुशासन बाबू' की छवि के साथ राज्य की सत्ता संभाल रहे । उनके शासनकाल के दो दशक पूरे होने के बाद वह सत्ता से बेदखल किए गए और उनकी राजनीति की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) यही रही है कि उन्होंने बिहार को 'जंगल राज' से निकालकर कानून के राज (रूल ऑफ लॉ) की पटरी पर लाया था। सच में बिहार को पटरी पर लाया था कि लालू शासनकाल को नीचा दिखाने व बदनाम करने की राजनीतिक लीपापोती था! ये बङा सवाल है, जिसका जवाब किसी के पास नहीं, इस नाम पर वोट देना और राजनीतिक करना बिहार के लोगों को कोई उपलब्धि नहीं मिली।
जब आरा जैसी घटनाएं एक के बाद एक सामने आती हैं, तो जनता के मन में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या यह दो दशकों के सुशासन की पहचान  है? क्या अपराधियों द्वारा लगातार चलाई जा रही गोलियां उस प्रशासनिक व्यवस्था पर एक प्रकार का 'सर्जिकल स्ट्राइक' नहीं हैं, जो खुद को अपराध-मुक्त होने का दावा करती थी? जब सुरक्षा के तमाम दावे कागजी साबित होने लगें और अपराधियों में पुलिस का खौफ खत्म हो जाए, तो सुशासन की परिभाषा पर गंभीर संकट मंडराने लगता है।
निष्कर्ष और प्रशासनिक उत्तरदायित्व
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और पुलिस प्रशासन केवल औपचारिकता निभाने या घटनास्थल पर जाकर स्थिति का जायजा लेने तक सीमित न रहे। भोजपुर एसपी और जिला प्रशासन को इन मामलों में तेजी दिखाते हुए न केवल शूटरों, बल्कि इस साजिश के पीछे के असली मास्टरमाइंड तक पहुंचना होगा।
यदि समय रहते अपराधियों की कमर नहीं तोड़ी गई और पुलिसिया इकबाल को फिर से कायम नहीं किया गया, तो जनता का सिस्टम से बचा-कुचा भरोसा भी उठ जाएगा। सुशासन के दावों को बचाने के लिए अब केवल भाषणों की नहीं, बल्कि कड़े और ठोस प्रशासनिक एक्शन की सख्त जरूरत है, ताकि आरा और पूरे बिहार की धरती पर खून की यह होली रोकी जा सके।
(सम्पादकीय:N5)
Shailendra Kumar
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आरा में लगातार दो खून; बिहार में सुशासन के दावों पर सुलगते सवाल—क्या नीतीश कुमार के 20 सालों का सुशासन पटरियों से उतर गई?

संपादकीय: आरा में लगातार दो खून; बिहार में सुशासन के दावों पर सुलगते सवाल—क्या नीतीश कुमार के 20 सालों का सुशासन पटरियों से उतर गई?
बिहार का आरा जिला इन दिनों अपराधियों के लगातार बढ़ते हौसलों और सनसनीखेज वारदातों का केंद्र बन गया है। हाल ही में हुई सिलसिलेवार हत्याओं ने राज्य के प्रशासनिक दावों और खासकर नीतीश कुमार के 20 वर्षों के 'सुशासन' के मॉडल को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह महज कुछ आपराधिक घटनाएं हैं या फिर बिहार की कानून-व्यवस्था पर कोई बहुत बड़ा 'सर्जिकल स्ट्राइक' है, जो सिस्टम की पोल खोल रहा है?
