रक्षकों पर वार और हमारा बीमार समाज-संपादकीय।।
N5//सम्पादकीय: किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि संकट के समय उसकी रक्षा करने वाले तंत्र के प्रति उसका व्यवहार कैसा है। बिहार पुलिस द्वारा हाल ही में सोशल मीडिया पर साझा की गई एक भावुक पोस्ट ने न केवल कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि हमारे सामाजिक ताने-बाने और नैतिक पतन को भी बेनकाब कर दिया है।
पुलिस ने बड़े ही आर्त स्वर में जनता से अपील की है— “आपकी एक कॉल पर हम बिना अपनी परवाह किए आपकी मदद के लिए निकल पड़ते हैं। हमारी बस एक अपील है, जब डायल-112 की टीम आपकी सहायता के लिए पहुंचे, तो उसका सहयोग करें।”
सोचिए, जिस पुलिस बल का काम अपराधियों में खौफ पैदा करना और आम जनता को सुरक्षा का अहसास कराना है, आज उसे ही भीड़ के हाथों पिटने के डर से जनता के सामने हाथ जोड़ने पड़ रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक ही नहीं, बल्कि शर्मनाक है।
पिछले कुछ समय में राज्य के विभिन्न हिस्सों से ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जहां किसी विवाद, दुर्घटना या अपराध की सूचना पर पहुंची ‘डायल 112’ की टीम पर ही स्थानीय लोगों या उपद्रवियों ने जानलेवा हमला कर दिया।
इन हमलों में न जाने कितने पुलिसकर्मी लहूलुहान हुए और दुखद बात यह है कि एक जांबाज जवान को अपनी जान तक गंवानी पड़ी। जो जवान किसी अजनबी की जान बचाने के लिए अपने घर-परिवार को छोड़कर सरपट दौड़ता है, उसकी लाश का घर लौटना किसी भी संवेदनशील समाज के माथे पर कलंक है।
अगर हम ‘डायल 112’ के सेवा रिकॉर्ड को देखें, तो यह सेवा बिहार में आपातकालीन व्यवस्था की रीढ़ बन चुकी है। अपनी स्थापना के बाद से पिछले लगभग चार वर्षों में इस टीम ने 60 लाख से अधिक लोगों तक मदद पहुंचाई है।
सड़क हादसों में तड़पते ढाई लाख लोगों को समय पर अस्पताल पहुंचाकर नई जिंदगी देना और संकट में फंसी पांच लाख से अधिक महिलाओं को तुरंत सुरक्षा चक्र प्रदान करना कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। वह भी तब, जब यह टीम औसतन मात्र 10 मिनट के रिकॉर्ड समय में घटना स्थल पर पहुंचती है।
लेकिन, इन आंकड़ों के पीछे छिपी मुस्तैदी और त्याग को हम किस रूप में लौटा रहे हैं? पथराव, गाली-गलौज और हिंसा के रूप में? यह हिंसक मानसिकता दर्शाती है कि एक समाज के तौर पर हम कितने सहिष्णुता विहीन और हिंसक होते जा रहे हैं। भीड़ के रूप में हम यह भूल जाते हैं कि खाकी वर्दी के भीतर भी हाड़-मांस का एक इंसान है, उसका भी एक परिवार है, और वह किसी का बेटा, पति या पिता है।
वक्त आ गया है कि ऐसी घटनाओं के खिलाफ प्रशासन 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाए। पुलिस पर हाथ उठाने वाले अराजक तत्वों को यह कड़ा संदेश मिलना चाहिए कि रक्षकों पर किया गया वार राज्य की संप्रभुता पर हमला माना जाएगा। ऐसे उपद्रवियों के खिलाफ त्वरित अदालत (फास्ट ट्रैक कोर्ट) में मुकदमा चलाकर सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए।
इसके साथ ही, समाज के तौर पर हमें भी जागना होगा। अगर आज हम अपने रक्षकों को सुरक्षा और सम्मान नहीं दे पाए, तो कल को जब हम पर कोई आफत आएगी, तो कोई भी जवान अपनी जान जोखिम में डालकर 10 मिनट में हमारे दरवाजे पर आने का हौसला नहीं जुटा पाएगा। पुलिस का सहयोग करना सिर्फ एक कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि हमारी खुद की सुरक्षा और नागरिक कर्तव्य का तकाजा है।
वर्दी पर पत्थर चलाना बंद होना चाहिए, क्योंकि जब कानून की ढाल टूटती है, तो अराजकता का अंधकार पूरे समाज को निगल जाता है।

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