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संपादकीय: मुफ़्त कोचिंग का वादा — राहत की पहल या जनाक्रोश को शांत करने का राजनीतिक पैंतरा?



संपादकीय: मुफ़्त कोचिंग का वादा — राहत की पहल या जनाक्रोश को शांत करने का राजनीतिक पैंतरा?

​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मध्यवर्ग और छात्रों के लिए मुफ़्त ऑनलाइन कोचिंग का नेटवर्क तैयार करने की घोषणा ने देश भर के राजनीतिक और शैक्षणिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ समर्थकों का दावा है कि इस कदम से 'कोचिंग माफिया' पर लगाम लगेगी, वहीं विश्लेषक और छात्र संगठन इसे सरकार की घबराहट में उठाया गया नीतिगत कदम मान रहे हैं।

​ऐलान बनाम क्रियान्वयन: समयसीमा पर सस्पेंस।
​प्रधानमंत्री ने मुफ़्त कोचिंग का विचार तो सामने रखा, लेकिन यह योजना कब से धरातल पर उतरेगी, इसका कोई स्पष्ट खाका या समयसीमा जारी नहीं की गई।
​पुराने मॉडल का उदाहरण: बैंकिंग सेवाओं के क्षेत्र में प्री-एग्जाम ट्रेनिंग (PET) जैसी मुफ़्त कोचिंग व्यवस्था पहले से ही विभिन्न परीक्षाओं के अभ्यर्थियों के लिए उपलब्ध रही है। ऐसे में नई घोषणा में क्या मौलिक अंतर होगा, यह अभी भी अस्पष्ट है।
​समयसीमा का अभाव: जब तक किसी नीति की आधिकारिक अधिसूचना और कार्यान्वयन की तिथि तय नहीं होती, तब तक ऐसी घोषणाएं केवल प्रशासनिक वादों तक ही सीमित रहती हैं।

​जनाक्रोश, हालिया विवाद और पुरानी रणनीति की पुनरावृत्ति।
​हाल ही में कोचिंग संस्थानों के मुद्दों, भर्ती परीक्षाओं में धांधली और छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के चलते सरकार की चौतरफा घेराबंदी हुई थी। छात्रों के बढ़ते आक्रोश और मंत्रियों के इस्तीफे के बाद पैदा हुए दबाव के बीच इस घोषणा का आना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
​राजनीतिक दबाव में लिया गया फैसला: आलोचकों का मानना है कि जिस प्रकार छात्र युवाओं ने हालिया घटनाओं में अपनी आवाज बुलंद की, उसी घबराहट और असंतोष को शांत करने के उद्देश्य से यह फैसला लिया गया है।
​किसान आंदोलन की तर्ज पर राहत मॉडल: इस स्थिति की तुलना किसान आंदोलन के दौर से की जा रही है। जब व्यापक किसान आंदोलन के समय प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (6,000 रुपये वार्षिक) जैसी योजनाओं को असरदार तरीके से लागू कर आक्रोश को धीरे-धीरे शांत किया गया था, ठीक उसी रणनीति को अब छात्रों के मुद्दे पर भी दोहराने की कोशिश मानी जा रही है।

​आगे की राह:  शिक्षा व्यवस्था में कोचिंग माफिया के वर्चस्व को खत्म करना निस्संदेह एक सराहनीय विचार हो सकता है, लेकिन बिना किसी स्पष्ट रोडमैप, बजट और समय-सारणी के की गई घोषणाएं जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खो देती हैं। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि यह नेटवर्क कब, कैसे और किस ढाँचे के तहत काम करेगा, ताकि यह सिर्फ एक फौरी राजनीतिक डैमेज कंट्रोल बनकर न रह जाए।
                (सम्पादकीय- शैलेन्द्र कुमार)
Shailendra Kumar
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संपादकीय: मुफ़्त कोचिंग का वादा — राहत की पहल या जनाक्रोश को शांत करने का राजनीतिक पैंतरा?



संपादकीय: मुफ़्त कोचिंग का वादा — राहत की पहल या जनाक्रोश को शांत करने का राजनीतिक पैंतरा?

​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मध्यवर्ग और छात्रों के लिए मुफ़्त ऑनलाइन कोचिंग का नेटवर्क तैयार करने की घोषणा ने देश भर के राजनीतिक और शैक्षणिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ समर्थकों का दावा है कि इस कदम से 'कोचिंग माफिया' पर लगाम लगेगी, वहीं विश्लेषक और छात्र संगठन इसे सरकार की घबराहट में उठाया गया नीतिगत कदम मान रहे हैं।

​ऐलान बनाम क्रियान्वयन: समयसीमा पर सस्पेंस।
​प्रधानमंत्री ने मुफ़्त कोचिंग का विचार तो सामने रखा, लेकिन यह योजना कब से धरातल पर उतरेगी, इसका कोई स्पष्ट खाका या समयसीमा जारी नहीं की गई।
​पुराने मॉडल का उदाहरण: बैंकिंग सेवाओं के क्षेत्र में प्री-एग्जाम ट्रेनिंग (PET) जैसी मुफ़्त कोचिंग व्यवस्था पहले से ही विभिन्न परीक्षाओं के अभ्यर्थियों के लिए उपलब्ध रही है। ऐसे में नई घोषणा में क्या मौलिक अंतर होगा, यह अभी भी अस्पष्ट है।
​समयसीमा का अभाव: जब तक किसी नीति की आधिकारिक अधिसूचना और कार्यान्वयन की तिथि तय नहीं होती, तब तक ऐसी घोषणाएं केवल प्रशासनिक वादों तक ही सीमित रहती हैं।

​जनाक्रोश, हालिया विवाद और पुरानी रणनीति की पुनरावृत्ति।
​हाल ही में कोचिंग संस्थानों के मुद्दों, भर्ती परीक्षाओं में धांधली और छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के चलते सरकार की चौतरफा घेराबंदी हुई थी। छात्रों के बढ़ते आक्रोश और मंत्रियों के इस्तीफे के बाद पैदा हुए दबाव के बीच इस घोषणा का आना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
​राजनीतिक दबाव में लिया गया फैसला: आलोचकों का मानना है कि जिस प्रकार छात्र युवाओं ने हालिया घटनाओं में अपनी आवाज बुलंद की, उसी घबराहट और असंतोष को शांत करने के उद्देश्य से यह फैसला लिया गया है।
​किसान आंदोलन की तर्ज पर राहत मॉडल: इस स्थिति की तुलना किसान आंदोलन के दौर से की जा रही है। जब व्यापक किसान आंदोलन के समय प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (6,000 रुपये वार्षिक) जैसी योजनाओं को असरदार तरीके से लागू कर आक्रोश को धीरे-धीरे शांत किया गया था, ठीक उसी रणनीति को अब छात्रों के मुद्दे पर भी दोहराने की कोशिश मानी जा रही है।

​आगे की राह:  शिक्षा व्यवस्था में कोचिंग माफिया के वर्चस्व को खत्म करना निस्संदेह एक सराहनीय विचार हो सकता है, लेकिन बिना किसी स्पष्ट रोडमैप, बजट और समय-सारणी के की गई घोषणाएं जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खो देती हैं। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि यह नेटवर्क कब, कैसे और किस ढाँचे के तहत काम करेगा, ताकि यह सिर्फ एक फौरी राजनीतिक डैमेज कंट्रोल बनकर न रह जाए।
                (सम्पादकीय- शैलेन्द्र कुमार)
Shailendra Kumar
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