संपादकीय: राष्ट्रीयता का आवरण और क्षेत्रीयता का सच—किस राह पर है कांग्रेस?
भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी—भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस—एक विचित्र और गभीर विरोधाभास के दौर से गुजर रही है। एक तरफ जहाँ कागजों, इतिहास और कॉरपोरेट चंदे के आंकड़ों में कांग्रेस आज भी देश की मुख्य विपक्षी ताकत नजर आती है, वहीं दूसरी ओर चुनावी परिणामों और जमीनी जनाधार के तराजू पर तौलने पर उसकी स्थिति किसी क्षेत्रीय दल से अलग नजर नहीं आती। 'राष्ट्रीय दल' का आवरण और 'क्षेत्रीय क्षमता' का सच—यही आज की कांग्रेस की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुका है।
संसाधनों में राष्ट्रीय, नतीजों में सीमित
चुनावी चंदे और वित्तीय संसाधनों के आंकड़ों को देखें तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बाद कॉर्पोरेट जगत और इलेक्टोरल बॉन्ड/ट्रस्ट्स से सबसे ज्यादा फंड हासिल करने वाली पार्टी कांग्रेस ही है। संसद के भीतर मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हो या राष्ट्रीय मीडिया में बहस का केंद्र बिंदु बनना, कांग्रेस आज भी अपनी पुरानी सत्ता के प्रभाव और अखिल भारतीय नेटवर्क के दम पर राष्ट्रीय विकल्प होने का दावा पेश करती है।
लेकिन, जब बात चुनाव नतीजों और राज्यों के नक्शे पर पकड़ की आती है, तो यह राष्ट्रीय आवरण भरभराकर गिर जाता है। आज कांग्रेस अपने दम पर केवल कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश जैसे गिने-चुने राज्यों तक सिमट कर रह गई है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे देश के सबसे बड़े राज्यों में—जहाँ से लोकसभा की आधी से अधिक सीटें तय होती हैं—कांग्रेस बिना किसी क्षेत्रीय दल की बैसाखी के एक सीट जीतने की स्थिति में भी नहीं बची है। इन राज्यों में उसका वोट शेयर सिमटकर 2 से 5 प्रतिशत के बीच झूल रहा है।
'बड़े भाई' का अहंकार और क्षेत्रीय दलों से टकराव
कांग्रेस की इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण उसकी वह सोच है, जहाँ वह ज़मीनी हकीकत को स्वीकार करने के बजाय खुद को गठबंधन का कुदरती 'बड़ा भाई' मानती है। हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, और दिल्ली-पंजाब में आम आदमी पार्टी के साथ उसका रवैया इसी विरोधाभास को उजागर करता है। जब भी विधानसभा चुनाव आते हैं, कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के सामने अपनी जमीनी पकड़ से कहीं ज्यादा सीटों की मांग पर अड़ जाती है।
परिणाम स्वरूप, विपक्षी वोटों में बिखराव होता है और त्रिकोणीय मुकाबले का सीधा फायदा भाजपा को मिल जाता है। क्षेत्रीय दलों का यह आरोप पूरी तरह बेबुनियाद नहीं लगता कि कांग्रेस का यह अड़ियल रवैया कई बार भाजपा विरोधी वोटों को विभाजित कर अनजाने में सत्ताधारी दल की राह आसान कर देता है।
सांगठनिक नाकामी और 'बी-टीम' बनने का सच
भारतीय जनता पार्टी के बाद सबसे ज्यादा कॉरपोरेट चंदा जुटाने और पुरानी सत्ता के प्रभाव को राष्ट्रीय स्तर पर भुनाने के बावजूद, चुनाव नतीजों में कांग्रेस का प्रदर्शन पूरी तरह फुसफुसा साबित हो रहा है। आज स्थिति यह हो चुकी है कि जिन राज्यों में कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से होता है—चाहे वह मध्य प्रदेश हो, राजस्थान, छत्तीसगढ़ या हरियाणा—वहाँ कांग्रेस अपनी गुटबाज़ी और दिशाहीन रणनीति के कारण घुटने टेक देती है।
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में जहाँ क्षेत्रीय दल (जैसे सपा, टीएमसी, आप) भाजपा के खिलाफ मजबूती से लड़ रहे हैं, वहाँ कांग्रेस सहयोग करने के बजाय उनके खिलाफ ही मोर्चा खोल देती है। चुनाव के वक्त राहुल गांधी और प्रांतीय कांग्रेस नेताओं द्वारा क्षेत्रीय दलों पर दिए जाने वाले तीखे बयान अंततः भाजपा-विरोधी वोटों में बिखराव पैदा करते हैं। यही कारण है कि आज आम जनता और राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस को भाजपा की 'अप्रत्यक्ष मददगार' या 'बी-टीम' के रूप में देखा जाने लगा है।
आगे की राह: आत्मचिंतन या ऐतिहासिक पतन?
यदि कांग्रेस को वास्तव में एक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पुनर्जीवित होना है, तो उसे अपनी पुरानी सत्ता के प्रभाव और अतीत के गौरव के दायरे से बाहर निकलना होगा। उसे यह स्वीकार करना होगा कि केवल चंदा जुटाने या राष्ट्रीय स्तर पर बयानबाज़ी करने से कोई दल राष्ट्रीय नहीं बनता; उसके लिए राज्यों में मजबूत संगठन और समर्पित कैडर की आवश्यकता होती है।
जब तक कांग्रेस राज्य स्तर पर अपने सहयोगियों के वजूद का सम्मान करना नहीं सीखती और व्यावहारिक राजनीति नहीं अपनाती, तब तक वह कागज़ों पर भले ही 'राष्ट्रीय पार्टी' बनी रहे, लेकिन चुनावी नतीजों में एक क्षेत्रीय पार्टी से ज्यादा कुछ साबित नहीं हो पाएगी। समय की मांग है कि पार्टी नेतृत्व इस विरोधाभास को समझे, वरना 'इंडिया' गठबंधन हो या देश की राजनीति, कांग्रेस अप्रासंगिक होने के मुहाने पर खड़ी है।
भारतीय राजनीति के इतिहास में जिस कांग्रेस पार्टी ने दशकों तक देश पर एकछत्र राज किया, वही पार्टी आज अपने वैचारिक भटकाव, सांगठनिक खोखलेपन और अदूरदर्शी रणनीति के कारण विनाश के कगार पर खड़ी नजर आ रही है। एक समय पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस आज चंद राज्यों तक सिमटकर एक अति-क्षेत्रीय दल जैसी स्थिति में पहुँच चुकी है। त्रासदी यह नहीं है कि कांग्रेस का जनाधार घट रहा है, बल्कि त्रासदी यह है कि पार्टी नेतृत्व इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करने के बजाय अब भी 'राष्ट्रीय आवरण' और 'बड़े भाई' के झूठे घमंड में जी रहा है।
स्रोत: लीडर बयान, चुनावी ख़बर, इंटरनेट।
( सम्पादकीय- शैलेन्द्र कुमार न्यूज डेस्क N5)