भोजपुर जिले के आरा शहर में अपराध का ग्राफ लगातार चिंताजनक रूप से ऊपर जा रहा है। ताजा मामलों पर गौर करें तो, आरा शहर के नवादा थाना क्षेत्र के अंतर्गत जैन कॉलेज गेट के पास सुबह-सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकले सेवानिवृत्त कस्टम अधिकारी और क्षत्रिय कल्याण संगठन के भोजपुर जिला अध्यक्ष राम कुमार सिंह की बाइक सवार बदमाशों ने गोलियों से भूनकर हत्या कर दी. इस सनसनीखेज वारदात के बाद मौके पर भोजपुर के एसपी अवधेश दीक्षित पुलिस बल के साथ पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया, लेकिन आम जनता में सुरक्षा को लेकर बैठा खौफ आसानी से कम होने वाला नहीं है।
यह घटना अकेली नहीं है। इससे पहले पिछले शनिवार को भी एक व्यापारी को सरेआम गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया था। इस माह के इन लगातार मर्डर्स ने यह साबित कर दिया है कि अपराधियों के मन से कानून का डर पूरी तरह समाप्त हो चुका है। अब न तो व्यापारी सुरक्षित हैं और न ही सुबह टहलने वाले संभ्रांत नागरिक।
जब एक जिला मुख्यालय में, पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे इस तरह की दुस्साहसिक वारदातें होने लगें, तो इसे छिटपुट अपराध कहकर टाला नहीं जा सकता। जैन कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान के पास सुबह के वक्त इस प्रकार की वारदात होना पुलिस गश्त और खुफिया तंत्र की घोर विफलता को दर्शाता है।
जब दिनदहाड़े सेवानिवृत्त अधिकारियों और कारोबारियों को निशाना बनाया जाने लगे, तो आम आदमी खुद को पूरी तरह असहाय महसूस करता है। इससे यह गंभीर सवाल खड़ा होता है कि क्या बिहार का संपूर्ण लॉ एंड ऑर्डर तंत्र अब चरमरा चुका है और अपराधी बेलगाम हो चुके हैं?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लंबे समय से 'सुशासन बाबू' की छवि के साथ राज्य की सत्ता संभाल रहे । उनके शासनकाल के दो दशक पूरे होने के बाद वह सत्ता से बेदखल किए गए और उनकी राजनीति की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) यही रही है कि उन्होंने बिहार को 'जंगल राज' से निकालकर कानून के राज (रूल ऑफ लॉ) की पटरी पर लाया था। सच में बिहार को पटरी पर लाया था कि लालू शासनकाल को नीचा दिखाने व बदनाम करने की राजनीतिक लीपापोती था! ये बङा सवाल है, जिसका जवाब किसी के पास नहीं, इस नाम पर वोट देना और राजनीतिक करना बिहार के लोगों को कोई उपलब्धि नहीं मिली।
जब आरा जैसी घटनाएं एक के बाद एक सामने आती हैं, तो जनता के मन में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या यह दो दशकों के सुशासन की पहचान  है? क्या अपराधियों द्वारा लगातार चलाई जा रही गोलियां उस प्रशासनिक व्यवस्था पर एक प्रकार का 'सर्जिकल स्ट्राइक' नहीं हैं, जो खुद को अपराध-मुक्त होने का दावा करती थी? जब सुरक्षा के तमाम दावे कागजी साबित होने लगें और अपराधियों में पुलिस का खौफ खत्म हो जाए, तो सुशासन की परिभाषा पर गंभीर संकट मंडराने लगता है।
निष्कर्ष और प्रशासनिक उत्तरदायित्व
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और पुलिस प्रशासन केवल औपचारिकता निभाने या घटनास्थल पर जाकर स्थिति का जायजा लेने तक सीमित न रहे। भोजपुर एसपी और जिला प्रशासन को इन मामलों में तेजी दिखाते हुए न केवल शूटरों, बल्कि इस साजिश के पीछे के असली मास्टरमाइंड तक पहुंचना होगा।
यदि समय रहते अपराधियों की कमर नहीं तोड़ी गई और पुलिसिया इकबाल को फिर से कायम नहीं किया गया, तो जनता का सिस्टम से बचा-कुचा भरोसा भी उठ जाएगा। सुशासन के दावों को बचाने के लिए अब केवल भाषणों की नहीं, बल्कि कड़े और ठोस प्रशासनिक एक्शन की सख्त जरूरत है, ताकि आरा और पूरे बिहार की धरती पर खून की यह होली रोकी जा सके।
(सम्पादकीय:N5)
Shailendra Kumar
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